रविवार, 16 मई 2010

रोजगार चाहिए ? आर. टी. आइ कार्यकर्ता बनें

यह कहना गलत होगा कि सरकार आम जन के लिए कुछ करती नहीं है। समय समय पर शासन द्वारा अनेक जनोपयोगी योजनायें तैयार की गयीं। आजकल समाचार चेनलों पर अन्त्योदय कार्यक्रम का नाम प्राय: सुनने में आ रहा है। अन्त्योदय योजना स्वर्गीय श्री भैरों सिंह शेखावतजी ने सर्वप्रथम राजस्थान में शुरू की थी, जिसका अनुसरण बाद में अनेक राज्यों ने किया। वह योजना कहाँ तक सफल हुई, मैं नहीं जानता। पहली अप्रेल से शिक्षा का अधिकार योजना शुरू की गयी है,इसका हश्र देखना बाकी है।

इसी तरह का एक अन्य अधिकार आम जनता को मिला है- सूचना का अधिकार। सूचना का अधिकार ( आर. टी. आइ. ) एक अच्छा साधन है शासन के कार्यों में पारदर्शिता लाने का। इसके माध्यम से शासकीय भ्रष्टाचार में कमी आनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं। एक ओर समाचार मिल रहे हैं कि अधिकारी सूचना देने में अड़ंगा डालते हैं या टालमटोल करते हैं,वहीं कुछ लोगों ने इसे ब्लेकमेलिंग का जरिया बना लिया है। कुछ लोग , जो अपने को आर.टी.आइ कार्यकर्ता कहते हैं,शासकीय भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा मांगने लगे हैं। हिस्सा न मिलने पर ये सूचना के अधिकार के तहत उनकी पोल खोलने की धमकी देते हैं। घाघ अधिकारी जानते हैं कि पोल खुलने से भी किसी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं, फिर भी ऐसे लोगों का मुंह बंद करना अच्छा है,यह सोचते हुए सामने वाले की औकात का अनुमान लगा कर टुकडा डाल देते हैं।

क्या सूचना के अधिकार की यही उपयोगिता है ?

शनिवार, 8 मई 2010

हाड़ तोड़ प्रायवेट नौकरी या निकम्मी सरकारी ?

कुछ दिनों पहले एक समाचार पढ़ा था - आइ आइ टी और आइ आइ एम से निकलने वाले स्नातक अब मोटा वेतन देने वाली प्राइवेट कंपनियों के मुकाबले पी एस यू को तरजीह देने लगे हैं । समाचार के अनुसार हाल ही में मंदी का दौर देख चुके इन लोगों को मोटी तनख्वाह के मुकाबले नौकरी का स्थायित्व अधिक लुभा रहा है।

दो दिन पूर्व एक सरकारी दफ्तर में कार्यवश जाना हुआ। वहाँ मुझे पंद्रह मिनट रुकना पडा। इस दौरान मैं वहाँ के कुछ कर्माचारियों का वार्तालाप सुनता रहा-
एक मैडम - हमारे पड़ोसी की लड़की प्राइवेट कंपनी में काम करती है। सुबह सात बजे निकल जाती है रात के नौ बजे तक आती है। बड़ी खराब नौकरी है प्राइवेट की।
दूसरी मैडम - ये लोग पैसे तो अच्छे देते हैं, लेकिन खून चूस के रख लेते हैं।
तीसरे बाबू जी - इसके अलावा कभी भी नौकरी से छुट्टी कर सकते हैं। सरकारी नौकरी में जॉब सिक्युरिटी तो है।
पहली मैडम -जो प्राइवेट में नौकरी करता है वह ४० साल की उम्र में ही बीमारियों से घिर जाता है.

मेरे पिताजी ने रिटायरमेंट के बाद १३ साल तक पेंशन ली। उनकी मृत्यु के ३७ साल बाद तक मेरी माता जी ने मृत्युपर्यंत पिताजी की सरकारी सेवा के कारण पेंशन प्राप्त की ।

सारांश यही कि सरकारी नौकरी के अनेक सुख हैं । सरकार अपने सेवकों को सुविधायें दे रही है, यह एक अच्छी बात है,लेकिन सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि कोई परमानेंट सरकारी कर्मचारी अपना काम नहीं करता तो उसको नौकरी से निकालना तो दूर सख्त कार्यवाही करना भी आसान नहीं। यदि कोई कर्मचारी किसी कारणवश निलंबित हो जाय तो उसकी बहाली ९९% निश्चित जानिये।

