रविवार, 28 मार्च 2010

जागो ग्राहक जागो उर्फ़ निरीह उपभोक्ता

उपभोक्ता के हित हेतु सरकार सजग है। विज्ञापन के जरिये ग्राहक को जगा कर सरकार स्वयं सो जाती है। सरकार का साफ़ साफ़ कहना है कि ग्राहक सरकार की नींद में खलल न डाल कर सीधे उपभोक्ता संरक्षण एजेंसी के पास चला जाए। ग्राहक बेचारा परेशान - किस किस की शिकायत करे। मोबाइल कंपनियों को ही ले लें। अभी कुछ दिन पहले तक तो सरकार ने ही मोबाइल कंपनियों से कह रखा था की ग्राहक की एक सेकण्ड बात के लिए वह एक मिनट का शुल्क (साठ गुना) वसूल सकती है। यदि आप अत्यधिक सजग हैं तो पायेंगे कि कम्पनियां आपके प्रीपेड बेलेंस में से निर्धारित शुल्क से अधिक काट ले रही है। एक उपभोक्ता ने प्रतिष्ठित कंपनी 'आइडिया' का एक प्लान लिया जिसमें १२ घंटे बाद कम दरों में बात होनी थी। जब ३६ घंटों बाद भी दरें कम नहीं हुईं तो ग्राहक ने कंपनी के कॉल सेंटर में शिकायत करी। उसको उत्तर मिला बात करने के पहले स्वयं चेक कर लेना चाहिए कि प्लान लागू हुआ या नहीं। इस बेहूदे उत्तर से कुपित हो ग्राहक ने ई मेल द्वारा कंपनी के ही वरिष्ठ अधिकारी से शिकायत की। लेकिन उसे कोई उत्तर नहीं मिला।लाचार ग्राहक ने दूसरी कंपनी की शरण ले ली।

बाजार में अनेक वस्तुएं उन पर अंकित मूल्य से बहुत कम में बिक रही हैं । अर्थात इन वस्तुओं पर अत्यधिक मार्जिन रखा गया है। ऐसे में कोई दुकानदार अंकित मूल्य पर ही सामग्री बेच देता है तो ग्राहक सारे उपभोक्ता सरंक्षण दावों के बावजूद निरीह ही रहेगा। कुछ दिन पहले घुघूती जी के ब्लॉग पर बाजार में बिक रहे प्रदूषित फलों और सब्जियों के बारे में पढ़ा था। एक अन्य ब्लॉग में रीडर्स डायजेस्ट द्वारा ग्राहकों से की जा रही धोखाधड़ी (जिसका मैं स्वयं भी शिकार हुआ हूँ) के बारे में पढ़ा। नमकीन, बिस्कुटों और अन्य खाद्य पदार्थों, साबुनों आदि की पैकिंग २५० ग्राम से २००,१८५,१८० १७० ग्राम कब हो गयी ग्राहक को यह पता ही नहीं चल पाता। मिलावटी और नकली दूध, मावा और घी ग्राहक खरीदने को मजबूर है।

जागो ग्राहक क्योंकि सरकार हेडली, नक्सली और थरूर को लेकर थक कर सो चुकी है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. जागृता [होशियार रहो के लिए तेलुगु शब्द]

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  2. aapka kathan vastav me grahakon ke saath hone wali dhokhadhadi ki taraf ishara karta hai jo ki haqikat ko bayan kar raha hai.lekin grahak bhi sab kuchh jaankar bhi usi kimat par chijian kharidane ko majbur hain.
    eksashakt avam prabhavshali lekh ke liye aabhar.
    poonam

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  3. ये सब ग्राहकों को लुभाने वाली बाते हैं ... सरकार अपना पल्लू झाड़ती रहती है ... बड़ी बड़ी समस्याएँ जो हैं उनके पास ....

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  4. हर नागरिक को अपने स्तर पर जागरूक होने की आवश्यकता है तभी क्रांति आएगी अन्यथा..!

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  5. बात तो आपकी सही है, रही बात उपभोक्ता अधिकारों की तो यदि उपभोक्ता जागरूक है तथा अदालतों के चक्कर लगाने में सक्षम है तो वह अवश्य यह दिखा सकता है कि उपभोक्ता के हकों को छीनने वालों को जुर्माना भी हो सकता है। अन्यथा शोषित होते रहो। अफसर जानते हैं कि आम जनता तो अज्ञान की गहरी नींद में है, राजनेताओं से उन्होंने तालमेल बिठा ही रखा है, फिर उनका कोई क्या कर सकता है।

    यदा कदा कोई हम-तुम जैसा पीछे पड ही जाये तो सबसे पहले तो उसकी अक्ल ठीक करने के सारे हथकण्डे अपनाये जाते हैं। यदि वह दबता नहीं है, तो उसे भी अपनी जमात में दलाल के रूप में शामिल कर लिया जाता है। इसके बाद भी अपवाद स्वरूप कुछ शेष रह जाते हैं, जिनसे सतर्क रहने का प्रयास किया जाता है। फिर भी बेचारे यदकदा एसीबी के चक्कर में फंस ही जाते हैं।

    प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों में जिस प्रकार की साठगांठ है, उसको देखते हुए प्रशासन को उनके कर्त्तव्य याद दिलाने मात्र से कुछ भी हासिल नहीं होगा, बल्कि जनता (पब्लिक) को अपने आप में अतनी ताकत हासिल करनी होगी कि इन भ्रष्ट पब्लिक सेर्वेण्ट्‌स से पूछा जा सके कि वे अपने कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाह क्यों हैं और लापरवाही के लिये सजा दिलाने के लिये संघर्ष का मार्ग अख्तियार करना होगा। यदि पब्लिक अपने नौकरों अर्थात्‌ पब्लिक सर्वेण्ट्‌स को नियन्त्रित नहीं रख सकती तो कहीं न कहीं पब्लिक भी इसके लिये जिम्मेदार है। आपने अच्छा मुद्दा उठाया है। धन्यवाद।

    शुभकामनाओं सहित आपका
    -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश
    सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
    इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३५६ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६

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