कितना बेचैन था
मैं
मेरे बेटे
तेरे आने की प्रतीक्षा में.
तू आया
मगर मुर्दा.
मैं पहले रोया
औ़र फिर हँसा.
और तेरी माँ
नौ महीने की व्यर्थ साधना का फल पा कर
तड़फती रही
बिस्तर पर.
लेकिन मेरे बेटे
तेरी माँ
खुशनसीब है शायद
मेरी माँ की अपेक्षा.
क्योंकि मैं जिंदा हूँ
अब तक.
उत्तराँचल के कूर्मांचल संभाग में किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ "शकुनाखर" गान से होता है. इसीलिये प्रस्तुत है शकुनाखर.....(शगुन के आँखर):
रविवार, 24 मई 2009
शनिवार, 16 मई 2009
कचड़ा दर्शन
आज सुबह के भ्रमण के दौरान मेरा चिंतन कचड़े के एक ढेर के पास जाग उठा.उस स्थान पर नगर नि़गम वालों ने एक ट्रोली रखी थी, जिसमें कचड़ा डाला जाना चाहिए. लेकिन अधिकांश कचड़ा ट्रोली के आसपास बिखरा था, जो हमारी नागरिक चेतना को उजागर कर रहा था. कचड़ा बीनने वाले दो लड़के उस ढेर से अपने मतलब का कचड़ा बीन रहे थे, जिसे बेच कर वे कुछ धन प्राप्त कर सकें.मेरा चिंतन बोल उठा- कचड़ा भी सापेक्ष होता है. जो एक के लिए कचड़ा है वही दूसरे के लिए मूल्यवान हो जाता है. साहित्यकार पत्रकार श्री राजेन्द्र यादव ब्लॉग लेखन को कचड़ा करार देते हैं, लेकिन हम जैसों को ब्लॉग में एक नहीं अनेकों सार्थक चीजें मिल जाती हैं.
सराफा बाजार में मैंने सफाई कर्मियों को घंटों नाली की सफाई करते देखा है. वे इस मनोयोग से अपनी ड्यूटी नहीं करते , बल्कि उस नाली में कुछ सोने के कण ढूंढ रहे होते हैं. भारतीय मतदाता इतना भाग्यशाली तो नहीं कि उसे कचड़े के ढेर में सोना मिल जाए. लेकिन उसने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया. उसे कचड़े का एक ढेर दिया गया था और कहा गया था कि इसमें जो थोड़ा बहुत काम का कचड़ा दिखे उसे छांट लो. सो उसने कर दिखाया. जय भारत.
सराफा बाजार में मैंने सफाई कर्मियों को घंटों नाली की सफाई करते देखा है. वे इस मनोयोग से अपनी ड्यूटी नहीं करते , बल्कि उस नाली में कुछ सोने के कण ढूंढ रहे होते हैं. भारतीय मतदाता इतना भाग्यशाली तो नहीं कि उसे कचड़े के ढेर में सोना मिल जाए. लेकिन उसने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया. उसे कचड़े का एक ढेर दिया गया था और कहा गया था कि इसमें जो थोड़ा बहुत काम का कचड़ा दिखे उसे छांट लो. सो उसने कर दिखाया. जय भारत.
रविवार, 10 मई 2009
कवि जो तार सप्तक में नहीं हैं
आज मुझे मेरे छोटे से पुस्तकों के संग्रह के बीच नन्हे कवि कुशाग्र. के नाना श्री भैरव दत्त जोशी, जो इस समय लगभग नब्बे वर्ष के हैं, का एक टंकित कविता संग्रह मिला. खड़ी बाजार, रानीखेत (उत्तराखंड) के निवासी श्री जोशी एक अच्छे चित्रकार भी रहे हैं और उन्हें कुछ पुरस्कार भी मिले हैं, जिनकी पूर्ण जानकारी मेरे पास उपलब्ध नहीं है. बहरहाल यहाँ मैं उनकी कविताओं की बात कर रहा हूँ. यह कविता संग्रह पढ़ कर मुझे लगा कि केवल तार सप्तक और पत्र पत्रिकाओं में छपने वाले, मंच पर कविता पाठ करने वाले और ब्लॉग लिखने वाले ही कवि नहीं होते. कवि और भी हैं जिनमें से एक श्री भैरव दत्त जोशी भी हैं. अफ़सोस यही है कि विभिन्न कारणों से ऐसे कवियों द्वारा रची गयी श्रेष्ठ रचनाओं से अधिकांश पाठक वंचित रह जाते हैं. प्रस्तुत है श्री जोशी की एक कविता जो उन्होंने १९८५ में लिखी थी.
सुबह ने होते ही पहले आकाश को संवारा
और सारा क्षितिज अनुराग से भर दिया.
पर्वतों की चोटियां रक्तिम स्वर्ण हो गयीं
किसी तप्त लालसा से नहीं,
प्यार की पहली लजीली मुस्कराहट से,
जो आशामय दिव्याभा की नवागता किरण थी |
सुबह के होते ही पक्षियों ने स्वागत गीत गाये,
पशुओं ने प्रसन्न नेत्रों से निहारा,
पत्थर सम्मान के लिए जगमगा उठे,
झाड़ियों, वृक्षों तथा अन्यत्र धरती में
हरीतिमा का उल्लास छा गया.
सुगंध बिखराते हुए फूल खिलखिला उठे
अधीर भौंरे तथा तितलियाँ
प्यार के मधुपान को निकल पड़े |
किन्तु इंसान ने, याने प्रबुद्ध मानव जाति ने
सुबह के होने को ललचाई निगाहों से देखा
और निकल पड़े कारोबार के नाम पर
एक दूसरे को ठगने के लिए
अथवा लाठी के बल पर भैंस लाने के लिए
या इस कारोबार शब्द का कोई अन्य अर्थ है
तो मैं नहीं जानता |
मैंने इतना अवश्य देखा
कि सारी लालिमा नष्ट हो गयी.
