मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

सिंहल और जीरामन



मेरा मानना है -पाक कला या व्यंजनों के बारे में संजीव कपूर जैसे लोग लिखें तो उसकी अहमियत है। लेकिन जब विभिन्न व्यंजनों के बारे में वीर संघवी और पुष्पेश पन्त के लेख राष्ट्रीय पत्रों में पढ़े तो मुझे लगा जो राजनीति, समाज और साहित्य आदि के बारे में लिख सकता है उसे खाने के बारे में लिखने का भी अधिकार हासिल हो जाता है। इसी नाते मैंने जबरदस्ती यह अधिकार हासिल कर आज एक कूर्मांचलीय व्यंजन और जैन समाज में लोक प्रिय एक चूर्ण के बारे में लिखने का संकल्प कर लिया।

चित्र में दिख रहा व्यंजन कूर्मांचलीय व्यंजन सिंहल है,जो चावल के आटे में शुद्ध घी का मोयन दे कर दही में दो तीन घंटे भिगो कर बनाया जाता है। इसमें शक्कर भी मिलाई जाती है। स्वाद के लिए कुछ लोग इलायची, सौंफ भी मिलाते हैं। इस तरह के पेस्ट को हथेली की मुट्ठी में भर कर घी या तेल में जलेबी के आकार का तल लिया जाता है। कूर्मांचल में त्योहारों में पकवान के रूप में इसे बनाया जाता है। वहां बुजर्ग महिलाएं इसे बनाने में माहिर होती हैं। अब कुछ महिलाएं चावल के आटे के स्थान पर सूजी ( रवा) का प्रयोग करती हैं। अनेक कूर्मांचलीयों की तरह मुझे भी यह व्यंजन बहुत पसंद है। मैं खुश किस्मत हूँ कि मेरी पत्नी इसे बना लेती है और प्रायः नाश्ते के रूप में यह व्यंजन मुझे मिल जाता है। कुछ लोग इसे ककड़ी के रायते में भिगो कर खाना पसंद करते हैं। मुझे 'जीरामन' के साथ सिंहल खाना भी रुचिकर लगा। संभवतः यह व्यंजन सम्पूर्ण भारत में केवल कूर्मांचल में ही बनता है। लेकिन वहां भी इसका स्वाद लेने के लिए किसी घर की शरण लेनी पड़ेगी क्योंकि बाजार में कहीं भी इसका व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता।



'जीरामन' एक प्रकार की सूखी चटनी है जो अनेक मसालों को मिला कर बनायी जाती है और जैन समाज में अत्यंत लोकप्रिय है । इसका व्यावसायिक उत्पादन करने वाले एक व्यापारी ने मुझे बताया कि इसमें ८० प्रकार के मसाले मिलाये जाते हैं। लेकिन मुझे केवल १९ वस्तुओं की ही जानकारी मिल पायी। ये हैं - सादा नमक, मिर्च,अमचूर या आंवला,धनिया, हल्दी, काला नमक, जीरा,सौंफ,सौंठ,दाल चीनी, अजवाइन, लौंग,तेजपत्ता,बड़ी इलायची, सिया जीरा, जायपत्री,जायफल, हींग, हर्र। बहरहाल मसालों की संख्या जो भी हो लेकिन उनका उचित अनुपात ही जीरामन को इतना स्वादिष्ट बना पाता होगा। कूर्मान्चाली सिंहल जैनी जीरामन के साथ कुछ और ही स्वाद देता है।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