जिन दफ्तरों का कार्यकाल १०-३० से ५-३० तक है वहां कर्मचारी ११ बजे बाद आना शुरू होते हैं। पूरी उपस्थिति १२-१२.३० बजे बाद ही दिखाई देती है। कुछ कर्मचारी तो कुछ दिनों में एक बार केवल हस्ताक्षर करने और वेतन लेने आते हैं। एक कार्यालय में एक महिला कर्मचारी न केवल अत्यधिक विलम्ब से आती थी वरन अपना निर्धारित काम भी पूरा नहीं करती थी। अधिकारी ने अनेक बार मौखिक चेतावनी दी।लेकिन महिला के कान पर जूँ भी नहीं रेंगी । अंत में उसको लिखित चेतावनी दी गयी। जवाब में महिला ने अनुसूचित जाति थाने में रिपोर्ट कर दी - चूंकि मैं अनुसूचित जाति की हूँ और मेरा लड़का इंजीनियरिंग की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है और अधिकारी सवर्ण है ,इस लिये चिढ़ कर मुझे परेशान कर रहा है। हार कर अधिकारी ने महिला का काम अन्य कर्मचारी को सौंप दिया। यह सब मैं सुनी सुनाई बातों या कपोल कल्पना के अनुसार नहीं बल्कि अपनी व्यक्तिगत तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर लिख रहा हूँ।

मैं निश्चित नहीं कर पा रहा हूँ कि नयी पीढी को प्रायवेट नौकरी में हाड़ तोड़ मेहनत करने की सलाह दूं या सरकारी नौकरी में जा कर निकम्मा बन जाने की ?

रविवार, 2 मई 2010

नारी तुम कौन हो?

'नारी' पर या 'नारी' को लेकर समय समय पर बहुत कुछ लिखा गया है और लिखा जाता रहा है। लिखने वालों में अधिकांश पुरुष होते हैं। मैं 'नारी' पर स्वयं कुछ न लिख कर केवल यह बताना चाता हूँ कि विभिन्न लोगों ने विभिन्न रूप से नारी पर क्या लिखा है।
प्रसाद जी की यह पंक्ति तो प्रसिद्ध है ही-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो

वीरेंद्र पाण्डेय अपने उपन्यास 'सिन्धु की बेटी' में कहते हैं -
औरत को इस हद तक इज्जत बख्शी गयी कि वह खुदी को भूल गयी , अपने आप ही बेइज्ज़त हो खाक में मिलती गयी। ....कहीं उसे नाज़नीन और मलिका कह कर हर काम से अलग किया गया तो कहीं उसे देवी और लक्ष्मी कह कर बुतों की पंगत में बिठा दिया गया।

मनोज वसु के उपन्यास 'सेतुबंध में स्त्री पात्र कहती है-
मैं अगर देवी ही हूँ ,तो महज पत्थर की मूरत ही हूँ - सभी मुझसे डरते हैं,कोई प्यार नहीं करता।

शि. चौगुले का मराठी उपन्यास जिसका हिन्दी अनुवाद 'जमींदार की बेटी' नाम से हुआ है, कहता है-
स्त्रियों का सर जब तक ढंका रहता है तब तक वे स्त्रियाँ रहती हैं,उनकी लाज यदि एक बार भी उड़ जाती है तो वे गनिका जैसी हो जाती हैं।

प्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय श्री इला चन्द्र जोशी कहते हैं -
नारी का मन ऐसा रहस्यमय है कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में वह समझती है कि वह उससे घृणा करती है, अक्सर उसी को वह अंतस्तल से चाहती है.

श्री जोशी मनोवैज्ञानिक लेखन के लिये जाने जाते रहे हैं। हमें उनका यह कथ्य विचित्र लग सकता है -
एक अवास्थाप्राप्त नारी में (विशेषकर जो माँ भी हो) मातृत्व की सहज अभिव्यक्ति उतनी आकर्षक नहीं होती, जितनी वह एक ऐसी किशोरी कुमारी या नवयुवती में होती है जिसे अभी तक वैवाहिक जीवन का तनिक भी अनुभव न हुआ हो।

मोहनलाल महतो 'वियोगी' के उपन्यास 'महामंत्री' की पंक्तिया हैं
एक नारी क्या चाहती है?वह चाहती है अपने पति पर पूर्ण आधिपत्य। यदि उसका पति ईश्वर के प्रति भी अनुराग प्रकट करता है तो वह नारी ईश्वर की बैरिन बन जाती है..........अगर वह बल से ईश्वर को हरा नहीं सकती तो अपनी दहकती हुई घृणा उन पर उड़ेल देगी और यह इसलिए की उन्होंने उसके पति की स्नेह की धाराओं को अपनी और मोड़ दिया है ।

लियो यूरिस की कृति एक्सोडस के शब्द -
नारी पुरुष की शक्ति है। शक्ति के सामने घुटने टेकने में लाज कैसी ?