हरियाली मुरझा गयी.
वातावरण में एक चीखता शोर गूँज उठा
सर्वत्र प्रदूषण की विषाक्त घुटन छा गयी
और शान्ति,सौन्दर्य तथा अनुराग की
वह सुकोमल दिव्याभा,
जो अभी सुशोभित थी
सहसा जाने कहाँ खो गयी |.
सुबह ने होते ही पहले आकाश को संवारा
और सारा क्षितिज अनुराग से भर दिया.
पर्वतों की चोटियां रक्तिम स्वर्ण हो गयीं
किसी तप्त लालसा से नहीं,
प्यार की पहली लजीली मुस्कराहट से,
जो आशामय दिव्याभा की नवागता किरण थी |
सुबह के होते ही पक्षियों ने स्वागत गीत गाये,
पशुओं ने प्रसन्न नेत्रों से निहारा,
पत्थर सम्मान के लिए जगमगा उठे,
झाड़ियों, वृक्षों तथा अन्यत्र धरती में
हरीतिमा का उल्लास छा गया.
सुगंध बिखराते हुए फूल खिलखिला उठे
अधीर भौंरे तथा तितलियाँ
प्यार के मधुपान को निकल पड़े |
किन्तु इंसान ने, याने प्रबुद्ध मानव जाति ने
सुबह के होने को ललचाई निगाहों से देखा
और निकल पड़े कारोबार के नाम पर
एक दूसरे को ठगने के लिए
अथवा लाठी के बल पर भैंस लाने के लिए
या इस कारोबार शब्द का कोई अन्य अर्थ है
तो मैं नहीं जानता |
मैंने इतना अवश्य देखा
कि सारी लालिमा नष्ट हो गयी.
हरियाली मुरझा गयी.
वातावरण में एक चीखता शोर गूँज उठा
सर्वत्र प्रदूषण की विषाक्त घुटन छा गयी
और शान्ति,सौन्दर्य तथा अनुराग की
वह सुकोमल दिव्याभा,
जो अभी सुशोभित थी
सहसा जाने कहाँ खो गयी |.
बुधवार, 6 मई 2009
सुशासन उर्फ़ अंधेर नगरी चौपट राजा
चुनाव के मौसम में कुछ राजनैतिक दल सुशासन का नारा भी बुलंद करते आए हैं। सुशासन कैसा होता है , दुर्भाग्यवश यह हम आजादी के बाद से अब तक नहीं देख पाये हैं। कामना है कि आने वाली पीढी उसे देख पाये।
सुनते हैं लालूजी के पटना से पलायन के बाद बिहार में सुशासन की थोड़ी बहुत झलक दिखाई देती है। ये सूचना हमें समाचार पात्र और टी वी से मिली। हमने बिहार के सुशासन का अनुमान लगाया है। शायद अब वहाँ मुख्य मंत्री के रिश्तेदारों का दर्जा भगवानके बाद दूसरे से हट कर नीचे आ गया होगा। शायद पटना में अब रात को आठ बजे बाद भी सड़कों में निकलने की हिम्मत की जा सकती होगी।
ऐसे ही सुशासन की कुछ ख़बर हमने समाचार पत्रों में मध्य प्रदेश के बारे में पढी थी। विधान सभा चुनावों के बाद संचार माध्यमों ने हमें बताया था कि वहाँ मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के सुशासन ने भाजपा को दुबारा सत्ता दिलाई है। आजादी के बाद से ही सुशासन की राह ताकने को मजबूर हमने स्वयं सुशासन के दर्शन करने की ठानी और राजधानी भोपाल पंहुच गए। हमारा मानना है कि भोपाल में सर्वोत्तम दर्शनीय स्थल बड़ा तालाब है। इस तालाब को हम पहले देख चुके थे। इसकी विशालता और बरसात में उठती ऊंची ऊंची लहरों ने हमें समुद्र दर्शन का आनंद दिया था। सो सबसे पहले हमने तालाब देखने की ठानी।
तालाब दर्शन हेतु जाते हुए रास्ते में ही हमें वहाँ के सुशासन के दर्शन हो गए। सड़कें खुदी हुई थीं। पता चला कि पाइप लाइन बिछाने के लिए सड़कें खुदी हुई हैं।यह हाल पिछले २०-२५ दिनों से था। उन सड़कों में जो वाहन चला ले वह सर्कस के मौत के कुएं में वाहन चलाने का आनंद ले सकता था। वाहन के शाकाप , पिस्टन आदि की चिंता इंश्योरेंस वालों पर छोड़ते हुए हम एक चौराहे पर पहुँच गए। हमें लगा सुशासन इसी चौराहे पर है। क्योंकि वहाँ लाल हरी बत्तियां न केवल लगी हुई थीं अपितु काम भी कर रही थीं। यही नहीं वहाँ ट्रेफिक का एक सिपाही भी खडा था। उस चौराहे पर हम भोपाल वासियों के वाहन चलाने की योग्यता के कायल हो गए। बत्तियां क्रमानुसार जल बुझ रही थीं,क्योंकि उनका काम जलना बुझना था और यदि काम सुचारू रूप से हो रहा है तो सुशासन है। वाहन चालाक शायद रंगभेदी नीति के घोर विरोधी थे। वे बत्तियों के रंगों की तनिक भी चिंता न करते हुए ,एक दूसरे से होड़ करते हुए , आधा पौन इंच के फासले से कट मारते हुए वाहन दौड़ का अभ्यास करते प्रतीत होते थे.हमें लगा यदि ओलम्पिक में वाहन दौड़ प्रतियोगिता होती हो तो अभिनव बिंद्रा के बाद कोई भोपाल वासी अपने दम पर देश के लिए स्वर्ण पदक ला सकता है। ट्रेफिक का सिपाही आसपास के घटना क्रम से निर्लिप्त रहते हुए राम राज्य और सुशासन दोनों की ही गवाही दे रहा था। राम राज्य में प्रजा सुखी रहती है और सिपाही ट्रेफिक नियमों की धज्जियाँ उडाने वाली प्रजा की अनदेखी करके उन्हें सुखी बना रहा था। साथ ही ड्यूटी टाइम में ड्यूटी पर मौजूद रहते हुए सुशासन के दर्शन करा रहा था।
