शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

दिल की बात

हिन्दी गद्य लेखन के शुरूआती दौर के लेखकों में एक महत्वपूर्ण नाम बाल कृष्ण भट्ट का है. भट्ट जी ने प्रेम की व्याख्या इन शब्दों में की है. -
"भक्ति,आदर,ममता,आनंद,वैराग्य,करुणा आदि जो भाव प्रतिक्षण मनुष्य के चित्त में उठा करते हैं,उन सबों के मूल तत्व को एक में मिला कर उसका इत्र निकाला जाय, तो उसे हम 'प्रेम' इस पवित्र नाम से पुकार सकेंगे"

प्रेम ही वेलेंटाइन डे का प्रमुख तत्व है. और प्रेम दिल से किया जाता है. इस लिए इस मौसम में 'दिल' की बात करना गैरमुनासिब न होगा.
वेलेंटाइन डे मनाने वाले दिल तो पहले ही ले दे चुके होते हैं.आज तो वे केवल याद दिलाते हैं कि हमारा दिल तुम्हारे पास और तुम्हारा दिल हमारे पास है.लेकिन वे जानते भी हैं या नहीं कि दिल होता क्या है. यदि नहीं तो जानिए-
बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक कतरा -ऐ- खूँ निकला

यदि हम वेलेंटाइन डे के माहौल में इन प्रेम करने वालों को कुछ नसीहत देना चाहें तो डर है कि लोग हमें बजरंगी न समझने लगें. फ़िर भी इनके भले के लिए शायर 'जौक' के शब्दों में इन्हें बता दें -
दिल को रफीक इश्क में अपना न समझ 'जौक'
टल जायेगा ये अपनी बला तुझ पै टाल के.

नसीहतों पर प्रेम के दीवानों ने कभी ध्यान नहीं दिया, लेकिन नसीहत देने वाले भी पीछे नहीं रहते. जफ़र साहेब की नसीहत की बानगी -
बाजारे मुहब्बत में न दिल बेच तू अपना
बिक जाता है साथ उसके जफ़र बेचने वाला.

बेचारे प्रेम दीवाने इन नसीहतों पर अमल नहीं कर पाते तो उनका दोष भी नहीं. वे बेचारे तो दिल से मजबूर हैं-
दिल की मजबूरी भी क्या शै है, कि दर से अपने
उसने सौ बार उठाया , तो मैं सौ बार आया.

उनका इस तरह सौ बार आने जाने के पीछे भी एक राज है. वे मानते हैं कि -
नज़र की राह से दिल में उतर के चल देना
ये रास्ता बहुत अच्छा है आने जाने का
.

अब इनको कौन समझाए कि बार बार बे आबरू हो कर भी , हो सकता है वे सामने वाले के दिल की थाह न ले पाये हों. लेकिन इन खूबसूरत चेहरों की हकीकत जफ़र साहेब ने तो जान ली –
गुल से नाजुक बदन उसका है लेकिन दोस्तो
ये गजब क्या है कि दिल पहलू में पत्थर सा बना

जफ़र साहेब भले ही अपने तजुर्बे से बरखुदारों को आगाह करते रहें , लेकिन इश्क के मारों का हाल तो आसी साहेब जानते हैं -
हमने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं
तुमने देखा एक नज़र और दिल तुम्हारा हो गया .

दिल तो मियाँ गालिब ने भी किसी को दिया. लेकिन वे कहना नहीं भूले -
दिल आपका, कि दिल में जो कुछ है आपका
दिल लीजिये, मगर मेरे अरमाँ निकाल के

ऐ मजनुओ ! इतने सारे ताजुर्बेकारों की बात न मानते हुए भी तुम इश्क के फेर में पड़े हो.लेकिन याद रखना और मानसिक रूप से तैयार रहना क्योंकि ऐसाभी होता है-
जो दिल में खुशी बन कर आए, वह दर्द बसा कर चले गए
जो शमा जलाने आए थे, वह शमा बुझा कर चले गए.

पक्के मजनू तो ऐसे शमा बुझा के जाने वालों से भी नाराज नहीं होते और दिल पर लगी चोट को सहते हुए अमजद हैदराबादी के शब्दों में कह उठते हैं -
दिल शाद नहीं तो नाशाद सही
लब पर नग्मा नहीं तो फरियाद सही
हमसे दामन छुड़ा कर जाने वाले
जा, जा, गर तू नहीं, तेरी याद सही.

यूँ यादों के सहारे जीने वाले शायद बड़ी तादाद में हैं.लेकिन इन यादों के सहारे जीने में भी.कितनी तकलीफ है,जफ़र साहेब बता रहे हैं -
इक हूक सी दिल में उठती है, इक दर्द सा दिल में होता है
हम रात को उठ कर रोते हैं जब सारा आलम सोता है.

