मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

लघु कथा

ब्लोगर की व्यथा

धूप कुमार जी एक ब्लोगर हैं. उनकी पोस्टों पर प्राप्त टिप्पणियों में नजर डालिए तो टिप्पणिकारों में साया जी का नाम अवश्य मिलेगा और टिप्पणियाँ भी प्रायः लम्बी चौड़ी होती हैं. साया जी धूप कुमार जी के समर्थकों की सूची में भी हैं. यह भी कहा जा सकता है कि साया जी धूपकुमार जी के फैन हैं.
एक बार धूपकुमार जी रेल से यात्रा कर रहे थे. वहां उनका एक सहयात्री से विवाद हो गया और विवाद ने तूल पकड़ लिया, यहाँ तक कि सहयात्री हाथा पाई पर उतरने की तैयारी करने लगा. किसी तरह मामला शांत हो गया लेकिन धूप कुमार जी बहुत व्यथित थे. यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने अपने इस कडुवे अनुभव को अपने ब्लॉग में ,सहयात्री की तगड़ी खिंचाई करते हुए , लिख डाला. पहली टिप्पणि साया जी की आयी -
दुनियाँ में ऐसे लोग भी होते हैं. इनकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है.

साया जी तो सारा माजरा धूप कुमार जी की पोस्ट पढ़ कर समझ चुके थे.लेकिन धूप कुमार जी कभी नहीं जान पाए कि वह सहयात्री साया जी ही थे.

22 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं।
    आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है।
    पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।
    और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।

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  2. लेकिन धूप कुमार जी कभी नहीं जान पाए कि वह सहयात्री साया जी ही थे.
    वाह ... बहुत बढिया ... अच्‍छा संस्‍मरण।

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  3. sochne par mazboor kar diya ..
    shyasd is vakye se hum apne vyavhar mein kuch sudhar layen

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  4. bhai ye to acchhi kahani ban gayee
    aap ise sansmaran bhi keh sakte hain khabar bhi ghatna bhi aur atamkatha bhi vah kya kamal hai badhai

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  5. सब के अपने अपने विचार हैं। छद्मनाम से मैं भी लिखती हूँ, अब जैसा बन पड़ता है लिखती हूँ। मुझे नहीं लगता कि यदि मैं अपना नाम पता देने लगूँ तो अचानक मेरा लेखन सुधर जाएगा।
    घुघूती बासूती

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  6. पहली टिप्पणि साया जी की आयी -
    "दुनियाँ में ऐसे लोग भी होते हैं. इनकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है"

    साया जी के ह्रदय के महानता देख मन प्रसन्न हो गया.

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  7. आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
    मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को ग़ज़ल,
    गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन है कि आप को ये पसंद आयेंगे।

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  8. बहुत अच्छा संस्मरण ..कभी कभी ऐसे लोग भी दिख जाते हैं.
    हेमंत कुमार

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  9. Dajyu Pelag...

    Bas yatuke kool:
    "Blooging ke paar jahan aur bhi hain" jahan jeevan ki ghatnaiyein hoti hain...

    :) :)

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  10. @ saher ji waise saya ji ka hriday to vishal tha par ye bhi to ho sakta hai ki unhone vyang kiya ho.....


    (Depends !!)

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  11. साया जी की इस द्विअर्थी टिप्पणी

    "दुनियाँ में ऐसे लोग भी होते हैं. इनकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है"

    से पुनः क्या विवाद को बल न मिलेगा.

    धूप और साया का न कभी मिलन हुवा है और न होगा पर साथ भी न छूटेगा, विवाद चाहे जितना भी हो जाये

    सुन्दर और आँख खोलने वाली प्रस्तुति पर आभार.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  12. वाह क्या व्यंग्यात्मक रचना है, बस आपकी विषय वस्तु पर सोच-सोच कर ही आनंद लिया जा सकता है.
    -विजय

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  13. मेरा मानना है की छदम नाम से लिखने में कोई तुक नहीं है..!हम तो लिखते ही आत्म संतुष्टि के लिए है फिर ये पर्दा क्यूँ?बाकी सबका अपना अपना नजरिया है....

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  14. धूप कुमार जी कभी नहीं जान पाए कि वह सहयात्री साया जी ही थे......सोचने को विवश करने वाली कथा......

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  15. बहुत बढिया!! इसी तरह से लिखते रहिए !

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