हमारे मेजबान ने हमें एक तालाबनुमा पोखर के सामने ले जाते हुए कहा - यह रहा बड़ा तालाब। हमने उन्हें किसी मनोचिकित्सक से मिलने की सलाह देते हुए कहा- भाई इन छोटे तालाबों को देखने की हमें कोई चाह नहीं है, हमें बड़ा तालाब ले चलो। जवाब में उन्होंने हमें नेत्र चिकित्सक से मिलने की सलाह देते हुए आश्वस्त किया कि यही भोपाल की शान बड़ा तालाब है। तालाब की दुर्दशा देख हमें ऐसा धक्का लगा कि हम मेजबान से ह्रदय रोग चिकित्सक का पता पूछने लगे। हमें लगा शायद सुशासन इसी तालाब में समा गया है।
मध्य प्रदेश में स्थानीय शासन द्वारा पानी सप्लाय की भी दयनीय स्थिति है। राजधानी भोपाल में एक दिन छोड़ पानी आता है। अन्य स्थानो,जिनमें क्षिप्रा नदी के किनारे बसा उज्जैन भी शामिल है, में और भी बुरी हालत है। कहीं पुलिस के पहरे में पानी का वितरण होता है तो कहीं पानी के टैंकर को लूटने की घटना सामने आती है। हमने जगह जगह सरे आम मोटर द्वारा सप्लाय लाइन से पानी की चोरी होते हुए देखा, लेकिन सुशासन इसे शायद इस लिए नहीं देख पाता क्योंकि पानी की सप्लाय सुबह होती है और काम के बोझ का मारा सुशासन तब तक जग नहीं पाता होगा।
हमें लगा कि सुशासन को लाने में मतदाता सहयोग नहीं दे रहे हैं। मतदाता यदि अटलजी को भारत को कुछ दिन और चमकाने देते तो अटल जी भारत की नदियों को जोड़ करे सुशासन ले आते और मध्य प्रदेशवासियों को पानी मिल जाया करता। हम समझ गए कि मतदाता ही सुशासन की राह के रोडे हैं।
मध्य प्रदेश ऊर्जा की बचत के मामले में भी सुशासित लगा। वहाँ घंटों बिजली गुल रहती है और इस प्रकार ऊर्जा बचत हेतु अन्य प्रदेशों के लिए एक प्रेरणाश्रोत बन गया है। वहाँ की बिजली बोर्ड ने बिजली चोरी रोकने का एक अनूठा सिद्धांत निकाला है, जिसे सुन बोर्ड के अधिकारियों की प्रतिभा और सुशासन लाने के उनके प्रयासों ने हमें चौंका दिया। शायद सुन के आप भी कम हैरान नहीं होंगे। वे लोग उन लोगों के प्रति कोई कार्रवाई नहीं करते जो बिजली चोरी करते हैं। वे उन क्षेत्रों की बिजली में कटौती करते हैं जिन क्षेत्रों में बिजली चोरी होती है। खुले आम में लाइन में तार डाल बिजली चोरी करने वालों को रोकना वे झंझट का काम समझते हैं, क्योंकि ऐसे लोगों की दादागिरी से पंगा लेने की अपेक्षा ईमानदारी से बिजली का बिल भरने वालों की बिजली काट देना आसान होता है।
सड़क, बिजली,पानी के सुशासन को देख हम उबरे ही थे कि समाचार पत्र पर नजर पडी - चार माह में ७२ लूट! यह आंकडा भोपाल शहर काम था। पता चला अधिकाँश शिकार लाडली लक्ष्मियाँ ( महिलाएं ) थीं। हमने कहा- आख़िर महिलाएं चेन पहन, हेंड बैग लटका, मोबाईल हाथ में ले दूर दूर जाती क्यों हैं ? क्या जब तालिबान आयेंगे तभी इन पर लगाम लगेगी ? अफ़सोस ! हमें बताया गया- बहुत सारी घटनाएं दूध लेने जाते हुए या कुत्ते को घुमाते हुए घर के आसपास ही हुई थीं और घटनाओं को अंजाम देने वाले अन्य शहरों से आए हुए इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले छात्र हैं। हम तुंरत माजरा समझ गये। लोग अपनी औकात जाने बिना लड़कों को इंजीनियरिंग की पढाई के लिए भेज देते है। उनकी फीस, किताबें, रहना,खाना और थोडा बहुत जेब खर्च की व्यवस्था तो वे जैसे जैसे जैसे जैसे तैसे करते हैं लेकिन मंहगे मोबाईल ,bike का फालतू पेट्रोल, शराब - सिगरेट का खर्च भेजने में उनकी नानी याद आ जाती है। युवा भावी इंजिनियर भी अपने माँ बाप की आर्थिक स्थिति का आकलन कर उन पर बोझ न बनते हुए विदेशों की तर्ज पर स्वावलंबी बनने का प्रयास करते दिखाई देते है।
हम निराश हो गए। हम जिस सुशासन के दर्शन करने आए थे वह हमें यहाँ भी नहीं मिला। तभी किसी ने कहा- chintaa मत करो , १६ मई को sushaasan आने वाला है। क्या वाकई ?
