सोमवार, 9 अगस्त 2010

जीवन सच या झूठ ?

एक मय्यत  में  गया  था | कुछ पुराने  परिचित मिल गए | आजकल पुराने परिचितों से मेल मुलाक़ात  शादी ब्याह के समारोहों या मय्यत में ही हो पाती  है | मिलने पर बात चीत  मृतक से शुरू हो कर परिवार, बच्चे और राजनीति तक पहुँचती है | मृतक  चौरासी साल की आयु के थे | मंदिर जाने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक दिल  का दौरा पडा और चल बसे |

आदमी  अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर चुके तो इसप्रकार चलते फिरते चले जाना अच्छा ही है- मैंने कहा |
मेरी हाँ  में हाँ मिलाई  अडसठ-सत्तर वर्ष के  जोशी जी ने |
हमारी पीढी खुशनसीब रही-अड़सठ-सत्तर वर्ष के ही भट्ट साहब ने कहा | हमसे पहले की पीढी पचपन- साठ साल में ही इस लोक से विदा हो जाया करती थी | हममें कुछ अवेयरनेस आई | अब  हमसे आगे वाली  पीढी भी पचास- साठ साल से ज्यादा नहीं जियेगी | दोनों मियाँ बीबी कमाते हैं खाना बनाने  का समय नहीं, होटल चले जाते हैं | 
होटल  जाने की भी जरूरत नहीं | फोन करो और घर पर ही खाना हाजिर  - पचास वर्ष से कम  आयु के महेश का मत था |

सहसा मेरा  ध्यान कुछ परिचितों   की ओर गया जो पैंतीस - चालीस की उम्र में ही हृदयाघात से चल बसे थे  | मैं सोचने लगा- क्या भट साहब के कथन में सच्चाई है ? क्या नयी पीढी को  मिल रहा मिलावटी,कीटनाशकयुक्त भोजन,फास्ट फूड, काम का   बोझ  और तनाव,अनियमित दिन चर्या उनकी आयु के लिये घातक  बनता जा रहा है ? क्या नयी  पीढी अपने कैरियर बनाने  और  अर्थोपार्जन के चक्कर में अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती जा रही है? यदि ऐसा है तो यह एक गंभीर चिंता की बात है | प्राथमिकता तो स्वास्थ्य को ही मिलनी चाहिए |

श्मशान घाट पहुंचे | वहां एक स्थान पर लिखा  था- जीवन झूठ  है | मृत्यु सच है |
मैं सहमत नहीं हो पाया | मृत्यु सच है | जीवन भी सच है | जीवन की परिणति मृत्यु है | झूठ  की परिणति सच कैसे हो सकती  है ? जीवन को जीना है स्वस्थ रह कर सार्थकता के साथ |

सोमवार, 2 अगस्त 2010

ब्लॉगिंग बन सकती है सामाजिक चेतना की प्रवर्तक - उदाहरण प्रस्तुत है

साहित्य और पत्रकारिता  ने सामाजिक चेतना जागृत की है - ऐसा प्रायः कहा जाता है | स्वतन्त्रता संग्राम के समय यह धारा संभवतः तीव्र थी | ठीक उसी प्रकार, बल्कि उससे भी अधिक ब्लोगिंग के जरिये भी सामाजिक चेतना या किसी आन्दोलन का प्रवर्तन और उत्प्रेरण किया जा सकता है | इस कार्य के लिये ब्लोगिंग अधिक अनुकूल इस लिये है क्योंकि यहाँ ब्लोगर के मध्य आपसी संवाद आसानी से संभव है | मेरी पिछली पोस्ट का ही उदाहरण ले लीजिये जहां मैंने मोबाइल सर्विस कंपनियों द्वारा की जा रही बेईमानी का जिक्र किया था | टिप्पणियों से पता चला कि इस तरह की बेईमानी से पीड़ितों की संख्या काफी बड़ी है | बेचैन आत्माजी,राजेन्द्र जी, पी. एस. भाकुनी जी, हरकीरत जी, मो सम कौन जी , बबली जी, मानोज कुमार जी और संध्या गुप्ता जी ने भी इसी तरह के अनुभव होना बताया | हरकीरत जी और विचार शून्य जी ने जहां बी. एस. एन एल पर भरोसा करने का जिक्र किया वहीं रचना दीक्षित  जी  ने बी. एस. एन. एल को भी कटघरे में खडा कर दिया |  उस पोस्ट को पढने वाले और उस पर टिपण्णी देने वाले बहुत थोड़े से लोगों में ही इतने पीड़ित निकल आये  तो पूरे देश के पीड़ितों की विशाल संख्या का अनुमान लगना आसान हो जाता है| यह निष्कर्ष आपसी संवाद से ही संभव हो पाया और यह सम्वाद संभव हो पाया ब्लोगिंग के माध्यम से|