यादों के सहारे जीना इतना आसान नहीं है. जब दिल उदास हो तो फ़िर कुछ भी अच्छा नहीं लगता -
दुनिया की महफिलों से घबडा गया हूँ यारब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का, जब दिल ही बुझ गया हो.

ऐसे ही असफल प्रेम के मारे कुछ दीवाने सोचने लगते हैं -
चहक है, महक है, रौनक है, नजारे सब कुछ
दिल में है दर्द तो बहारों से हमें क्या करना

इन्हीं गमों से घबरा कर मियां ग़ालिब गम सहने के लिए कई दिलों की तमन्ना कर उठे -
मेरी किस्मत में गम गर इतने थे
दिल भी यारब कई दिए होते.
ठीक ऐसी ही बात आबिद साहेब ने भी कही है -
गम दिए थे अगर मुहब्बत के
मुझको इक और दिल दिया होता.

गम सहने के लिए दिल चाहे जितने भी दिए हों,रातों की नींद तो हराम हो ही जाती है -
दिन भी गुजारना है, तड़प कर इसी तरह
सो जा दिले हजीं, कि बहुत रात हो गयी.

बहादुर शाह 'जफ़र' के दिल पर लगी चोट का मुलाहिजा फरमाइए -
मेरी आँख झपकी थी एक पल, कहा जी ने मुझसे कि उठ के चल
दिल-ऐ-बेकरार ने आन कर, मुझे चुटकी दे के जगा दिया.
न तो ताब है दिले जार में, न करार है गमे यार में
मुझे सोजे - इश्क ने आखिरश , यूँ ही मिस्ले शामअ घुला दिया
* * * * * * * * * * * * * * * * * * *
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलमे- नापाएदार में

दिल पर लगी यह चोट कभी कभी इतनी गहरी होती है कि आदमी जिन्दगी से ही बेजार हो जाता है -
अभी जिंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ यह दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने
-साहिर लुधियानवी

इनसे एक कदम बढ़ कर -
है जनाजा इस लिए भारी मेरा
हसरतें दिल की लिए जाते हैं हम
-गोया

लेकिन दिल केवल देने - लेने या इश्क करने के लिए ही नहीं वरन दूसरों के दुःख - दर्द महसूस करने के लिए भी होता है -
गैर के गम पै भी इस दिल पर असर होता है
कोई रोता है तो दामाँ मेरा तर होता है
- जिगर मुरादाबादी

अंत में वेलेंटाइन डे के दीवाने नौजवानों से, वेलन्टाइन डे से कतई अनभिज्ञ उन नौजवानों के दिल की तमन्ना का जिक्र कर दूँ जिन्हें आज भी देश सलाम करता है -
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैदेखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है.

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

आगामी चुनाव हेतु मेरी भविष्यवाणी

लोक सभा चुनाव सन्निकट हैं. मई माह में नयी लोकसभा का गठन हो जायेगा.कौन जीतेगा कौन हारेगा इस की भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता. हाँ एक भविष्यवाणी मैं अवश्य कर सकता हूँ, वह है चुनाव विश्लेषक और स्तम्भ लेखकों के सम्बन्ध में. वे लोग हमेशा की तरह अवश्य अलापेंगे कि मतदाता परिपक्व हो चुका है. अब मतदाता को बरगलाया नहीं जा सकता. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की वाहवाही की जायेगी.

हमारे बुद्धिजीवियों के इस आलाप पर मुझे ऐतराज है. आज भी मतदाता व्यक्ति की योग्यता के बजाय जाति, सम्प्रदाय, व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर,नोट के बदले या डर कर वोट देता है. यदि ऐसा न होता तो राजनीतिक दल इन्हीं आधारों पर टिकट न बांटते. यदि ऐसा न होता तो मन मोहन सिंह चुनाव न हारते. यदि ऐसा न होता तो चुनाव के लिए ऐसे मुद्दों को न तलाशा जाता जो मतदाताओं को लुभा सकें. और यदि मतदाता लुभावे में आ जाता है तो वह परिपक्व कैसा ?

ठीक इसी तरह मुझे इस बात पर भी ऐतराज है कि दुनिया के सबसे बड़े इस लोकतंत्र को भी परिपक्व बताया जाता है. मैं समझता हूँ कि परिपक्व लोकतंत्र की यह निशानी नहीं है कि किसी विमान उड़ाते पायलट को नीचे उतार कर सीधे प्रधान मंत्री की गद्दी पर बिठा दिया जाय. किसी गृहणी को चूल्हे से उठा कर मुख्यमंत्री बना दिया जाए.हमारी लोक सभा के अनेकों सांसद अपने आचरण से यह प्रकट नहीं होने देते कि वे परिपक्व लोकतंत्र की लोक सभा के सांसद हैं. मैं समझता हूँ कि हमारा तंत्र लोक की चिंता ठीक प्रकार से नहीं कर रहा है इसलिए परिपक्व लोकतंत्र कहलाने का हकदार नहीं है. मैं कामना करता हूँ कि विश्व का सबसे बड़ा यह लोक तंत्र परिपक्व बने.