रविवार, 26 अप्रैल 2009
इस सादगी को नमन
डॉ.श्रीमती अजित गुप्ता के ब्लॉग . पर मैं एक लघुकथा ' आदत ' पढ़ रहा था जिसमें उनका घरेलू नौकर,जो जनजातीय समाज का है, आग्रह करने पर भी उनके घर में दिन में खाना नहीं खाता और उत्तर देता है - हम लोग दो समय ही खाना खाते हैं, एक सुबह और एक शाम। सुबह मैं खाना खाकर आता हूँ और शाम को जाकर खाऊँगा। यदि दिन में आपके यहाँ खाना खाने लगा तो मेरी आदत बिगड़ जाएगी।
आज की इस जोड़ तोड़ और छल फरेब वाली दुनिया में भोले और निश्छल लोग भी हैं- यह तथ्य मन को सकून देता है. डॉ. श्रीमती गुप्ता ने इसे लघुकथा के अंतर्गत दिया है, अतः यह एक काल्पनिक कथा भी हो सकती है. मैं यहाँ एक सत्य घटना दे रहा हूँ जो जनजातीय समाज के भोलेपन का नमूना प्रर्दशित करती है और निश्छलता और ईमानदारी के प्रति आस्था जगाती है . घटना इस प्रकार है -
घटना सन ९२ - ९३ की है। मेरे भांजे की शादी कोंडागांव (बस्तर - छत्तीसगढ़) में संपन्न हुई। रिसेप्शन में कुछ आदिवासी मजदूरों को भोजन व्यवस्था में मदद हेतु काम पर बुलाया गया था. यह तय हुआ था कि लगभग रात साढ़े दस बजे आयोजन समाप्त हो जायेगा. तय कार्यक्रम के अनुसार साढ़े दस बजे तक आयोजन समाप्त न होने पर वे लोग शिकायत करने लगे. हमारे समझाने पर उन्होंने अपने डेरे तक रात में पंहुचने की दिक्कत बताई. हमने उन्हें जीप से पहुंचाने का वादा किया. समस्या के इस समाधान से वे संतुष्ट हो गए. लेकिन दूसरी जो समस्या उन्होंने बताई उससे हम आश्चर्यचकित हो गए. उन्होंने बोला कि घर जाकर उन्हें अपने लिए खाना भी बनाना है.हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे दावत के इस आयोजन में बिना खाना खाए चले जायेंगे, जबकि वे मान कर चल रहे थे कि उन्होंने खाना तो घर जाकर ही खाना है. यह उनके सीधेपन का नमूना था. खैर उन्हें समझाया गया कि वे सब यहीं खाना खायेंगे और यदि कोई घर में अन्य भी हो तो उसके लिए ले के जायेंगे। इस प्रस्ताव पर वे बड़े संकोच से राजी हुए।
आगे इससे भी बड़े आश्चर्य की बारी थी। जब काम समाप्त होने पर उन्हें भुगतान किया गया तो सोचा गया कि इन्हें पहले से तय राशि से पाँच पाँच रूपये ज्यादा दे दिए जाएँ। यह प्रस्ताव उन्हें बहुत नागवार गुजरा और वे मानने लगे कि उनके साथ बेईमानी हो रही है। जब वे किसी तरह नहीं माने तो उन्हें पहले तय राशि के हिसाब से भुगतान किया। उसके बाद पाँच पाँच रूपये अलग से दे कर समझाया गया कि अच्छे काम के लिए उन्हें ईनाम दिया जा रहा है। इसे भी उन्होंने ससंकोच ग्रहण किया अब इसे आप उनकी बेवकूफी कह लीजिये या भोलापन, मैं तो उनकी सादगी और सच्चाई से प्रभावित हुए बिना न रह सका वह घटना मुझे डॉ.अजित गुप्ता की लघुकथा पढ़ते हुए अचानक याद आ गयी और आपके सामने प्रस्तुत कर दी
आज की इस जोड़ तोड़ और छल फरेब वाली दुनिया में भोले और निश्छल लोग भी हैं- यह तथ्य मन को सकून देता है. डॉ. श्रीमती गुप्ता ने इसे लघुकथा के अंतर्गत दिया है, अतः यह एक काल्पनिक कथा भी हो सकती है. मैं यहाँ एक सत्य घटना दे रहा हूँ जो जनजातीय समाज के भोलेपन का नमूना प्रर्दशित करती है और निश्छलता और ईमानदारी के प्रति आस्था जगाती है . घटना इस प्रकार है -
घटना सन ९२ - ९३ की है। मेरे भांजे की शादी कोंडागांव (बस्तर - छत्तीसगढ़) में संपन्न हुई। रिसेप्शन में कुछ आदिवासी मजदूरों को भोजन व्यवस्था में मदद हेतु काम पर बुलाया गया था. यह तय हुआ था कि लगभग रात साढ़े दस बजे आयोजन समाप्त हो जायेगा. तय कार्यक्रम के अनुसार साढ़े दस बजे तक आयोजन समाप्त न होने पर वे लोग शिकायत करने लगे. हमारे समझाने पर उन्होंने अपने डेरे तक रात में पंहुचने की दिक्कत बताई. हमने उन्हें जीप से पहुंचाने का वादा किया. समस्या के इस समाधान से वे संतुष्ट हो गए. लेकिन दूसरी जो समस्या उन्होंने बताई उससे हम आश्चर्यचकित हो गए. उन्होंने बोला कि घर जाकर उन्हें अपने लिए खाना भी बनाना है.हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे दावत के इस आयोजन में बिना खाना खाए चले जायेंगे, जबकि वे मान कर चल रहे थे कि उन्होंने खाना तो घर जाकर ही खाना है. यह उनके सीधेपन का नमूना था. खैर उन्हें समझाया गया कि वे सब यहीं खाना खायेंगे और यदि कोई घर में अन्य भी हो तो उसके लिए ले के जायेंगे। इस प्रस्ताव पर वे बड़े संकोच से राजी हुए।