कुछ अन्य उद्धरणों पर दृष्टिपात कीजिये-
हम स्त्री की लाल आँखें देख सकते है; पर उसकी सजल आँखें नहीं देख सकते। उस समय हमारा दिल दया का सागर बन जाता है।

पुरुष जब भीतर से टूटने लगता है तो नारी का सहज स्नेह उसे संबल दे पाता है। नारी, चाहे वह माँ हो, बहन हो,पत्नी हो, मित्र हो..

और अंत में कविवर सुमत्रा नंदन पन्त, की पंक्तियाँ -
यदि स्वर्ग कहीं है इस भू पर ,तो वह नारी उर के भीतर
दल पर दल खोल ह्रदय स्तर
जब बिठलाती प्रसन्न हो कर
वह अमर प्रणय के शतदल पर ।

मादकता जग में कहीं अगर ,वह नारी अधरों में सुखकर
क्षण में प्राणों की पीड़ा हर
नवजीवन का दे सकती वर
वह अधरों पर धर मदिराधर।

यदि कहीं नरक है इस भू पर , तो वह भी नारी के अन्दर
वासनावर्त में डाल प्रखर
वह अंध गर्त में चिर-दुस्तर
नर को धकेल सकती सत्वर।












रविवार, 25 अप्रैल 2010

स्वप्न विश्लेषण

सपनों की अपनी अलग महिमा है। इस विषय पर काफी विस्तार से अनुराग शर्मा जी ने अपने ब्लॉग में लिखा है। फ्रायड ने सपनों को दमित काम वासना से जोड़ा है। डाक्टर एस. केपरियों ने अपनी पुस्तक में प्राय: देखे जाने वाले सपनों का विश्लेषण इस प्रकार किया है -

धन प्राप्त होने का स्वप्न - निर्धनता अथवा आर्थिक चिंता

रोमांस स्वप्न- प्रेम की तृष्णा

नीचे गिरने का स्वप्न - समाज द्वारा निषेध या किसी कामना के अपूर्ण होने का भय।

दिवंगत संबंधी से बातचीत- उसकी मृत्यु के तथ्य को न स्वीकार पाना अथवा दुनिया से ऊब कर मर जाने की इच्छा

लूट लिया जाना - आर्थिक संकट का भय

हिंस्र पशुओं का आक्रमण- यौन असमर्थता का भय

शव यात्रा - मृत्यु भय

यात्रा-स्वप्न - वास्तविकता से पलायन की इच्छा

लेट हो जाना, गाडी छूट जाना ( महिलाओं में ) - यौन असमर्थता

असफलता अथवा दिवालियापन (प्रौढ़ पुरुषों में ) - नपुंसक सिद्ध होने का भय

जीवित संबंधी अथवा मित्र की म्रत्यु- व्यक्ति की अपरोक्ष मृत्यु की कामना

सबके सामने नग्न या अर्धनग्न किया जाना - नैतिक प्रतिबंधों से स्वच्छंदता की कामना

धमकाया जाना या खतरे में पड़ जाना - दुर्भाग्य घटने का भय

चोरी करना - दमित अपराध वृत्ति

प्रेम पात्र को हानि पहुंचाना - सम्बंधित व्यक्ति से प्रतिशोध लेने की इच्छा

जेल जाना - संघर्ष

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

आपकी नीद आपकी पोल खोल देती है.