निष्कर्ष  १ - मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियों की लूट और दादागिरी से उपभोक्ताओं की एक बड़ी संख्या त्रस्त है | 

मो सम कौन जी ने माना कि पीड़ित होते हुए भी बीस तीस रुपये की बात मान कर हम चुप रह  जाते हैं | वास्तव में यही मानसिकता अधिकाँश पीड़ितों की है | इसी के चलते कंपनियों  को गलत काम करने की शह मिलती है|

निष्कर्ष  २  - अधिकाँश पीड़ित विभिन्न कारणों से  इस दादागिरी को सहन कर लेते हैं और कोई प्रतिकार नहीं करते |  

सतीश सक्सेना जी, बेचैन  आत्माजी, विनोद कुमार पाण्डेय जी, सदा जी और अजय कुमार जी ने इस  पीड़ा की शिकायत करने की बात कही | सतीश सक्सेना जी ने तो उपभोक्ता मंच जाने की बात कही थी | वास्तव में यदि समाधान चाहिए तो यही सही रास्ता है |

निष्कर्ष    ३ - समस्या के सही समाधान के लिये सम्बंधित अधिकारी या विभाग को शिकयात करनी चाहिए |

मुझे इस तीसरे निष्कर्ष  से  प्रेरणा मिली और  मैंने उपभोक्ता सलाह केंद्र में फोन कर के सम्बंधित कम्पनी  के हमारे शहर  के नोडल  अधिकारी और उच्च अधिकारियों के फोन  नंबर प्राप्त कर के उनसे संपर्क साधा और उनको धमकी भी दी कि यदि समाधान नहीं होता मैं दूर संचार नियामक प्राधिकरण( TRAI )  में शिकायत करूंगा | 
अंततः   कंपनी ने मुझसे जबरन वसूले पैसे मेरे खाते में वापस कर दिए | इन्हीं पैसों को वापस करने के लिये पहले वे साफ़ मना कर चुके थे | यदि मैंने इस घटना की पोस्ट ब्लॉग पर  न दी होती और उस पर प्रेरणादायक टिप्पणियाँ न आयी होतीं तो मैं भी चुप बैठ चुका था | यदि बहुत सारे पीड़ित इस तरह की शिकायतें कंपनियों के अधिकारियों से करें और समाधान न होने पर TRAI से शिकायत  करें तो हल  निकलने  की आशा की जा सकती है  |  TRAI के फ़ोन नंबर और ई मेल पता इस प्रकार हैं -

01123236308 
01123233466
ap@trai.gov.in



सोमवार, 26 जुलाई 2010

मोबाइल कंपनी की दादागिरी !