सोमवार, 26 जनवरी 2009

भविष्य के सम्मान

गण तंत्र दिवस पर विशिष्ट कार्यों के लिए पुरस्कार देने की परम्परा है. अर्थात कोई अच्छा काम करने के लिए देश आपको शाबाशी स्वरूप सम्मानित करता है. अब प्रश्न यह है कि शाबाशी के लायक काम क्या हो सकते हैं ? मैं समझता हूँ शाबाशी के लायक काम समय सापेक्ष हैं.मैं विचार कर रहा हूँ कि आने वाले समय में कैसे लोगों को सम्मानित किया जा सकता है.

मुझे अलमारी की सफाई करते हुए एक बहुत पुराने समाचार पत्र का पन्ना मिला.उसमें छपे समाचारों को पढ़ते हुए मेरी नजर एक समाचार पर पड़ी. समाचार था एक ऑटो रिक्शा चालाक के सम्मान का. उसने सम्मान लायक काम यह किया था कि,३२००० रुपये जो उसके ऑटो रिक्शा में किसी मुसाफिर के रह गए थे,अधिकारी व्यक्ति को लौटा दिए.

मैं इस सम्मान पर गहराई से विचार करने लगा.मुझे समझ में आ गया कि वास्तव में ऑटो रिक्शा चालक से अपेक्षा थी कि वह राशि,जो उसकी नहीं थी , उसने अपने पास रख लेना चाहिए थी. चूंकि उसने ऐसा न कर वह राशि उसके वास्तविक अधिकारी तक पहुंचा दी, इस लिए उसका सम्मान किया गया.

तभी मैं समझ पाया कि आने वाले समय में सम्मान योग्य कार्य क्या हो सकते हैं. बानगी देखिये -
-किसी शासकीय अधिकारी द्वारा, शासकीय कार्य हेतु किसी व्यापारी से ख़रीदी गयी सामग्री का यथा समय बिना कमीशन लिए भुगतान कर देना.
- किसी शासकीय पद पर अपने / श्रीमानों के भाई भतीजे या भेंट अर्पित करने वाले उम्मीदवार का चयन न कर प्रतियोगिता के आधार पर सबसे योग्य व्यक्ति का चयन कर लेना.
-थाने में आई किसी महिला की रिपोर्ट बिना बलात्कार किए लिख लेना.
-शासकीय वाहन का उपयोग घर की सब्जी लेने,सिनेमा जाने या सैर सपाटे के लिए न करना.
-बिना अपराधिक रिकार्ड के किसी राजनीतिक दल से चुनाव टिकट प्राप्त कर लेना.

सूची बहुत लम्बी हो सकती है.लगता है भविष्य में सम्मान प्राप्त कर लेना आज की अपेक्षा आसान हो जायेगा.

रविवार, 18 जनवरी 2009

पत्रकारों की नस्ल

वैसे तो पत्रकारों की अनेक श्रेणियां,वर्ग,उपवर्ग, जातियाँ और प्रजातियाँ इस संसार में पाई जाती हैं, जिस पर एक विषद ग्रन्थ तैयार किया जा सकता है., किंतु इनमें से कुछ का वर्णन मैं यहाँ कर रहा हूँ.

एक श्रेणी में वे पत्रकार आते हैं,जिनके पास न पत्र होता है और न कार,फ़िर भी वे किसी न किसी तरह किसी न किसी पत्र से सम्बद्ध कहलाये जाते हैं और यदा कदा या बहुधा कार का उपयोग करते पाये जाते हैं.इस श्रेणी का एक वर्ग अपने को श्रमजीवी कहता किंतु बुद्धिजीवी मानता है.जिसमें जितना अधिक बुद्धितत्व होता है वह अपने से कनिष्ठ के श्रम पर उतना ही अधिक जीता है.कुछ इस लिए भी श्रमजीवी कहलाने के हकदार होते हैं क्योंकि वे तबादले करवाने,रुकवाने, कोटा परमिट दिलवाने आदि में काफी श्रम करते हैं और इन्हीं तिकड़मों के लिए वे पत्र से सम्बद्ध रहते हैं और सेठ साहूकारों,नेता मंत्रियों और अफसरों की कार का उपयोग कर लेते हैं.