आगे इससे भी बड़े आश्चर्य की बारी थी। जब काम समाप्त होने पर उन्हें भुगतान किया गया तो सोचा गया कि इन्हें पहले से तय राशि से पाँच पाँच रूपये ज्यादा दे दिए जाएँ। यह प्रस्ताव उन्हें बहुत नागवार गुजरा और वे मानने लगे कि उनके साथ बेईमानी हो रही है। जब वे किसी तरह नहीं माने तो उन्हें पहले तय राशि के हिसाब से भुगतान किया। उसके बाद पाँच पाँच रूपये अलग से दे कर समझाया गया कि अच्छे काम के लिए उन्हें ईनाम दिया जा रहा है। इसे भी उन्होंने ससंकोच ग्रहण किया अब इसे आप उनकी बेवकूफी कह लीजिये या भोलापन, मैं तो उनकी सादगी और सच्चाई से प्रभावित हुए बिना न रह सका वह घटना मुझे डॉ.अजित गुप्ता की लघुकथा पढ़ते हुए अचानक याद आ गयी और आपके सामने प्रस्तुत कर दी
रविवार, 19 अप्रैल 2009
ब्लोगर अपना अधिकतम परिचय उजागर करें ( ? )
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने ब्लोगर को पात्र बना कर एक लघुकथा दे दी थी. उस पर दो आदरणीय, वरिष्ठ ब्लोगर्स की परस्पर विपरीत टिप्पणियाँ आई हैं, जिससे मेरे मन में भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी है.इस पोस्ट के माध्यम से मैं चाहूंगा कि उचित अनुचित के निर्णय हेतु आप सब का मार्ग दर्शन मिले.
उस लघुकथा के माध्यम से मैं केवल यह दर्शाना चाहता था कि दो ब्लोगर जो ब्लॉग के माध्यम से एक दूसरे से भली भांति परिचित हों, वास्तविक जीवन में सहसा आमना सामना होने पर एक दूसरे को पहचानने से वंचित भी रह सकते हैं.
उस पोस्ट पर 'मानसिक हलचल' के वरिष्ठ ब्लोगर आदरणीय श्री ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की यह टिप्पणि आई –
मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं। आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है। पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।
आदरणीय ज्ञान दत्त पाण्डेय जी वरिष्ठ ब्लोगर हैं और समय समय पर अपनी सारगर्भित टिप्पणियों से मेरा उत्साह वर्धन करते रहते हैं.मैं उनकी टिपण्णी में कही गयी बात को नज़रंदाज़ नहीं कर सकता.
उधर घुघूती बासूती जी भी एक वरिष्ठ और आदरणीया ब्लोगर हैं.मूलतः मेरे क्षेत्र (कूर्मांचल) की होने के कारण मैं उनसे एक अलग तरह की आत्मीयता महसूस करता हूँ,जिसे इस पोस्ट को पढने वाले कूर्मांचली समझ सकते हैं. मैं ब्लॉग जगत में प्रवेश करने के पहले भी उनकी पोस्ट पढता रहा हूँ. मुझे उनकी बात को नकारने का भी साहस नहीं हो रहा है. आदरणीया घुघूती बासूती जी की टिप्पणि इस प्रकार थी-
सब के अपने अपने विचार हैं। छद्मनाम से मैं भी लिखती हूँ, अब जैसा बन पड़ता है लिखती हूँ। मुझे नहीं लगता कि यदि मैं अपना नाम पता देने लगूँ तो अचानक मेरा लेखन सुधर जाएगा।
ब्लोगर बन्धु भाई रजनीश परिहार ने भी छद्म नाम से लेखन को उचित नहीं ठहराया है.
इन तीनों टिप्पणियों से यह दुविधा उजागर हुई है कि ब्लोगर को अपने बारे में अधिक से अधिक तथ्य अपने परिचय में उजागर करने चाहिए या यह जरूरी नहीं है. यह भी विचारणीय है कि अधिकतम या न्यूनतम की सीमा क्या होनी चाहिए.
उस लघुकथा के माध्यम से मैं केवल यह दर्शाना चाहता था कि दो ब्लोगर जो ब्लॉग के माध्यम से एक दूसरे से भली भांति परिचित हों, वास्तविक जीवन में सहसा आमना सामना होने पर एक दूसरे को पहचानने से वंचित भी रह सकते हैं.
उस पोस्ट पर 'मानसिक हलचल' के वरिष्ठ ब्लोगर आदरणीय श्री ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की यह टिप्पणि आई –
मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं। आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है। पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।
आदरणीय ज्ञान दत्त पाण्डेय जी वरिष्ठ ब्लोगर हैं और समय समय पर अपनी सारगर्भित टिप्पणियों से मेरा उत्साह वर्धन करते रहते हैं.मैं उनकी टिपण्णी में कही गयी बात को नज़रंदाज़ नहीं कर सकता.