मोबाइल कंपनियों के लूट और डकैती के किस्से मैं पहले भी बता चुका हूँ|आज एक और किस्सा केवल इस लिये सुन लीजिये ताकि आप इस लूट से अपने आप को बचा सकें-
मेरे मोबाइल पर कुछ दिनों से बाइबिल के उपदेश बार बार आ रहे थे|मैंने सोचा शायद कोई धार्मिक संस्था अपने प्रचार के लिये ऐसा कर रही है|सहसा एक दिन एक मेसेज आया-आपका बाइबिल मेसेज अलर्ट रीन्यू कर दिया गया है और आपके खाते से तीस रुपये की कटौती की गयी है|जब मैंने कंपनी के कॉल सेंटर से संपर्क साधा कि बिना मेरी सहमति के यह एलर्ट चालू और रीन्यू कैसे हो गया ? तो बताया गया कि अलर्ट चालू तो आपने ही किया है( हो सकता है आपसे गलती से ओ के का बटन दब गया हो ) और एक बार चालू होने पर अपने आप रीन्यू हो जाता है|मैंने अपनी गलती मानते हुए इस सुविधा को तुरंत डीएक्टिवेट करने का आदेश दे दिया और आग्रह किया कि चूंकि रीन्यू मेरी मर्जी के बिना अभी अभी हुआ है और मैं इस सुविधा का उपयोग नहीं करूंगा, इस लिये पैसे मेरे खाते में रीफंड किये जाएँ|सुविधा तो डीएक्टिवेट हो गयी लेकिन पैसे रीफंड के लिये साफ़ मना कर दिया गया|अर्थात मेरी जेब में हाथ डाल कर उन्होंने सुविधा देने के लिये जो पैसे अभी अभी निकाल लिये थे वे उसे,मेरे द्वारा सुविधा न लेने पर भी वापस नहीं करेंगे | एक और बात ध्यान देने योग्य है, इस तरह का छल केवल उन्हीं ग्राहकों से किया जाता है जिनके पास पर्याप्त बेलेंस होता है|यदि बेलेंस निर्धारित राशि से कम होगा तो ऐसी वारदात नहीं होगी | इस घटना के कुछ दिनों बाद मेरे पास फिर एक मेसेज आया - मूवी अलर्ट चालू करवाने के लिये धन्यवाद,आपके खाते से तीस रुपये काट लिये गए हैं(मूवी अलर्ट सेवा क्या होती है और कैसे एक्टिवेट होती है,मुझे नहीं मालूम और न मैंने कभी यह सुविधा अपने फोन पर चाही)|मैंने फिर तुरंत कंपनी के कॉल सेंटर सम्पर्क साधा |फिर वही उत्तर मिला - सुविधा डीएक्टिवेट कर दी जायेगी,लेकिन पैसे रीफंड नहीं होंगे|अंततः तंग आ कर मुझे सारे प्रोमोशनल कॉल और मेसेज बंद करवाने पड़े|बाद में मैंने ध्यान दिया कि मेरे फोन पर अनेक बार बिना किसी रिंगटोन के मेसेज आते हैं और ऊपर लिखा होता है- सूचना | फिर नीचे सम्बंधित सूचना होती है और केवल एक ऑप्शन होता है- ओ. के.यदि यह बटन गलती से दब गया तो पैसे कट कर सुविधा चालू हो जायेगी|लेकिन जब हम तुरंत ही इस गलती की ओर सुविधा शुरू होने से पहले ही कंपनी का ध्यान दिला देते हैं तो कंपनी द्वारा पैसे काट लिये जाना उनकी दादागिरी नहीं तो और क्या है ?

मेरे कुछ परिचितों ने भी ऐसे ही तथ्यों से मुझे अवगत कराया, जिसमें उनकी सहमति के बिना कोई सुविधा चालू कर के पैसे काट लिये गए और शिकायत करने पर पैसे लौटाने से साफ़ मना कर दिया गया|उन्हें भी यही उत्तर मिला कि आपके द्वारा अनजाने में सुविधा चालू कर दी गयी होगी| मुझे इन बेईमानों की बात पर विश्वास नहीं| हो सकता है ग्राहक द्वारा गलती से भी सुविधा चालू न करवाने पर भी ये अपनी मर्जी से सुविधा चालू कर के पैसे लूट लेते हों|

सोमवार, 19 जुलाई 2010

गाली या आशीष ?

'तुम्हारा   एक  भी  दांत  न  बचे ताकि  तुम भात  भी पीस कर खाओ, तुम इतने अशक्त हो जाओ कि शौच जाने के लिये भी लाठी का सहारा लेना पड़े'- यह वाक्य किसी व्यक्ति के लिए गाली की तरह ही प्रयुक्त  किया जा सकता है. किन्तु कूर्मांचल के त्यौहार 'हरेला' में कुछ इसी तरह के वाक्यों से आशीष दी जाती है.  कूर्मांचल में हरेला त्यौहार का  महत्व इस तथ्य से भी पता लगता है कि  इस दिन उत्तराखंड  में शासकीय अवकाश  रहता है.१७ जुलाई संक्रांत को हरेला था.साल भर में तीन हरेला  पर्व होते हैं . इस त्यौहार  में विभिन्न अनाजों को एक डलिया में  ठीक उसी तरह बोया जाता है जैसे कई स्थानों में नवरात्र पर जवारे बोये जाते हैं. पर्व के दिन उन अनाजों के उगे पौधों को काट कर तिलक लगाने के बाद सर पर रखा जाता है. सर पर रखने की एक विशेष पद्धति होती है. पहले पैर. फिर घुटने , फिर कंधे को छुआते  हुए अंत में सर पर  रखे जाते हैं.त्यौहार की विस्तृत जानकारी के लिये लेख के अंत में , मैं लिंक दे रहा हूँ. यहाँ तो मैं सिर्फ हरेले के टीके के बाद दी जाने वाली आशीष का जिक्र करना चाहता हूँ.

