गुरुवार, 3 सितंबर 2009

भारतीय संस्कृति की शान- तर्पण और क्षमा पर्व

भारतीय संस्कृति के दो पर्व - पितृ पक्ष और क्षमा पर्व मुझे प्रभावित करते हैं। आधुनिक समय में विभिन्न प्रकार के 'डे'(वेलेंटाइन डे, फादर्स डे आदि) मनाने वाले माडर्न लोगों को भी पितृ पक्ष से परहेज नहीं होना चाहिए । यह दिवंगतों की याद में मनाया जाने वाला दिवस ही नहीं पूरा पक्ष है। यह हमारी संस्कृति का एक उजला पक्ष है हमने पूरा एक पखवाड़ा दिवंगतों की याद को समर्पित किया है। आलोचक यह भी कह सकते हैं कि मृत व्यक्ति का श्राद्ध करने की अपेक्षा जीवित माता-पिता की सेवा करना अधिक युक्ति संगत है. मेरा मत है कि जिस प्रकार जीवित व्यक्ति के प्रति अपने पूरे दायित्व निभाने चाहिए उसी प्रकार मृत व्यक्ति को भी समुचित तरीके से याद किया जाना चाहिए. पितृ पक्ष दिवंगतों को याद करने का ही पर्व है.

इस पर्व का सबसे उजला पक्ष 'तर्पण' है, जिसे अनेक लोग केवल पितृ पक्ष में ही नहीं वरन पूरे वर्ष अपने नित्य कर्म में शामिल रखते हैं. तर्पण में श्रद्धांजलि स्वरूप दिया जाने वाला जल मृतात्मा को मिलता है या नहीं यह तर्क और विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन उसमें निहित भावनाएं अवश्य अनुकरणीय हैं –

( मेरे द्वारा दिए गए जल से) नदियाँ. पर्वत, सागर, वनस्पति, औषधि, मनुष्य, राक्षस, पिशाच और पूरे ब्रहमांड में मेरे द्वारा दिया जल ग्रहण करने योग्य सभी जन तृप्त हों.

यह मृतकों को दी जाने वाली अत्यंत विनम्र श्रद्धांजलि है.


इसी प्रकार की विनम्रता प्रर्दशित करने वाला एक अन्य पर्व जैन समाज द्वारा मनाया जाने वाला क्षमा पर्व है -
मेरे द्वारा जाने या अनजाने में किये गए किसी कृत्य से आपको दुःख पहुंचा हो तो उसके लिए मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ.

इन दोनों ही पर्वों की भावनाओं को सभी को आत्मसात करने की जरूरत है. इन पर्वों को अन्य धर्मावलम्बी भारतीय भी अपने तरीके से मना लें तो कोई बुराई नहीं.