एक अन्य श्रेणी में वे पत्रकार आते हैं जिनके पास पत्र होता है लेकिन कार नहीं.इस श्रेणी में एक वर्ग ऐसा है जो वास्तव में श्रमजीवी है.श्रम करना इनकी नियति है.ये बुद्धिजीवी इस लिए नहीं कहे जा सकते क्योंकि तिकड़मी बुद्धि का इनमें नितांत अभाव होता है. ये यदि दैनिक समाचार पत्र में हों तो कभी इस पेज और कभी उस पेज का दायित्व संभालते संभालते इनकी उम्र निकल जाती है. अखबार में होने वाली सारी गलतियों का ठीकरा इन्हीं के सर फूटता है. ये सदैव अपने श्रम के प्रतिफल से वंचित रहते हैं. इन्हीं में से कुछ लोग कुछ रुपट्टी के लिए गुमनाम रह जाते हैं और इनकी जगह उनका नाम छपता है जो केवल दस्तखत करना जानते हैं, लिखना नहीं.

पत्रकारों का एक वर्ग वह है जो छपने या न छपने वाले साप्ताहिकों से सम्बद्ध रहता है और ऊपरी कमाई वाले सरकारी दफ्तरों में घूमता पाया जाता है. इनका मानना है कि ऊपरी कमाई करने वाले दफ्तरों की ऊपरी कमाई में एक हिस्सा इनका भी होता है. कुछ अधिकारी इनसे इतने त्रस्त रहते हैं कि दफ्तर के बजाय घर में बैठ कर सरकारी काम निबटाना अधिक उपयुक्त समझते है.

कुछ पत्रकार 'पत्रकार' नाम को पूर्ण सार्थक करते हैं. अर्थात इनके पास पत्र भी होता है और कार भी. निश्चित ही ये सफल पत्रकार हैं.लेकिन इस सफलता के पीछे एक लंबे संघर्ष की कहानी होती है जिसे बिरले ही जान पाते हैं. इनमें से कई कम्पोजीटर,प्रूफरीडर की सीढ़ी चढ़ कर नेताओं - मंत्रियों , अफसरों की दवा-दारू-दारा का इंतजाम करते हुए यहाँ तक पहुंचे होते हैं.ये वास्तव में बुद्धिजीवी और श्रमजीवी हैं क्योंकि इनमें जोड़-तोड़ की विशिष्ट बुद्धि के साथ उसके लिए दौड़ भाग का श्रम करने की अद्भुत क्षमता होती है. इनमें से कुछ वे लोग भी होते हैं जो लिख भी सकते हैं. ऐसे लोग अपनी लेखनी के दम पर नेताओं मंत्रियों के (भाषण, संदेश आदि लिखने हेतु) चहेते बन जाते हैं.

पत्रकारों की एक विरल प्रजाति उंगली में गिने जा सकने वाले लोगों की पायी जाती है, जिनमें चिंतन-मनन की क्षमता होती है. इनकी लेखनी में इतना दम होता है कि वे सरकारों को हिला दें, जन मानस को झकझोर दें. लेकिन इन्हें भी पत्र से निकाल बाहर करने और कार छीने जाने का खतरा रहता है.

सोमवार, 12 जनवरी 2009

कुशाग्र की कविता

कुशाग्र ११ साल का एक बच्चा है. वह छठी कक्षा में पढ़ता है. उसकी दादी का देहावसान ८८-८९ साल की पूरी आयु में हुआ. उसकी दादी की मृत्यु के तीसरे दिन,जब घर में सम्वेदना जताने वाले लोगों और मेहमानों का तांता लगा था और पढाई का कतई माहौल नहीं था, मैंने उसे एक कापी में कुछ लिखते हुए पाया. जिज्ञासावश मैंने उसके पास जा कर देखा कि आख़िर वह ऐसी विषम स्थिति में कौन सा विषय पढ़ रहा है. वास्तव में वह अपने मन के उद्गार कविता द्वारा प्रकट कर रहा था. मुझे उसकी सम्वेदना, काव्य प्रतिभा और शब्द रचना ने प्रभावित किया. प्रस्तुत है ११ वर्षीय कुशाग्र की रचना :

तोहफे सी मिली थी,
कमल जैसी खिली थी
वह मेरे अपने लिए,
हर चीज़ से बड़ी थी


पाला उसने मुझको ,
जैसे उसका दुलारा
लोरी सुना सुलाती,
कहती तू है प्यारा


मैं उससे बतियाता
वह मुझसे खुश होती
मैं यदि दुःख बतलाता
तो वह ख़ुद से रोती.

भले तुझे हो कष्ट
मुझको सदा बचाया
हर पल तूने बढ़कर
कर्तव्य को निभाया.



मुझे नहीं ये ज्ञान था
होगा अब कुछ ऐसा
हे भगवन यह तूने
कर डाला है कैसा

पंख लगाए तूने
चिड़िया सम उड़ चली
करूंगा पूरे सपने
जो तू देखकर उड़ पड़ी .