जी रये, जागि रये
धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये
सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो
दूब जस फलिये,
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।
 
{जीते रहो,पृथ्वी के समान धैर्यवान,आकाश की तरह प्रशस्त( उदार) बनो,सूर्य के समान तेज, सियार के समान बुद्धि हो,दूब की तरह पनपो, इतने दीर्घायु हो कि ( दांतों से रहित )तुम्हें  भात भी पीस कर खाना पड़े और शौच (जंगल) जाने के लिये भी लाठी का सहारा लेना पड़े.}

देखिये  कैसे एक गाली सी लगने वाला वाक्य आशीष और शुभकामना में बदल गया.  गाली को  यह सौभाग्य पर्व के कारण मिल गया. धन्य हैं हमारे ऐसे पर्व जो गाली को भी आशीष  में बदल देते हैं. 

हरेला त्यौहार के लिंक -

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

दो फूलों की कहानी


वैसे तो बालकनी में और भी गमले हैं, लेकिन यहाँ मैं केवल दो की कहानी कहूंगा. इनमें से एक गमला सफ़ेद फूल वाला है, जो लगभग बारहों मास फूल देता है, जिन्हें मैं प्रायः नित्य पूजा हेतु तोड़  लिया करता हूँ.इस तरह यह गमला मेरे  लिये एक उपयोगी पौधे वाला गमला है. यह किसी न किसी तरह से मेरी सहायता कर रहा है और लाभ पंहुचा रहा है.इसलिए  मुझे  इससे ज्यादा लगाव होना चाहिए. लेकिन शायद ऐसा है नहीं. यह पौधा नित्य फूल देता है- इसे मैं इसका स्वाभाविक गुण मान लेता हूँ.इसके प्रति कृतज्ञता का भाव मुझमें नहीं है.

दूसरा गमला गुलाब के फूल का है.कुछ वर्ष पूर्व जब मैंने इस गुलाब के पौधे को गमले पर रोपा था और कुछ समय बाद एक सुन्दर गुलाब का फूल खिला था, तो मेरा पूरा परिवार रोमांचित था.तब शायद इसकी सुन्दरता हम लोगों को आकर्षित करती थी. (लगाव का एक कारण सौन्दर्य भी है).आज इस गुलाब में वैसा आकर्षण नहीं है.फूल की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है.खिलने के बाद डाली में अधिक टिकता भी नहीं है.अर्थात इसकी उपयोगिता सफ़ेद फूल  के मुकाबले कुछ भी नहीं.लेकिन जब मौसम  आने पर गुलाब के पौधे में कलियाँ आने लगती हैं तो मेरा पूरा परिवार आज भी रोमांचित होता है, एक दूसरे को वह कली दिखाता है जिसमें कुछ दिनों बाद फूल खिलेगा.हमें गुलाब के खिलने की प्रतीक्षा आज भी रहती है.

आखिर क्यों हम , सफ़ेद फूल की अपेक्षा गुलाब के प्रति  अधिक  संवेदनशील हैं. क्या इस लिये कि उसकी सुन्दरता सफ़ेद फूल की अपेक्षा अधिक है, या इसलिए कि गुलाब केवल मौसम पर ही खिलता है और फिर अगले मौसम  पर आने का वादा कर चला जाता है जबकि  सफ़ेद फूल नित्य ही हमारे पास बने रहता है. क्या गुलाब विदेश जा  कर नौकरी करने  वाला बेटा है, जो कभी कभार आकर दिलासा दे जाता है और सफ़ेद फूल पास में रहने वाली संतान जो हर सुख दुःख में काम आती है?   

