शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

कहानी

मुआवजा
(तीसरी कड़ी)

दूसरे दिन सुबह बचे नाथ ने ख़बर दी कि एक बुढ़िया रात के हादसे में मरी है. हरी सिंह ने अनुमान लगाया - एक की ख़बर है, पाँच - सात और भी मरे होंगे. कालोनी के सभी लोग इकठ्ठा हो रात की ही चर्चा कर अपने अपने अनुभव बता रहे थे. कुछ ही देर में जहांगीराबाद से गुमानीराम, श्यामला हिल से गणेशी लाल और टी टी नगर से जोशी जी आदि सभी आ आ कर हरी सिंह की कुशल क्षेम ले गए. इन्हीं लोगों से मालूम पड़ा कि पाँच - सात सौ से कम आदमी नहीं मरे.हमीदिया अस्पताल में लाशों के ढेर और मरीजों की भीड़ लगी है. छोला में रहने वाले टीकाराम जी का पूरा परिवार भारती है. इंदर भी यह सब सुन रहा था. उसे दुःख था तो केवल इस बात का कि अब फेक्ट्री में शायद उसकी नौकरी न लग पाये.'स्साली किस्मत ही ऐसी है'-उसने सोचा.

बचे नाथ और हरी सिंह दोनों ही हमीदिया अस्पताल की ओर चल पड़े. सोचा टीकारामजी के परिवार की कुशल ले आयें.अस्पताल में ऐसा लग रहा था जैसे बागेश्वर के उत्तरायणी का मेला हो.नीचे सड़क तक टेंट लगे थे और आंखों में दवा डाली जा रही थी.प्रत्येक टेंट में मरीजों की भयंकर भीड़ थी.पैदल,किसी का सहारा लिए, ताँगे में,मेटाडोर में भरकर और अन्य विभिन्न साधनों से गैस से बेहाल हुए लोग लाये जा रहे थे. वार्डों के भीतर पलंग पर और जमीन पर तो मरीज भरे ही थे,बाहर खुले में भी बेसुध कराह रहे लोगों की भरमार थी. कईयों को देख कर तो लग रहा था - अब मरे तब मरे. कुछ लोग लाश घर की ओर से आ रहे थे. उनमें से एक बोला-सात सौ तिरपन. रात कितनी बड़ी दुर्घटना हो गयी इसका अंदाजा बचे नाथ और हरी सिंह को अब हो रहा था. टीका राम जी के परिवार को इन हजारों की भीड़ में ढूंढ पाना असंभव था.निराश हो दोनों लौट आए. लौटने पर सबसे पहले दोनों के ही दिमाग में जो बात सबसे पहले आयी वह थी अपने अपने गाँव सूचना देने की. दोनों ही तार घर की ओर बढे.वहां जो भीड़ थी उसमें चार घंटे तक नंबर आने की कोई संभावना नहीं थी.चलो हमीदिया रोड के तारघर से तार कर लेंगे – उन्होंने सोचा.वहाँ पहुँचने पर भी भीड़ का वही आलम था. फ़िर भी दोनों ही लाइन में लग कर अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे. अचानक कुछ लोग भागते नजर आए.गैस फ़िर लीक हो गयी - कोई बोला.तारघर की सारी भीड़ और तार बाबू भी भागने वालों में शामिल हो गए. बचे नाथ और हरी सिंह भी भागने लगे.दोनों ही अपने अपने बीबी बच्चों की चिंता से उद्विग्न हुए जा रहे थे.भागते हुए जब तक घर पहुंचे, दोनों ने ही अपने अपने घरों पर ताले लटके देखे.आस पास के सारे घर सूने थे. कहाँ जाएँ परिजनों को ढूँढने वे ? हार कर दोनों हरी सिंह के घर के बंद दरवाजे पर पीठ टिका कर बैठ गए. दोनों ही परेशान हो उठे थे और शंका-कुशंका से घिरे थे. इधर लाउड स्पीकर से घोषणा की जाने लगी थी -'घबराएं नहीं, निश्चिंत रहें, अपने-अपने घरों को वापस जाएँ.अब किसी प्रकार का गैस रिसाव नहीं हुआ है.

वास्तव में फ़िर से गैस फैलने की अफवाह फ़ैल गयी थी और रात की घटना से भयभीत लोग अपने अपने घर छोड़ भाग उठे थे.कुछ देर बाद लोग अपने घरों को लौटने लगे. हरी सिंह और बचे नाथ का परिवार भी लौट आया था.इंदर खासा घबरा गया था. पहाडों की शांत और बेफिक्र जिन्दगी जीने वाला वह किशोर पहली बार शहर आया था और आते ही उसे ऐसा कटु अनुभव हुआ कि वह बुरी तरह विचलित हो गया.

2 टिप्‍पणियां:

  1. पाण्डेय जी अपनी कहानियो में आपने बड़ी ही मार्मिकता के साथ दर्द को दिखलाया है |
    उन्नत किस्म का लेखन | धन्यवाद |

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  2. बहुत अच्छी कहानी प्रस्तुत की आपने, बहुत बहुत धन्यवाद

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