सोमवार, 5 जनवरी 2009

नव वर्ष पर ब्लोगों की काव्यात्मक प्रस्तुति

नव वर्ष पर अनेक ब्लोगर बंधुओं ने अपनी प्रस्तुतियां दी थीं. उनमें से जिन काव्य प्रस्तुतियों को मैं पढ़ पाया और मुझे अच्छी लगीं, उन्हें मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशा है जो बन्धु इन प्रस्तुतियों को नहीं पढ़ पाये थे, वे लाभान्वित होंगे.

सबसे पहले मैं उल्लेख कर रहा हूँ गौतम राजरिशी जी का. उन्होंने नव वर्ष पर एक बहुत सुंदर गजल दी है. कुछ शेर प्रस्तुत हैं :

दूर क्षितिज पर सूरज चमका, सुबह खड़ी है आने को
धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को.

प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गूंजेगी
देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव पे बाण चढाने को.

साहिल पर यूँ सहमे सहमे वक्त गंवाना क्यों यारो
लहरों से टकराना होगा पार समंदर जाने को.
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
साल गुजरता सिखलाता है, भूल पुरानी बातों को
साज नया हो, गीत नया हो, छेड़ नए अफ़साने को

कवि योगेन्द्र मौदगिल की प्रस्तुति में उन्होंने नए साल के स्वागत में होने वाली अनेकों कुरूपताओं का वर्णन करते हुए अंत में बहुत मोहक बात कही है :

संभव है तो रखो बचा कर, थोड़ी शर्म उजाले की
अंधेरे आ कर समझाएं नए साल के स्वागत में.

परमजीत बाली ने अपने ब्लॉग 'दिशाएं' में पुराने साल की विदाई और नए साल का स्वागत अपनी प्रभावी प्रस्तुति से इस प्रकार किया :
मेरे सपनों को
साथ लेकर,
मेरे अपनों की
यादें देकर,
देखो !
वह जा रहा है...............
नया साल आ रहा है.

देव की प्रस्तुति 'नव वर्ष है नव प्रभात है' नाम से आई, जिसमें कुछ संकल्प लिए गए हैं, जिन्होंने मुझे प्रभावित किया :

पथ में कुछ मुश्किल तो होगी
कुछ बाधाएं सरल न होंगी
अंधियारों में चलना होगा
गम भी हमको सहना होगा
गीत नए फ़िर भी गढ़ना है
स्वपन सुनहरे सच करना है.

अभिव्यक्ति ने नए साल से पूछा है कि पिछले साल के इतने घावों के बीच भला उसका स्वागत कैसे किया जा सकता है. उन्होंने कामना की है :
दे देना
सवालों के जवाब
मुरझाये चेहरों को
संभावनाओं का आकाश
बुझी आंखों में
आशा है और विश्वास
सपनों को देना पंख
जो भर सके ऊंची उड़ान
दे दो ऐसा स्वर्णिम विहान.

पंडित डी. के. शर्मा "वत्स" ने अपने ब्लॉग में सुश्री संध्या की अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित रचना प्रस्तुत की. उस रचना के कुछ अंशों से ही रचना की मादकता का अंदाजा लग जाता है :

फिर से उम्मीद के नए रंग
भर लाएँ मन में नित उमंग

खुशियाँ ही खुशियाँ बेमिसाल
हो बहुत मुबारक नया साल

उपहार पुष्प मादक गुलाब
मीठी सुगंध उत्सव शबाब

शुभ गीत नृत्य और मधुर ताल
हो बहुत मुबारक नया साल


मुझे खुशी है कि ब्लॉग जगत में प्रभावी रचनाएं पढने को मिल रही हैं. भविष्य में भी कोशिश करूंगा कि जो अच्छा लगे उसे यहाँ प्रस्तुत करुँ.

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

प्रिये कहो ना..........

तुमने मेरे उर की सूनी वीणा को झंकृत कर डाला
तुमने मेरे मन की ऊसर बगिया को सिंचित कर डाला.
तुमने ही तो मुझ मूरख को सरस प्रेम का पाठ पढ़ाया
फ़िर क्यों छीन लिया मुझसे,तुमने यह प्याला, ओ मधुबाला.

मैं तो तट पर बैठा,सागर की लहरों को ही गिनता था
उन लहरों में खो कर मैं अपने प्रिय को देखा करता था
तुमने पार लगाने का कह, मुझको नैया पर बिठलाया
फ़िर क्यों आज डुबोया मुझको, मैं क्या तेरा अरि लगता था?

मैं डूबा हूँ, तुम उतराते, जाओ पैरो, पार लगो ना
मेरा तो अब ह्रास हुआ है, जाओ मुझसे दूर, बचो ना.
किंतु सोचता हूँ यह मन में, तुम सुख से रह पाओगे क्या?
पछताओगे नहीं कभी क्या, इस करनी पर प्रिये, कहो ना.