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

स्कूल चलो - हिन्दू मुसलमान का भेद समझें.

मेरी नातिन पहली बार स्कूल गयी। स्कूल जाने के नाम पर वह बहुत खुश थी। उसके माता पिता भी खुश थे। आखिर यह उनकी संतान के जीवन का एक महत्वपूर्ण दिन था। मैंने भी उसे आशीर्वाद दिया- खूब पढ़ना, पढ़ - लिख कर अच्छा इंसान बनाना।

क्या नातिन पढ़ लिख कर एक अच्छा इंसान बनेगी ? क्या बहुत पढ़े लिखे व्यक्ति अच्छे इंसान होते हैं और अनपढ़ नहीं ? आखिर नातिन स्कूल क्यों जा रही है ? इस उम्र में सभी बच्चे स्कूल जाते हैं , इसलिए उसका जाना भी जरूरीहै। यदि नहीं जायेगी तो सरकार खुद आकर उसको स्कूल ले जायेगी। स्कूल जा कर नातिन ए से एप्पल से पढ़ना शुरू करेगी। अ से अनार भी पढेगी। वन, टू और एक दो भी। मुझे पूरा विश्वास है कि कुछ समय बाद उसे ए बी सी डी और वन टू तो याद रहेंगे लेकिन क से ज्ञ तक पूरे व्यंजन क्रम से नहीं बोल पायेगी और उनतिस, उनतालीस का फर्क ट्वेंटीनाइन और थर्टीनाइन बोल कर ही समझ पायेगी। वहाँ उसे सामाजिक अध्ययन पढ़ाया जाएगा। वहाँ उसे पढ़ाया जाएगा- हिन्दू मंदिर में जाते हैं, मुसलमान मस्जिद में जाते हैं, ईसाई चर्च में जाते हैं। नातिन ने केवल मंदिर देखा है। लेकिन उसे नहीं मालूम कि वह हिन्दू है। वह हिन्दू मुसलमान का फर्क करने में कन्फ्यूज हो जायेगी। उसकी माँ को समझाना पड़ेगा - उसकी दोस्त सालेहा मुसलमान है और मस्जिद में जाती हैपड़ोसी का बेटा जार्ज ईसाई है और चर्च में जाता है। धीरे धीरे उसकी समझ में आ जाएगा कि सालेहा और जार्ज भले ही उसके दोस्त हैं और उसे बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन वे विधर्मी हैं। यह ज्ञान उसको उसके घर पर नहीं मिल सकता था। क्योंकि जार्ज और सालेहा के मम्मी पापा से नातिन के मम्मी पापा की अच्छी मित्रता है और इन लोगों का एक दूसरे के घरों में जाना, दावतें करना चलता रहता है।सरकार 'स्कूल चलो' का नारा शायद इसी लिये लगाती है ताकि बच्चों को हिन्दू मुसलमान का फर्क अच्छी तरह समझ में आ जाए।


नातिन कुछ और बड़ी होगी तो उसे किसी फॉर्म में जाति भरने को कहा जाएगा।
उसके समझ में आने लगेगा कि सालेहा और जार्ज दूसरे धर्म वाले और वर्षा यादव और सीमा बाकोडे दूसरी जाति वाले हैं। स्कूली पढाई की एक जरूरत तो मेरे समझ में आ गयी - जिस धर्म भेद और जाति भेद को समझने में नातिन को वर्षों लग जाते उसे यह शिक्षा कुछ ही वर्षों में सिखा देगी।

धर्म और जाति का भेद यदि समाज मिटाना या कम करना भी चाहे तो सरकार की नीतियाँ उसे ऐसा नहीं करने देगी। वोट बैंक की राजनीति उसका एक बहुत बड़ा कारण है।

मैं कामना करता हूँ कि नातिन वाली पीढ़ी इस राजनीति को समझ सके और इसका प्रतिकार कर सके।

सोमवार, 28 जून 2010

ब्लॉगजगत में सार्थक भी हो रहा है

ब्लॉगजगत में उठापटक, वाद विवाद, टांग खिंचाई और आरोप प्रत्यारोप तो चलते ही रहते हैं,लेकिन कहीं कुछ बहुत सार्थक भी घटता रहता है, जो भविष्य में ब्लॉग विधा की सार्थकता सिद्ध करने वाला है.ऐसा ही एक प्रयास किया है विवेकानंद पाण्डेय ने अपने ब्लॉग देशभक्त में| इस ब्लॉग के माध्यम से वे संस्कृत भाषा का प्रशिक्षण देने का प्रयास कर रहे हैं.ऐसे प्रयासों की सराहना की जाना चाहिए और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए.