उधर घुघूती बासूती जी भी एक वरिष्ठ और आदरणीया ब्लोगर हैं.मूलतः मेरे क्षेत्र (कूर्मांचल) की होने के कारण मैं उनसे एक अलग तरह की आत्मीयता महसूस करता हूँ,जिसे इस पोस्ट को पढने वाले कूर्मांचली समझ सकते हैं. मैं ब्लॉग जगत में प्रवेश करने के पहले भी उनकी पोस्ट पढता रहा हूँ. मुझे उनकी बात को नकारने का भी साहस नहीं हो रहा है. आदरणीया घुघूती बासूती जी की टिप्पणि इस प्रकार थी-
सब के अपने अपने विचार हैं। छद्मनाम से मैं भी लिखती हूँ, अब जैसा बन पड़ता है लिखती हूँ। मुझे नहीं लगता कि यदि मैं अपना नाम पता देने लगूँ तो अचानक मेरा लेखन सुधर जाएगा।
ब्लोगर बन्धु भाई रजनीश परिहार ने भी छद्म नाम से लेखन को उचित नहीं ठहराया है.
इन तीनों टिप्पणियों से यह दुविधा उजागर हुई है कि ब्लोगर को अपने बारे में अधिक से अधिक तथ्य अपने परिचय में उजागर करने चाहिए या यह जरूरी नहीं है. यह भी विचारणीय है कि अधिकतम या न्यूनतम की सीमा क्या होनी चाहिए.
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
लघु कथा
ब्लोगर की व्यथा
धूप कुमार जी एक ब्लोगर हैं. उनकी पोस्टों पर प्राप्त टिप्पणियों में नजर डालिए तो टिप्पणिकारों में साया जी का नाम अवश्य मिलेगा और टिप्पणियाँ भी प्रायः लम्बी चौड़ी होती हैं. साया जी धूप कुमार जी के समर्थकों की सूची में भी हैं. यह भी कहा जा सकता है कि साया जी धूपकुमार जी के फैन हैं.
एक बार धूपकुमार जी रेल से यात्रा कर रहे थे. वहां उनका एक सहयात्री से विवाद हो गया और विवाद ने तूल पकड़ लिया, यहाँ तक कि सहयात्री हाथा पाई पर उतरने की तैयारी करने लगा. किसी तरह मामला शांत हो गया लेकिन धूप कुमार जी बहुत व्यथित थे. यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने अपने इस कडुवे अनुभव को अपने ब्लॉग में ,सहयात्री की तगड़ी खिंचाई करते हुए , लिख डाला. पहली टिप्पणि साया जी की आयी -
दुनियाँ में ऐसे लोग भी होते हैं. इनकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है.
साया जी तो सारा माजरा धूप कुमार जी की पोस्ट पढ़ कर समझ चुके थे.लेकिन धूप कुमार जी कभी नहीं जान पाए कि वह सहयात्री साया जी ही थे.
धूप कुमार जी एक ब्लोगर हैं. उनकी पोस्टों पर प्राप्त टिप्पणियों में नजर डालिए तो टिप्पणिकारों में साया जी का नाम अवश्य मिलेगा और टिप्पणियाँ भी प्रायः लम्बी चौड़ी होती हैं. साया जी धूप कुमार जी के समर्थकों की सूची में भी हैं. यह भी कहा जा सकता है कि साया जी धूपकुमार जी के फैन हैं.
एक बार धूपकुमार जी रेल से यात्रा कर रहे थे. वहां उनका एक सहयात्री से विवाद हो गया और विवाद ने तूल पकड़ लिया, यहाँ तक कि सहयात्री हाथा पाई पर उतरने की तैयारी करने लगा. किसी तरह मामला शांत हो गया लेकिन धूप कुमार जी बहुत व्यथित थे. यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने अपने इस कडुवे अनुभव को अपने ब्लॉग में ,सहयात्री की तगड़ी खिंचाई करते हुए , लिख डाला. पहली टिप्पणि साया जी की आयी -
दुनियाँ में ऐसे लोग भी होते हैं. इनकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है.
साया जी तो सारा माजरा धूप कुमार जी की पोस्ट पढ़ कर समझ चुके थे.लेकिन धूप कुमार जी कभी नहीं जान पाए कि वह सहयात्री साया जी ही थे.
रविवार, 12 अप्रैल 2009
कृति ( बेटी )
श्रीमती अनिता तिवारी सरस्वती विद्यामंदिर भोपाल में शिक्षिका हैं। उनके प्रथम काव्य संग्रह ''अनुभूति'' में प्रकाशित यह रचना किसी भी रचनाकार की कृति हो सकती है, आपकी भी –
जैसे
अप्सरा आसमाँ से उतरती हुई
अविरल
भागीरथी बहती हुई
जैसे
निशा में
कौमुदी दमकती हुई
ठीक वैसी ही दिखती
हमारी कृति
मन को छूती
भावशून्यता को हरती
चेतना को झकझोरती
सद्विचारों को बोती
हमारी कृति
शब्दों में ढली
भावों में पली
जीवन की यह संलग्ना सी
भानु की प्रस्फुटित रश्मियों की तरह
तिमिर को हरती
हमारी कृति
मेरी कल्पना
मेरा प्यार
मेरे शब्द
मेरे उद्गार
चमकती निहारिका सी
मेरे जीवन से बंधी
हमारी कृति
मेरी संकल्पना की
यह प्रति
सागर में उमड़ती
लहरों सी
मेरे जीवन की यह साधना
मन-मानस में बसती
हमारी कृति
मंदिर में सजी
मूर्तियों की तरह
दिखती है
कई प्रतियों की तरह
ज्योतित होती
ज्योतियों की तरह
मन को हरषाती
हमारी कृति
जाने मुझको
इससे है कितनी आस
यह
मेरी परछाई
मेरा विश्वास
मेरी आकृति दिखलाती
एक कलाकृति सी लगती
हमारी कृति
जैसे
अप्सरा आसमाँ से उतरती हुई
अविरल
भागीरथी बहती हुई
जैसे
निशा में
कौमुदी दमकती हुई
ठीक वैसी ही दिखती
हमारी कृति
मन को छूती
भावशून्यता को हरती
चेतना को झकझोरती
सद्विचारों को बोती
हमारी कृति
शब्दों में ढली
भावों में पली
जीवन की यह संलग्ना सी
भानु की प्रस्फुटित रश्मियों की तरह
तिमिर को हरती
हमारी कृति
मेरी कल्पना
मेरा प्यार
मेरे शब्द
मेरे उद्गार
चमकती निहारिका सी
मेरे जीवन से बंधी
हमारी कृति
मेरी संकल्पना की
यह प्रति
सागर में उमड़ती
लहरों सी
मेरे जीवन की यह साधना
मन-मानस में बसती
हमारी कृति
मंदिर में सजी
मूर्तियों की तरह
दिखती है
कई प्रतियों की तरह
ज्योतित होती
ज्योतियों की तरह
मन को हरषाती
हमारी कृति
जाने मुझको
इससे है कितनी आस
यह
मेरी परछाई
मेरा विश्वास
मेरी आकृति दिखलाती
एक कलाकृति सी लगती
हमारी कृति
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
आपको मालूम नहीं ? आपके ब्लॉग की चर्चा समाचार पत्र में हुई है.