रविवार, 28 दिसंबर 2008

प्यार किया तो डरना क्या

(समापन किश्त)

प्यार और गुस्से का भी आपस में गहरा रिश्ता है. 'अमीर' मीनाई उसे इस तरह बयां करते हैं :
उनको आता है प्यार पर गुस्सा
हमको गुस्से पे प्यार आता है.

मियाँ गालिब इश्क पर चुप रहें ,ये हो ही नहीं सकता. बानगी देखिये :
इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश 'गालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने.

मधुशाला के कवि बच्चन जी ने अपने 'एकांत गीत' में कहा :
प्यार तो उसने किया है
प्यार को जिसने छिपाया.

और भी :
प्यार,हाय मानव जीवन की सबसे भारी दुर्बलता है
मेरा जोर नहीं चलता है.

सुदर्शन द्वारा लिखी गयी एक कहानी है- धर्मसूत्र. उसमें वे कहते हैं :
हम जिन्हें प्यार करते हैं उनके बारे में हमें प्रायः भयंकर आशंकाएं ही सताती हैं बेगानों के सम्बन्ध में ऐसे विचार हमारे मन में कभी नहीं आते.

प्रख्यात लेखक गोर्की के उपन्यास 'माँ' का एक वाक्य देखिये :
एक प्रेम ऐसा भी होता है जो मनुष्य के पैर की जंजीर बन जाता है.

कथाकार मार्कंडेय की एक कहानी है - प्रिया सैनी. उसमें वे कहते हैं :
प्रेम का कुछ ऐसा ही बेतुका मर्म है जिसे तर्क और समझ में नहीं बांधा जा सकता.

इस शेर में शायर ने प्रेम का इजहार करने के लिए प्रेयसी से ही मशविरा मांग लिया है. :
इस जज्बए दिल के बारे में ,इक मशविरा आप से लेता हूँ
उस वक्त मुझे क्या लाजिम है जब तुम पै मेरा दिल आ जाए.

डाक्टर भगत सिंह ने अपने शोध प्रबंध 'हिन्दी साहित्य को कूर्मांचल की देन' में प्रेम की व्याख्या कुछ इस तरह से की है :
प्रेम मानव जीवन में सबसे रहस्यमय व्यापार है शायद इसी लिए हजारों काव्य लिखे जा चुकने के बाद भी यह विषय सदैव नया रहता है. साहित्यकार और पाठक दोनों ही इससे नहीं अघाते हैं.वास्तव में प्रेम की दुनिया इतनी विचित्र है, उसका उद्गम और अंत इतना रहस्यमय है कि संसार के महान साहित्यकार भी उसकी पूरी व्याख्या तथा चित्रण नहीं कर पाये हैं.

आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर प्रेम के प्रतिदान या प्रेम की सफलता को महत्वपूर्ण नहीं मानते.वे प्रेम में समर्पण के महत्व को इस तरह इंगित करते हैं :
क्या एकतरफा प्रेम कम शक्तिशाली होता है ? प्रत्युत्तर न मिलने पर भी क्या प्रेम अपने आप में मधुर नहीं होता ?प्रेम में सफलता ही उसके होने का प्रमाण नहीं है.मन ही मन किसी के लिए अपने को विसर्जित किया जा सकता है.

यशपाल की सुनिए :
अच्छे समझे जाने या प्यार पाने के विश्वास से मस्तिष्क में एक सरूर छा जाता है.

और अब हिन्दी - उर्दू के लोकप्रिय कथाकार कृशन चंदर की रचनाओं से प्रेम के बारे में कहे गए कुछ अंश :

प्रेम की भावना पानी के प्रवाह की तरह होती है.प्रेम को रास्ता दे दो तो वह समाज के खेतों में जज्ब हो जाता है और बच्चों की फसल पैदा करने के काम आता है.रास्ता न दो और बाँध बना कर रोक दो तो पानी की तरह इकठ्ठा हो कर उमड़ता है और बिजली पैदा करता है - वह बिजली जो कभी तो प्रेम करने वालों के घर को ज्योतिर्मय कर देती है और कभी उन्हें जला कर राख कर देती है.(कहानी : आओ मर जाएँ)

शादी के बाद झगड़े इस लिए ज्यादा होते हैं कि दोनों मोटे शीशे के चश्मे लगा कर एक - दूसरे को देखने लगते हैं. थोड़ी सी दूरी रहे, हल्के से प्रेम का धुंधलका रहे तो प्रेम वर्षों सलामत रहता है. निकटता आयी नहीं कि प्रेम गायब.
(आधा रास्ता : उपन्यास)

जब प्रेम ख़त्म हो जाता है तो बदला बेकार हो जाता है. बदला लेने की इच्छा प्रकट करती है कि कहीं पर मोहब्बत की चुभन बाकी है. (आधा रास्ता)