शनिवार, 19 जून 2010

मुआवजे से ज्यादा जरूरी दंड.

एक बार फिर भोपाल गैस त्रासदी राजनीति और मुआवजे के चक्रव्यूह में फंसती नजर आ रही है। भाजपा जहां इस त्रासदी के फैसले को मुद्दा बनानेपर तुली है वहीं कांग्रेस योजना आयोग द्वारा गैस पीड़ितों के लिये आनन फानन में दिए गए ९८२ करोड़ रुपये की मदद कोअपने प्रयासों का फल बता रही है। ज्ञातव्य है कि इससे पहले मध्य प्रदेश ने आयोग से ९०० करोड़ की मदद माँगी थी, लेकिन आयोग नेध्यान देने की जरूरत नहीं समझी। हालांकि गैस पीड़ितों के लिये काम करने वाले संगठनों ने भाजपा द्वाराप्रायोजित धरने का विरोध कर यह जताने की कोशिश की कि वे इस राजनीतिक नौटंकी को समझ रहे हैं,किन्तु डर है कि वेभी मुआवजे के भ्रमजाल में फंस कर मुख्य मुद्दे को भूल न जाएँ । गैस त्रासदी के तुरंत बाद भी मुआवजा मुख्य मुद्दा होगया था । स्वयं सेवी संगठनों सहित राजनीतिक पार्टियां और स्वयं पीड़ित भी थोड़ा बहुत मुआवजे के चक्कर में दोषियों को दण्डित करने के मुख्य मुद्दे को भूल गए थे।

निस्संदेह पीड़ितों को दिया गया मुआवजा त्रासदी को देखते हुए बहुत ही कम था,लेकिन यह भी सच है कि मुआवजे की राशि भी भ्रष्टाचार के भंवर में बुरी तरह फंसी। पूरी संभावना है कि भविष्य में भी यह होगा। भोपाल के कुछ विधायक और नेता जिनके वोटर गैस प्रभावित क्षेत्र की परिधि के बाहर हैं, उनको भी मुआवजा दिलाने के लिये प्रयत्नशील हैं.अंधा बांटे रेवड़ी.....

बहरहाल जो भी पीड़ित है उसे मुआवजे की बढ़ी हुई राशि अवश्य मिलनी चाहिए। मेरा अनुमान है कि राज्य और केंद्र सरकारों के अपने अपने गणित (मुआवजे दिलाने का श्रेय)के अनुसार यह काम होगा भी। लेकिन मुआवजे की इस राजनीति में दोषियों को दण्डित करने का काम पिछड़ जाएअब दोषी तत्कालीन सत्तासीन राजनेता और अधिकारी हैं,जिन्होंने तब पीड़ितों का नहीं वरन आरोपियों का पक्ष ले कर आपराधिक कृत्य किया था.


रविवार, 13 जून 2010

भोपाल गैस त्रासदी - अब क्या करें?

भोपाल गैस त्रासदी के बारे में हम वह सब कुछ जान रहे हैं, जो हमारी जानकारी के स्रोत (मीडिया) हमें बता रहे हैंस्पष्ट हो चुका है कि प्रकरण को हल्का करने, हाथ आये आरोपी एंडरसन को देश से बाहर भगाने और हत्यारे यूनियनकार्बाइड को राहत पहुंचाने की कोशिश तत्कालीन सत्तासीन नेताओं एवं अधिकारियों ने कीगैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले संगठन और स्वयं पीड़ितों के लिये भी उस समय आरोपियों को सजा दिलाने से अधिक महत्वपूर्ण कार्य मुआवजा प्राप्त करना था२६ साल बाद आये फैसले से पीड़ितों सहित सभी स्तब्ध और क्षुब्ध हैं, ठगे से हैं। लेकिन लाचार हैं। ईश्वर भी या तो 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति....' का वादा भूल गए हैं या इससे भी बड़ी 'धर्म की हानि 'की प्रतीक्षा कर रहे हैं।तो अब मनुष्य क्या करे ? मेरे मतानुसार अब यह किया जा सकता है:-