हिन्दी को बचाने के लिए हिन्दी ब्लोगर क्या करें

विभिन्न कारणों से लगभग पिछले दो माह से ब्लॉग जगत से दूर रहा. आगे भी कितना नियमित रह पाऊंगा निश्चित नहीं. इस बीच अनेक विचार उपजे, अनेक घटनाएं घटीं जिन्हें ब्लॉग में देने की इच्छा है. इस निमित्त अपना ब्लॉग खोला तो उसमें प्रिंट मीडिया द्वारा की जा रही हिन्दी की दुर्दशा पर मेरे
लेख
पर श्री शैलेश की टिपण्णी मिली, जिसके द्वारा इसी विषय पर श्री प्रभु जोशी द्वारा लिखे गए गंभीर लेख का
लिंक मिला. लेख पढने के लिए थोड़ा समय और थोड़ा धीरज मांगता है.लेख में कुछ गंभीर बातों का जिक्र किया गया है. श्री जोशी के अनुसार मध्य प्रदेश के एक समाचार पत्र के सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों को बाकायदा निर्देश दिए गए थे कि वे समाचारों में शुद्ध हिन्दी की अपेक्षा हिंग्लिश को तरजीह दें. उनके अनुसार इस हिंग्लिश का प्रयोग अनायास ही नहीं हो रहा है अपितु एक षडयंत्र के तहत सायास हो रहा है और धीरे धीरे देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि प्रयोग किये जाने का षडयंत्र रचा जा रहा है. यदि वास्तव में ऐसा है तो यह एक गंभीर बात है. इसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए. श्री जोशी ने इस प्रतिरोध का तरीका भी बताया है, जिसे उन्होंने स्वयं भी अपनाया. उनके अनुसार हिन्दी प्रेमियों को व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से ऐसे समाचार पत्रों को पत्र लिख कर अपना विरोध जताना चाहिए.
हिन्दी ब्लोगर भी अपना विरोध इसी तरह से दर्ज करा सकते हैं. बल्कि वे अपने ब्लॉग में भी इस षडयंत्र के विरुद्ध अवश्य लिखें. आखिर हिन्दी के बचे रहने पर ही हिन्दी ब्लोगिंग बची रहेगी.

सोमवार, 28 सितंबर 2009

दुर्गोत्सव से जुड़ी बुराइयाँ

दुर्गोत्सव सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर देश के कुछ भागों में जगह जगह झाँकियाँ लगा कर उत्सव मनाया जाता है।धार्मिक भावना,हर्षोल्लास और उमंग के इस त्यौहार के साथ अनेक बुराइयाँ भी जुड़ गयीं हैं। उनका निराकरण किया जाना चाहिए। निराकरण के उपाय कैसे अपनाए जाएँ , यह मैं स्वयं नहीं जानता। हाँ उन बुराइयों को इंगित अवश्य किए देता हूँ :-

१- अनेक स्थानों पर आयोजन हेतु जबरन चन्दा वसूली।
२- सार्वजनिक स्थानों पर इस प्रकार झाँकी लगा देना कि यातायात अवरुद्ध हो।
३- लाउड स्पीकरों के प्रयोग से आसपास रहने वालों को असुविधा उत्पन्न होना, जिनमें विद्यार्थी और बीमार भी शामिल हैं।
४- झाँकी स्थल पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित होना जो धार्मिक आयोजन के अनुरूप न हों।
५- विशालकाय मूर्तियों का विसर्जन, जो विसर्जन स्थल को प्रदूषित करता है।

- इन बुराइयों के निराकरण हेतु शहर के जिम्मेदार नागारिकों द्वारा स्थानीय स्तर पर त्यौहार समीतियाँ बना कर सभी मुहल्लों की समितियों पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

दुर्गोत्सव का सबसे उजला पक्ष कन्या पूजन है।यदि हम कन्या को पूज रहे हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि अपने दैनिक जीवन में भी हम कन्या को यथोचित सम्मान दें। अन्यथा एक दिन की हमारी यह पूजा कोरा कर्मकांड और दिखावे की धार्मिकता है.

सोमवार, 21 सितंबर 2009

ईद का पर्व मंगलमय हो

'ईद का पर्व मंगलमय हो' - मैंने सतीश सक्सेना के ब्लॉग 'मेरे गीत' में ईद पर लिखे लेख पर यही टिप्पणि दी है। सामान्यतः आशा की जाती है कि लोग ईद की मुबारकबाद दें और नवरात्र तथा विजयादशमी पर शुभकामनाएं भेजें। शुभकामना एक हिन्दी शब्द है और मुबारक उर्दू। इस तरह हम हिन्दी को हिन्दुओं और उर्दू को मुसलामानों के त्योहारों से जोड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं, जो कि सरासर ग़लत है। यह साम्प्रदायिकता का ही एक नमूना है। हम हिन्दीभाषी हैं और अपनी शुभकामनाएं हिन्दी में प्रेषित करें तो कुछ भी ग़लत नहीं करते.यहाँ 'मुबारक'शब्द इस चर्चा का एक बहाना है।यह शब्द तो हिन्दी में घुल मिल गया है।मैं उस मानसिकता का विरोध करना चाहता हूँ जो हिन्दी को हिन्दुओं और उर्दू को मुसलमानों से जोड़ती है.यही बात संस्कृत को ले कर भी है। संस्कृत में कही बात हिन्दुओं से सम्बंधित मान ली जाती है। यहाँ मैं फारसी का जिक्र इस लिए नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि संस्कृत हमारे देश की भाषा है और हमारा सरोकार फारसी के मुकाबले संस्कृत से बहुत अधिक है।