कबीले के प्रेम का एक सिद्धांत था. फ़िर सामंतशाही प्रेम का एक सिद्धांत था और वह कबीले के प्रेम के सिद्धांत से भिन्न था.फ़िर जाति - पाँति के प्रेम का एक नया सिद्धांत बना. आगे शायद इन्सानियत का ज़माना आए जहाँ इससे भी अच्छे प्रकार के पेम का सिद्धांत बनाया जाए. (एक वायलिन समंदर के किनारे : उपन्यास)

अंत में कविवर भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए समाप्त करता हूँ :
कितने भी गहरे रहें गर्त
हर जगह प्यार जा सकता है,
कितना भी भ्रष्ट ज़माना हो
हर समय प्यार भा सकता है,
जो गिरे ह्युए को उठा सके
इस से प्यारा कुछ जतन नहीं,
दे प्यार उठा न पाये जिसे
इतना गहरा कुछ पतन नहीं

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

प्यार किया तो डरना क्या

आज कुछ प्यार मोहब्बत की बातें - किसी शायर ने कहा भी है :
इश्क के मकतब में मेरी आज बिस्मिल्लाह है
मुंह से कहता हूँ अलिफ़, दिल से निकलती आह है.

और शायद इसी प्यार मोहब्बत का मारा कोई शायर कहता है :
नासह मत दे नसीहत जी मेरा घबराय है
मैं उसे समझूं हूँ दुश्मन जो मुझे समझाय है.

तारा शंकर बंदोपाध्याय अपने उपन्यास महाश्वेता में प्रेम के बारे में कहते हैं :
श्रद्धा प्रेम है,स्नेह भी प्रेम है और प्रेम भी प्रेम है.

स्त्री की चाहत के बारे में इला चन्द्र जोशी ने कुछ यों लिखा है :
नारी का मन ऐसा रहस्यमय है कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में वह समझती है कि वह उससे घृणा करती है, अक्सर उसी को वह अंतस्तल में सबसे अधिक चाहती है.

उधर बेधड़क बनारसी प्यार में कुछ इस तरह तड़पते हैं :
प्रेयसी,चाँद यदि तुम बनोगी, दिल अपोलो बनेगा हमारा
हम गरीबों ने है यह पुकारा , नेशन्लाइजेशन हो हुस्न सारा

प्यार में आहत हो किसी शायर ने यों कहा :
नजर की राह से दिल में उतर के चल देना
यह रास्ता बहुत अच्छा है आने जाने का

मोहब्बत करने वाले की दशा पर शेख गुलाम हमदानी 'मुसहफी' ने कहा :
कुछ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूं के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं

आगा जान 'ऐश' मानते हैं कि इश्क छुपाया नहीं जा सकता :
इश्क और मुश्क छुपाये से कहीं छुपता है
दर्दे दिल लाख छुपाया पे छुपाया न गया

शायर अकीन इश्क को लाइलाज मानते हैं :
काबे भी मैं गया, न गया बुतों का इश्क
इस मर्ज की खुदा के घर में भी दवा नहीं

शेफ्ता मोहब्बत की परिभाषा यों देते हैं :
शायद इसी का नाम मोहब्बत है ' शेफ्ता '
इक आग सी है सीने के अन्दर लगी हुई ।
(क्रमशः)

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

कहानी

मुआवजा
(अन्तिम कड़ी)

शहर का माहौल उन दिनों असमंजसपूर्ण चल रहा था.हादसे में मरने वालों की संख्या रेडियो जहाँ हजार - डेढ़ हजार बता रहा था वहीं समाचार पत्र पाँच से दस हजार के बीच बताते थे.हरी सिंह और देबुली अपने को भाग्यशाली समझते थे कि वे लोग न तो मरे और न अत्यधिक गंभीर रूप से बीमार हुए.इंदर अलबत्ता कुछ ज्यादा परेशान हुआ था और उसे उल्टी भी हुई थी, लेकिन जहाँ हजारों लोग मर गए हों,असंख्य उल्टी और आँखों की जलन के शिकार हो गए हों,वहाँ इतनी छोटी सी तखलीफ़ से छुट्टी मिल जाना खुशकिस्मती ही थी. लेकिन स्वयं इंदर इतना घबरा गया था कि जब 'आपरेशन फेथ' के दौरान हरी सिंह सपरिवार भोपाल छोड़ कर अपने गाँव तक हो आया तो इंदर ने अपनी चाची के दुर्व्यवहार के बावजूद उन्हीं के पास रहने की इच्छा प्रकट की और हरी सिंह इंदर को काफलीगैर ही छोड़ आया.