१७ मार्च की सुबह मेरे पास हल्द्वानी ( उत्तराखंड) से फ़ोन आया आपकी पोस्ट
भिटौली .
आज के अमर उजाला में प्रकाशित हुई है. फिर दिन में देहरादून से भी इसी आशय का फ़ोन आया. मेरी बेटी ने, निकट भविष्य में मुरादाबाद से लौटने वाले एक परिचित को, उस पोस्ट की कटिंग लाने हेतु फ़ोन किया. कुछ ही दिनों में वह कटिंग मेरे पास आ गयी.
वह 'ब्लॉग कोना' स्तम्भ की कटिंग थी. उस स्तम्भ में दो अलग अलग ब्लोगों से एक एक पोस्ट ली गयी थी. एक पोस्ट साइंस ब्लॉग से 'तकनीक ने बदली महिलाओं की जिन्दगी' थी. दूसरी पोस्ट
मेरी थी.
इससे पहले मैंने विनीता यशस्वी जी की एक
पोस्ट पढी थी,जिसमें उन्होंने बताया था की दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिन्दुस्तान में उनके ब्लॉग की चर्चा हुई है, जिसकी जानकारी उन्हें एक फोन से मिली. संगीता पुरी जी को भी उनकी
पोस्ट . के भोपाल से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में प्रकाशन की जानकारी किसी के फ़ोन से मिली.
इस प्रकार अनेक ब्लोगरों को उनके ब्लॉग या पोस्ट की समाचार पत्रों में हुई चर्चा का पता उनके मित्रों द्वारा लगता है. यह भी सम्भव है कि किसी ब्लॉग की चर्चा किसी पत्र में हो और उस ब्लोगर को इसका भान भी न हो.
एक ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि जहां एक ओर कुछ साहित्यकार और पत्रकार ब्लॉग विधा की आलोचना करते हैं वहीं समाचार पत्र और पत्रिकाएँ इनका नोटिस भी ले रही हैं. एक पत्रिका के सम्पादक ने कहा कि ब्लॉग लेखन का एक फायदा जरूर है कि अब लेखक अपनी कचड़ा रचनाएँ हमारे पास भेज कर हमारा समय बर्बाद न करते हुए स्वयं अपने ब्लॉग पर डाल लेते हैं. वहीं किसी ने ब्लॉग लेखन को
सम्पादक के नाम पत्र बताया है.
बहरहाल ब्लॉग लेखक को तन्मयता से अपना काम करते रहना चाहिए.यदि उसके लेखन में कुछ भी सार्थक होगा तो स्वतः ही सामने आयेगा.
भिटौली .
आज के अमर उजाला में प्रकाशित हुई है. फिर दिन में देहरादून से भी इसी आशय का फ़ोन आया. मेरी बेटी ने, निकट भविष्य में मुरादाबाद से लौटने वाले एक परिचित को, उस पोस्ट की कटिंग लाने हेतु फ़ोन किया. कुछ ही दिनों में वह कटिंग मेरे पास आ गयी.
वह 'ब्लॉग कोना' स्तम्भ की कटिंग थी. उस स्तम्भ में दो अलग अलग ब्लोगों से एक एक पोस्ट ली गयी थी. एक पोस्ट साइंस ब्लॉग से 'तकनीक ने बदली महिलाओं की जिन्दगी' थी. दूसरी पोस्ट
मेरी थी.
इससे पहले मैंने विनीता यशस्वी जी की एक
पोस्ट पढी थी,जिसमें उन्होंने बताया था की दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिन्दुस्तान में उनके ब्लॉग की चर्चा हुई है, जिसकी जानकारी उन्हें एक फोन से मिली. संगीता पुरी जी को भी उनकी
पोस्ट . के भोपाल से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में प्रकाशन की जानकारी किसी के फ़ोन से मिली.
इस प्रकार अनेक ब्लोगरों को उनके ब्लॉग या पोस्ट की समाचार पत्रों में हुई चर्चा का पता उनके मित्रों द्वारा लगता है. यह भी सम्भव है कि किसी ब्लॉग की चर्चा किसी पत्र में हो और उस ब्लोगर को इसका भान भी न हो.
एक ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि जहां एक ओर कुछ साहित्यकार और पत्रकार ब्लॉग विधा की आलोचना करते हैं वहीं समाचार पत्र और पत्रिकाएँ इनका नोटिस भी ले रही हैं. एक पत्रिका के सम्पादक ने कहा कि ब्लॉग लेखन का एक फायदा जरूर है कि अब लेखक अपनी कचड़ा रचनाएँ हमारे पास भेज कर हमारा समय बर्बाद न करते हुए स्वयं अपने ब्लॉग पर डाल लेते हैं. वहीं किसी ने ब्लॉग लेखन को
सम्पादक के नाम पत्र बताया है.