हमें भाषा को भाषा ही रहने देना चाहिए। उसे धर्म से जोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

भारतीय संस्कृति की शान- तर्पण और क्षमा पर्व

भारतीय संस्कृति के दो पर्व - पितृ पक्ष और क्षमा पर्व मुझे प्रभावित करते हैं। आधुनिक समय में विभिन्न प्रकार के 'डे'(वेलेंटाइन डे, फादर्स डे आदि) मनाने वाले माडर्न लोगों को भी पितृ पक्ष से परहेज नहीं होना चाहिए । यह दिवंगतों की याद में मनाया जाने वाला दिवस ही नहीं पूरा पक्ष है। यह हमारी संस्कृति का एक उजला पक्ष है हमने पूरा एक पखवाड़ा दिवंगतों की याद को समर्पित किया है। आलोचक यह भी कह सकते हैं कि मृत व्यक्ति का श्राद्ध करने की अपेक्षा जीवित माता-पिता की सेवा करना अधिक युक्ति संगत है. मेरा मत है कि जिस प्रकार जीवित व्यक्ति के प्रति अपने पूरे दायित्व निभाने चाहिए उसी प्रकार मृत व्यक्ति को भी समुचित तरीके से याद किया जाना चाहिए. पितृ पक्ष दिवंगतों को याद करने का ही पर्व है.

इस पर्व का सबसे उजला पक्ष 'तर्पण' है, जिसे अनेक लोग केवल पितृ पक्ष में ही नहीं वरन पूरे वर्ष अपने नित्य कर्म में शामिल रखते हैं. तर्पण में श्रद्धांजलि स्वरूप दिया जाने वाला जल मृतात्मा को मिलता है या नहीं यह तर्क और विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन उसमें निहित भावनाएं अवश्य अनुकरणीय हैं –

( मेरे द्वारा दिए गए जल से) नदियाँ. पर्वत, सागर, वनस्पति, औषधि, मनुष्य, राक्षस, पिशाच और पूरे ब्रहमांड में मेरे द्वारा दिया जल ग्रहण करने योग्य सभी जन तृप्त हों.

यह मृतकों को दी जाने वाली अत्यंत विनम्र श्रद्धांजलि है.


इसी प्रकार की विनम्रता प्रर्दशित करने वाला एक अन्य पर्व जैन समाज द्वारा मनाया जाने वाला क्षमा पर्व है -
मेरे द्वारा जाने या अनजाने में किये गए किसी कृत्य से आपको दुःख पहुंचा हो तो उसके लिए मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ.

इन दोनों ही पर्वों की भावनाओं को सभी को आत्मसात करने की जरूरत है. इन पर्वों को अन्य धर्मावलम्बी भारतीय भी अपने तरीके से मना लें तो कोई बुराई नहीं.

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

शासन ने दी है मोबाइल कंपनियों को लूटने की खुली छूट

भ्रष्टाचार हम लोगों के लिए कोई नया मुद्दा नहीं है और न ही हमें इससे विशेष परहेज ही है.दूसरे शब्दों में भ्रष्टाचार हमारे समाज में घुलमिल गया है, रच-बस गया है. टी टी को रिश्वत दे कर ट्रेन में जगह पा लेना या गैस वाले से ब्लेक में बिना नंबर के गैस खरीद लेना, सिनेमा के टिकट ब्लेक में खरीदना आदि कृत्य आम बात हैं. भ्रष्टाचार का एक और रूप है - बख्शीश.पोस्टमैन या सफाई वाले को आपने त्योहारों पर बख्शीश नहीं दी तो आपकी डाक समय पर और सकुशल पहुँचने तथा आपके घर के पास की सड़क की सफाई की संभावना काफी कम हो जाती है, यद्यपि इन लोगों को इस काम के लिए सम्बंधित विभाग से वेतन मिलता है. अनेक लोग तो बख्शीश को भ्रष्टाचार की श्रेणी में रखने पर ऐतराज भी कर सकते हैं.