जब व्यक्ति सो रहा होता है तो वह अपने व्यक्तित्व को उदघाटित कर रहा होता है.देखिये कैसे -

गोल हो कर सोना - डरपोक प्रकृति।

लिहाफ में मुंह ढँक कर सोना - जीवन के तथ्यों से डर कर उनका सामना न कर पाना, असुरक्षा की भावना।

बार- बार बेचैनी से करवट बदलना - मस्तिष्क में विरोधाभासी तत्वों का काम करना या कोई बड़ी समस्या
सामने होना।

पीठ के बल फ़ैल कर सोना - संतुष्ट जीवन, असुरक्षा की भावना का न होना।

पेट के बल सोना - जीवन के तथ्यों से मुंह चुराना।

करवट से सोना - व्यर्थ के पचड़ों में न पड़ना, रिस्क न लेना, सदा सतर्क रहना।

अब आप स्वयं ही अपने सोने की आदत से अपने स्वभाव का आकलन कर लीजिये।

रविवार, 28 मार्च 2010

जागो ग्राहक जागो उर्फ़ निरीह उपभोक्ता

उपभोक्ता के हित हेतु सरकार सजग है। विज्ञापन के जरिये ग्राहक को जगा कर सरकार स्वयं सो जाती है। सरकार का साफ़ साफ़ कहना है कि ग्राहक सरकार की नींद में खलल न डाल कर सीधे उपभोक्ता संरक्षण एजेंसी के पास चला जाए। ग्राहक बेचारा परेशान - किस किस की शिकायत करे। मोबाइल कंपनियों को ही ले लें। अभी कुछ दिन पहले तक तो सरकार ने ही मोबाइल कंपनियों से कह रखा था की ग्राहक की एक सेकण्ड बात के लिए वह एक मिनट का शुल्क (साठ गुना) वसूल सकती है। यदि आप अत्यधिक सजग हैं तो पायेंगे कि कम्पनियां आपके प्रीपेड बेलेंस में से निर्धारित शुल्क से अधिक काट ले रही है। एक उपभोक्ता ने प्रतिष्ठित कंपनी 'आइडिया' का एक प्लान लिया जिसमें १२ घंटे बाद कम दरों में बात होनी थी। जब ३६ घंटों बाद भी दरें कम नहीं हुईं तो ग्राहक ने कंपनी के कॉल सेंटर में शिकायत करी। उसको उत्तर मिला बात करने के पहले स्वयं चेक कर लेना चाहिए कि प्लान लागू हुआ या नहीं। इस बेहूदे उत्तर से कुपित हो ग्राहक ने ई मेल द्वारा कंपनी के ही वरिष्ठ अधिकारी से शिकायत की। लेकिन उसे कोई उत्तर नहीं मिला।लाचार ग्राहक ने दूसरी कंपनी की शरण ले ली।

बाजार में अनेक वस्तुएं उन पर अंकित मूल्य से बहुत कम में बिक रही हैं । अर्थात इन वस्तुओं पर अत्यधिक मार्जिन रखा गया है। ऐसे में कोई दुकानदार अंकित मूल्य पर ही सामग्री बेच देता है तो ग्राहक सारे उपभोक्ता सरंक्षण दावों के बावजूद निरीह ही रहेगा। कुछ दिन पहले घुघूती जी के ब्लॉग पर बाजार में बिक रहे प्रदूषित फलों और सब्जियों के बारे में पढ़ा था। एक अन्य ब्लॉग में रीडर्स डायजेस्ट द्वारा ग्राहकों से की जा रही धोखाधड़ी (जिसका मैं स्वयं भी शिकार हुआ हूँ) के बारे में पढ़ा। नमकीन, बिस्कुटों और अन्य खाद्य पदार्थों, साबुनों आदि की पैकिंग २५० ग्राम से २००,१८५,१८० १७० ग्राम कब हो गयी ग्राहक को यह पता ही नहीं चल पाता। मिलावटी और नकली दूध, मावा और घी ग्राहक खरीदने को मजबूर है।

जागो ग्राहक क्योंकि सरकार हेडली, नक्सली और थरूर को लेकर थक कर सो चुकी है।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

नास्त्रेदमस, नारायण दत्त श्रीमाली की भविष्यवाणी और संगीतापुरी का तुक्का

इस पोस्ट को लिखने की प्रेरणा मुझे संगीतापुरी जी की भूकंप संबंधी भविष्यवाणी से मिली उनके द्वारा दी गयी समय सीमा के अन्दर हैती में भूकंप आ गया । यद्यपि घटना दुखद थी किन्तु आनेवाली घटना का पूर्व अनुमान लगा लेने के लिए संगीताजी साधुवाद की पात्र हैं। आने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान लगा कर तदनुसार अपनी रणनीति तैयार की जा सकती है।

सोलहवीं सदीके भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियाँ तो प्रसिद्ध हैं ही। यदि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी भविष्यवाणियाँ बार बार सच साबित हो रही हों तो उसे तुक्का या संयोग मान कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता। हमें उस विधा की दाद देनी चाहिए जो सटीक पूर्वानुमान लगाने में सक्षम है।