१- गैस त्रासदी के समय संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों, सत्तासीन नेताओं के विरुद्ध विशेष अदालत में प्रकरण चला कर उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकत के लिये दण्डित किया जाय और इस गैर जिम्मेदारी की सजा मृत्युदंड ( यदि क़ानून में व्यवस्था न हो तो क़ानून में संशोधन किया जाए ) तक हो।

२- वे सारे उत्पाद जिनसे यूनियन कार्बाइड का सम्बन्ध हो (जैसे एवेरेडी सेल)भारत में प्रतिबंधित हों। भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं से यह आशा नहीं की जा सकती कि वे ऐसा करेंगे , क्योंकि वे आसानी से खरीदे जा सकते हैं। इसलिए स्वयंसेवी संगठन लोगों को कार्बाइड के उत्पादों की सूची उपलब्ध करायें और उन्हें प्रेरित करें कि वे इन उत्पादों को न खरीदें। (यह कार्य त्रासदी के तुरंत बाद ही किया जाना चाहिए था)

उपरोक्त कदमों के लिये सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए इस हेतु दबाव डालने का काम भी स्वयंसेवी संगठन ही कर सकते हैं।

एक बात और गौर करने लायक है। इस प्रकार का फैसला किसी धार्मिक घटना को लेकर आया होता तो अब तक बवाल मच गया होता (याद कीजिये शाहबानो प्रकरण)। लेकिन इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि यदि इस फैसले सरीखे प्रकरण बार बार होते रहे तो जनता फैसला अपने हाथ में लेना शुरू कर सकती है और एक दूसरे प्रकार का नक्सलवाद पनप सकता है, जो प्रारम्भ में तो कसूरवार के प्रति होता है लेकिन बाद में बेकसूर भी उसके निशाने पर आते हैं और अराजकता बढ़ती है।








रविवार, 6 जून 2010

हैं वो काफिर जो....(ब्लॉगजगत को सीख)

बहुत पहले एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया था। बाद में वही किस्सा 'नवनीत' में पात्रों के नाम के साथ पढ़ा था। तब ज्ञात हुआ कि वह किस्सा नहीं वरन सत्य घटना थी। इस घटना से ब्लॉगजगत को भी सीख लेनी चाहिए। लेखकों , कवियों की आपसी नोंक झोंक को किस शालीनता से निभाया जा सकता है, यह घटना इस बात का उदाहरण है।'नवनीत' में सम्बंधित शायर और कवि का नाम भी दिया था, जो मुझे अब याद नहीं। वैसे हमारे बहुत से ब्लोगर मित्रों ने यह घटना अवश्य सुनी होगी । विवरण इस प्रकार है :-

एक गोष्ठी में शायर और कवियों के बीच समस्या पूर्ति का कार्यक्रम चल रहा था। अर्थात कोई एक शायर या कवि शायरी या कविता की एक पंक्ति बोलता और बाकी लोग उस पंक्ति की अगली पंक्ति बोलते। वहाँ उपस्थित एक मुसलमान शायर ने एक पंक्ति पढी :

हैं वो काफिर जो बन्दे नहीं इस्लाम के

पंक्ति पढने के बाद शायर महोदय शारारत भरी नजरों से साथी हिन्दू शायर की तरफ देखने लगे। हिन्दू शायर महोदय तो मानो इस पंक्ति के रस में डूब गए थे।मुसलमान शायर की इस पंक्ति पर जबर्दस्त वाहवाही देने के बाद हिन्दूशायर ने समस्या पूर्ति इस प्रकार की :

'लाम' के मानिंद हैं काकुल मेरे घनश्याम के
हैं वो काफिर जो बन्दे नहीं इस 'लाम' के
(
मेरे घनश्याम के केश 'लाम' की तरह घुंघराले हैं. जो इन
घुंघराले बालों वाले के दास नहीं वे काफिर हैं। )

ज्ञातव्य
हो
कि र्दू के वर्ण 'लाम' की आकृति गर्दन की तरफ जाने वाले घुंघराले बालों की तरह होती है