हरी सिंह जब कभी सपरिवार अपने गाँव जाता तो बचे नाथ को अपने क्वार्टर की जिम्मेदारी सौंप जाता.लेकिन इस बार तो बचे नाथ क्या कोई भी आस पड़ोस में नहीं बचा था.सभी अपने अपने परिचितों - सम्बन्धियों के पास जा चुके थे.इस लिए हरी सिंह जितने दिन अपने गाँव रहा उसे यही चिंता सताती रही कि कहीं उसके क्वार्टर का ताला टूट न जाए और वर्षों की मेहनत से जमी गृहस्थी, जिसमें एक सोफा, गैसचूल्हा,कुकर,एक रेडियो,अलमारी और कुछ स्टील के बर्तन थे,उजड़ न जाए. लेकिन जब लौटने पर उन्हें अपनी गृहस्थी सही सलामत मिली तो हरी सिंह और देबुली ने ईश्वर को धन्यवाद दिया. देबुली ने तो गुफा मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने का संकल्प भी कर लिया.

दिन बीतते गए. गैस काण्ड की चर्चा तो होती रहती लेकिन लोगों के दिल से सदमा उतरने लगा था. इधर सरकार ने राहत देने की कवायद शुरू कर दी.मुफ्त राशन दिया जाने लगा.जब पहले महीने हरी सिंह मुफ्त राशन लाया तो देबुली की खुशी का ठिकाना न था और साल के अंत में जब राशन मिलना बंद हुआ तो मायूस हुई थी वह, लेकिन उसने हिसाब लगा लिया था कि अगले तीन - चार महीने और वह जमा राशन से काम चला लेगी. देबुली की खुशी तब और बढ़ी जब शासन की तरफ़ से पन्द्रह सौ रुपये राहत राशि की घोषणा की गयी. इस बीच मुआवजे हेतु क्लेम फॉर्म भरे जाने लगे और जब हरी सिंह पन्द्रह हजार रूपये का क्लेम भर कर आया तो देबुली ने उसकी मोटी बुद्धि पर खूब लानत भेजी. पड़ौसी लोग पचास हज़ार और एक लाख तक का क्लेम लगा आए थे और एक हरी सिंह था कि पन्द्रह हज़ार पर संतोष कर रहा था.

पन्द्रह सौ रूपये भी हरी सिंह को अब तक नहीं मिल पाये थे. इस कारण भी देबुली हरी सिंह से रुष्ट थी.वास्तव में गलती हरी सिंह की ही थी. जब सर्वे हो रहा था तो हरी सिंह ने अपनी आय सात सौ पिचहत्तर रुपये लिखवा दी थी जो उसकी वास्तविक आय थी,जबकि राहत पाने के लिए आय पाँच सौ रूपये होनी चाहिए थी. अंत में इसका भी निराकरण हो गया. देबुली ने ही ख़बर दी -'पन्द्रह सौ रूपये के लिए पुतली घर में फ़िर से नंबर लग रहे हैं बल.जाओ, छुट्टी ले कर नंबर लगा आओ. हाँ इस बार राजा हरिश्चंद्र मत बन जाना. और जब हरी सिंह के पास पन्द्रह सौ रूपये की पर्ची आ गयी तो देबुली ने इसे अपनी बुद्धिमत्ता का प्रसाद माना.

जब पन्द्रह सौ रूपये प्राप्त करना देबुली के दिमाग की उपज थी तो उसका उपयोग करने के लिए भी वह स्वतंत्र थी. बहुत दिनों से देबुली की इच्छा एक टी वी लेने की थी, लेकिन पैसों का जुगाड़ नहीं बन पाता था. अंततः गैस देवी की कृपा से हरी सिंह ने एक टी वी खरीद ही लिया. बुधवार को टी वी आया था और आज सेकंड सेटरडे था. हरी सिंह और देबुली बड़ी प्रसन्नता से टी वी में दिन का कार्यक्रम देख रहे थे. इसी समय तारवाला एक टेलीग्राम दे गया. तार काफलीगैर से था - इंदर की मौत का.

भोपाल से जाने के बाद से ही इंदर सहमा सा रहता . थका - थका बीमार सा रहता. यद्यपि प्रकट में ज्वर आदि नहीं रहता.गाँव में कभी कभार वैद्य जी से दवा ले लेता. एक - दो बार झाड़ फूंक भी की. लेकिन सब व्यर्थ. इंदर बच न सका. हरी सिंह गहरे सोच में डूब गए - कहीं गैस का ही असर तो नहीं ? कहीं हम लोग भी अन्दर से खोखले तो नहीं होते जा रहे ?

रात हुयी . हरी सिंह को नींद नहीं आ रही थी. देबुली को भी. हरी सिंह का दुःख गहराता जा रहा था. देबुली हरी सिंह की दशा देख कर कुछ बोलने का साहस न जुटा पायी,लेकिन सोच रही थी - इंदर को भी गैस लगी थी, कुछ लिखा - पढी करके इंदर का मुआवजा नहीं मिल सकेगा क्या ?

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