१९ जून १९६९ के दैनिक हिन्दुस्तान में प्रसिद्ध ज्योतिषी नारायण दत्त श्रीमाली की भविष्यवाणियाँ छपी थीं:
- १९७२ के आम चुनावों में कांग्रेस विजयी होगी.
-१९६९ का उत्तरार्ध और १९७० का पूर्वार्ध अरब राष्ट्रों विशेषकर राष्ट्रपति नासिर के लिए संकटों और संघर्षों का रहेगा।
-श्रीमती जेक्वेलिन( पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी की पूर्व पत्नी) और ओनासिस (उसके नए पति) का तलाक १० जून १९७३ से ८ अगस्त १९७४ के बीच हो जाएगा.
ये भविष्यवाणी सच साबित हुईं . लेकिन १९७५ तक भारत-पाक महासंघ बन जाने की भविष्यवाणी गलत निकली।
अब इसमें कितना तुक्का था और कितनी गणना , यह श्री श्रीमाली ही जानें।

समय समय पर और विशेष रूप से वर्ष के प्रारम्भ में ज्योतिषियों द्वारा अनेक भविष्यवाणीयाँ की जाती हैं जिनमें कुछ सच निकलती हैं और कुछ झूठ। जिनकी अधिकतर भविष्यवाणी सच निकले उनकी भविष्यवाणी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, चाहे वह तुक्का ही क्यों न हो।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

सिंहल और जीरामन



मेरा मानना है -पाक कला या व्यंजनों के बारे में संजीव कपूर जैसे लोग लिखें तो उसकी अहमियत है। लेकिन जब विभिन्न व्यंजनों के बारे में वीर संघवी और पुष्पेश पन्त के लेख राष्ट्रीय पत्रों में पढ़े तो मुझे लगा जो राजनीति, समाज और साहित्य आदि के बारे में लिख सकता है उसे खाने के बारे में लिखने का भी अधिकार हासिल हो जाता है। इसी नाते मैंने जबरदस्ती यह अधिकार हासिल कर आज एक कूर्मांचलीय व्यंजन और जैन समाज में लोक प्रिय एक चूर्ण के बारे में लिखने का संकल्प कर लिया।

चित्र में दिख रहा व्यंजन कूर्मांचलीय व्यंजन सिंहल है,जो चावल के आटे में शुद्ध घी का मोयन दे कर दही में दो तीन घंटे भिगो कर बनाया जाता है। इसमें शक्कर भी मिलाई जाती है। स्वाद के लिए कुछ लोग इलायची, सौंफ भी मिलाते हैं। इस तरह के पेस्ट को हथेली की मुट्ठी में भर कर घी या तेल में जलेबी के आकार का तल लिया जाता है। कूर्मांचल में त्योहारों में पकवान के रूप में इसे बनाया जाता है। वहां बुजर्ग महिलाएं इसे बनाने में माहिर होती हैं। अब कुछ महिलाएं चावल के आटे के स्थान पर सूजी ( रवा) का प्रयोग करती हैं। अनेक कूर्मांचलीयों की तरह मुझे भी यह व्यंजन बहुत पसंद है। मैं खुश किस्मत हूँ कि मेरी पत्नी इसे बना लेती है और प्रायः नाश्ते के रूप में यह व्यंजन मुझे मिल जाता है। कुछ लोग इसे ककड़ी के रायते में भिगो कर खाना पसंद करते हैं। मुझे 'जीरामन' के साथ सिंहल खाना भी रुचिकर लगा। संभवतः यह व्यंजन सम्पूर्ण भारत में केवल कूर्मांचल में ही बनता है। लेकिन वहां भी इसका स्वाद लेने के लिए किसी घर की शरण लेनी पड़ेगी क्योंकि बाजार में कहीं भी इसका व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता।



'जीरामन' एक प्रकार की सूखी चटनी है जो अनेक मसालों को मिला कर बनायी जाती है और जैन समाज में अत्यंत लोकप्रिय है । इसका व्यावसायिक उत्पादन करने वाले एक व्यापारी ने मुझे बताया कि इसमें ८० प्रकार के मसाले मिलाये जाते हैं। लेकिन मुझे केवल १९ वस्तुओं की ही जानकारी मिल पायी। ये हैं - सादा नमक, मिर्च,अमचूर या आंवला,धनिया, हल्दी, काला नमक, जीरा,सौंफ,सौंठ,दाल चीनी, अजवाइन, लौंग,तेजपत्ता,बड़ी इलायची, सिया जीरा, जायपत्री,जायफल, हींग, हर्र। बहरहाल मसालों की संख्या जो भी हो लेकिन उनका उचित अनुपात ही जीरामन को इतना स्वादिष्ट बना पाता होगा। कूर्मान्चाली सिंहल जैनी जीरामन के साथ कुछ और ही स्वाद देता है।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