बहरहाल ब्लॉग लेखक को तन्मयता से अपना काम करते रहना चाहिए.यदि उसके लेखन में कुछ भी सार्थक होगा तो स्वतः ही सामने आयेगा.
रविवार, 15 मार्च 2009
'भिटौली'- घुघूती की टेर
कूर्मांचल में चैत्र का महीना विवाहिता और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष महत्त्व का है. चैत्र माह की संक्रांति को 'फूल देई' का त्यौहार मनाया जाता है. (कूर्मांचल में सौर माह प्रचलित है , जो हर माह की संक्रांति से प्रारंभ होता है.)इस दिन कन्याएं फूल,चावल और गुड़ ले कर मोहल्ले या गाँव के प्रत्येक घर जा कर उनकी देहरी( प्रवेश द्वार) पूजती हैं. और बदले में पैसे और उपहार प्राप्त करती हैं.कन्याओं द्वारा देहरी पूजा जाना शुभ माना जाता है. अनेक लोग अपनी विवाहिता बेटियों से सदैव मायके से विदा होते समय देहरी पुजवाते हैं.
मैं यहाँ चैत्र में विवाहिताओं को दी जाने वाली 'भिटौली' का वर्णन करना चाहता हूँ.'भिटौली' एक ऐसा पर्व है जिसका कूर्मांचल की हर विवाहिता को बेसब्री से इन्तजार रहता है. यह माह अपने मायके वालों से मिलने का माह है. परम्परानुसार भाई अपनी बहन के लिए वस्त्र,पकवान और अन्य उपहार ,जिसे भिटौली कहते हैं, लेकर उसके गाँव जाता है. पुराने समय में जब आवागमन के साधनों का अभाव था(पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी आवागमन उतना सुविधाजनक नहीं है ) चैत्र माह विवाहिता के लिए भाई से मिलने की गारेंटी होता था. आज के समय में मिलने जुलने के अन्य मौके उपलब्ध हो गए हैं और भाई बहन केवल पहाड़ी क्षेत्रों में ही नहीं देश-विदेश में निवास कर रहे हैं इस लिए सांकेतिक रूप से भाई बहनों को धन भेज दिया करते हैं.इस माह में घुघूती नाम की एक चिड़िया कूर्मांचल में देखी जाती है, जिसके चहकने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उससे ऐसा लगता है मानो कह रही हो-
भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती
(भाई भूखा रहा, मैं सोती रही।)
इस सम्बन्ध में एक दंत कथा (लोक कथा) प्रचलित है :एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे | उनमें बहुत प्यार था | १५ वर्ष की उम्र में देबुली की शादी हुई ( जो उस समय के अनुसार बहुत बड़ी उम्र थी ) |शादी के बाद भी दोनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा | दोनों ही भिटौली के त्यौहार की प्रतीक्षा करने लगे | अंततः समय आने पर नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर खुशी - खुशी बहन से मिलने चला | बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी | पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया | देबुली तब गहरी नींद में सोई थी | थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया | सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी | देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी | अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा | शनिवार को देबुली के घर जाने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था | नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस अपने गाँव चला गया |देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी | नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं |वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी | लेकिन भाई नहीं मिला | वह पूरी बात समझ गयी |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये | कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' बन गयी और चैत के महीने में आज भी गाती है :
मैं यहाँ चैत्र में विवाहिताओं को दी जाने वाली 'भिटौली' का वर्णन करना चाहता हूँ.'भिटौली' एक ऐसा पर्व है जिसका कूर्मांचल की हर विवाहिता को बेसब्री से इन्तजार रहता है. यह माह अपने मायके वालों से मिलने का माह है. परम्परानुसार भाई अपनी बहन के लिए वस्त्र,पकवान और अन्य उपहार ,जिसे भिटौली कहते हैं, लेकर उसके गाँव जाता है. पुराने समय में जब आवागमन के साधनों का अभाव था(पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी आवागमन उतना सुविधाजनक नहीं है ) चैत्र माह विवाहिता के लिए भाई से मिलने की गारेंटी होता था. आज के समय में मिलने जुलने के अन्य मौके उपलब्ध हो गए हैं और भाई बहन केवल पहाड़ी क्षेत्रों में ही नहीं देश-विदेश में निवास कर रहे हैं इस लिए सांकेतिक रूप से भाई बहनों को धन भेज दिया करते हैं.इस माह में घुघूती नाम की एक चिड़िया कूर्मांचल में देखी जाती है, जिसके चहकने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उससे ऐसा लगता है मानो कह रही हो-
भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती
(भाई भूखा रहा, मैं सोती रही।)
इस सम्बन्ध में एक दंत कथा (लोक कथा) प्रचलित है :एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे | उनमें बहुत प्यार था | १५ वर्ष की उम्र में देबुली की शादी हुई ( जो उस समय के अनुसार बहुत बड़ी उम्र थी ) |शादी के बाद भी दोनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा | दोनों ही भिटौली के त्यौहार की प्रतीक्षा करने लगे | अंततः समय आने पर नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर खुशी - खुशी बहन से मिलने चला | बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी | पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया | देबुली तब गहरी नींद में सोई थी | थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया | सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी | देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी | अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा | शनिवार को देबुली के घर जाने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था | नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस अपने गाँव चला गया |देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी | नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं |वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी | लेकिन भाई नहीं मिला | वह पूरी बात समझ गयी |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये | कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' बन गयी और चैत के महीने में आज भी गाती है :
भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती
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