हिन्दी को बचाने के लिए हिन्दी ब्लोगर क्या करें

विभिन्न कारणों से लगभग पिछले दो माह से ब्लॉग जगत से दूर रहा. आगे भी कितना नियमित रह पाऊंगा निश्चित नहीं. इस बीच अनेक विचार उपजे, अनेक घटनाएं घटीं जिन्हें ब्लॉग में देने की इच्छा है. इस निमित्त अपना ब्लॉग खोला तो उसमें प्रिंट मीडिया द्वारा की जा रही हिन्दी की दुर्दशा पर मेरे
लेख
पर श्री शैलेश की टिपण्णी मिली, जिसके द्वारा इसी विषय पर श्री प्रभु जोशी द्वारा लिखे गए गंभीर लेख का
लिंक मिला. लेख पढने के लिए थोड़ा समय और थोड़ा धीरज मांगता है.लेख में कुछ गंभीर बातों का जिक्र किया गया है. श्री जोशी के अनुसार मध्य प्रदेश के एक समाचार पत्र के सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों को बाकायदा निर्देश दिए गए थे कि वे समाचारों में शुद्ध हिन्दी की अपेक्षा हिंग्लिश को तरजीह दें. उनके अनुसार इस हिंग्लिश का प्रयोग अनायास ही नहीं हो रहा है अपितु एक षडयंत्र के तहत सायास हो रहा है और धीरे धीरे देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि प्रयोग किये जाने का षडयंत्र रचा जा रहा है. यदि वास्तव में ऐसा है तो यह एक गंभीर बात है. इसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए. श्री जोशी ने इस प्रतिरोध का तरीका भी बताया है, जिसे उन्होंने स्वयं भी अपनाया. उनके अनुसार हिन्दी प्रेमियों को व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से ऐसे समाचार पत्रों को पत्र लिख कर अपना विरोध जताना चाहिए.
हिन्दी ब्लोगर भी अपना विरोध इसी तरह से दर्ज करा सकते हैं. बल्कि वे अपने ब्लॉग में भी इस षडयंत्र के विरुद्ध अवश्य लिखें. आखिर हिन्दी के बचे रहने पर ही हिन्दी ब्लोगिंग बची रहेगी.

सोमवार, 28 सितंबर 2009

दुर्गोत्सव से जुड़ी बुराइयाँ

दुर्गोत्सव सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर देश के कुछ भागों में जगह जगह झाँकियाँ लगा कर उत्सव मनाया जाता है।धार्मिक भावना,हर्षोल्लास और उमंग के इस त्यौहार के साथ अनेक बुराइयाँ भी जुड़ गयीं हैं। उनका निराकरण किया जाना चाहिए। निराकरण के उपाय कैसे अपनाए जाएँ , यह मैं स्वयं नहीं जानता। हाँ उन बुराइयों को इंगित अवश्य किए देता हूँ :-

१- अनेक स्थानों पर आयोजन हेतु जबरन चन्दा वसूली।
२- सार्वजनिक स्थानों पर इस प्रकार झाँकी लगा देना कि यातायात अवरुद्ध हो।
३- लाउड स्पीकरों के प्रयोग से आसपास रहने वालों को असुविधा उत्पन्न होना, जिनमें विद्यार्थी और बीमार भी शामिल हैं।
४- झाँकी स्थल पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित होना जो धार्मिक आयोजन के अनुरूप न हों।
५- विशालकाय मूर्तियों का विसर्जन, जो विसर्जन स्थल को प्रदूषित करता है।

- इन बुराइयों के निराकरण हेतु शहर के जिम्मेदार नागारिकों द्वारा स्थानीय स्तर पर त्यौहार समीतियाँ बना कर सभी मुहल्लों की समितियों पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

दुर्गोत्सव का सबसे उजला पक्ष कन्या पूजन है।यदि हम कन्या को पूज रहे हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि अपने दैनिक जीवन में भी हम कन्या को यथोचित सम्मान दें। अन्यथा एक दिन की हमारी यह पूजा कोरा कर्मकांड और दिखावे की धार्मिकता है.