मैं आज एक अन्य श्रेणी के भ्रष्टाचार की चर्चा करने जा रहा हूँ. इस भष्टाचार की इजाजत शासन ने स्वयं दे रखी है. इस तरह के भ्रष्टाचार का एक उदाहरण पेट्रोल पम्प हैं. पेट्रोल और डीजल के दाम इस तरह निर्धारित होते हैं कि आप चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते और आप को हर बार अपने वाहन में पेट्रोल, डीजल भराने पर पेट्रोल पम्प वाले को कुछ पैसे अधिक देने ही होते हैं. आप पेट्रोल की मात्रा कुछ पॉइंट घटा बढ़ा कर इस घाटे को कम कर सकते हैं,इससे ज्यादा कुछ नहीं. .यही हाल मोबाईल कंपनियों का है. नए लांच हुए टाटा डोकोमो को छोड़ कर सभी मोबाइल कंपनियाँ प्रति मिनट पल्स के हिसाब से पैसा वसूलती हैं. सामान्यतः बात कुछ मिनट और कुछ सेकंड होती है. इस प्रकार प्रत्येक वार्ता में आपको उन सेकंड का भी भुगतान करना होता है, जिनका आपने उपयोग ही नहीं किया.

टाटा ने अपनी जी एस एम मोबाइल सर्विस डोकोमो नाम से शुरू की है. इसमें वे एक पैसा प्रति सेकंड की दर से देश में कहीं भी बात करवा रहे हैं.इस तरह टाटा डोकोमो के उपभोक्ता अब उन सेकंड के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं, जिनका उन्होंने उपयोग ही नहीं किया है. अब तक प्रति मिनट की पल्स की अनुमति देकर शासन ने मोबाइल सेवा कंपनियों को लूटने की खुली छूट दे रखी है. ट्राई को चाहिए कि वह सभी मोबाइल सेवा कंपनियों को प्रति सेकंड पल्स के लिए बाध्य कर के उपभोक्ताओं को राहत दे. हम तो केवल कामना ही कर सकते हैं कि ईश्वर ट्राई को सद्बुधि दे या मोबाइल कंपनियाँ प्रतिस्पर्धा के कारण ग्राहकों को यह सुविधा स्वेच्छा से दे दें.

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

चेतन भगत ठीक कहते हैं

चेतन भगत युवाओं के लिए एक जाना पहचाना नाम है, अंग्रेजी में लिखे उनके तीनों उपन्यास भारतीय युवाओं ने काफी पसंद किये. आज कल वे अखबारों में लेख लिख कर भी कृषि और रक्षा सहित देश की अनेक समस्याओं पर अपनी राय देने लगे हैं. वे स्वयं आई आई टी और आई आई एम के पढ़े हैं इसलिए मैं शिक्षा के सम्बन्ध में दिए गए उनके विचारों के सम्बन्ध में बात करूंगा.

अपने उपन्यास 'फाइव पॉइंट समवन' में उन्होंने देश के सबसे अधिक प्रतिष्ठित इनजीनिअरींग संस्थान आई आई टी में पढ़ रहे कम अंक (जिसे आई आई टी में पॉइंटर कहा जाता है) पाने वाले छात्रों को ले कर उनकी मनःस्थिति का वर्णन किया है.उनके अनुसार आई आई टी जैसे संस्थान भी केवल बंधे बंधाए ढर्रे से चल रहे हैं. वहाँ भी छात्रों में कुछ मौलिक करने, मौलिक सोचने का माद्दा पैदा नहीं हो पाता. कुछ दिनों पहले 'हिनुस्तान टाइम्स' में छपी उनकी पहली कहानी का पात्र हायर सेकंडरी में ९२ % अंक प्राप्त करने के बाद भी दिल्ली के टॉप कहे जाने वाले कालेज में दाखिला नहीं ले पाता क्योंकि वहाँ कट ऑफ ९५ % पहुँच जाता है.इससे व्यथित हो वह आत्महत्या करने का विचार करने लगता है. इससे पहले उन्होंने एक लेख में इंगित किया था कि सरकार स्टील और कोयला जैसी जिंसों के व्यापार में लिप्त न रह कर शिक्षा की तरफ ध्यान दे. उनके अनुसार आज भी इतने अधिक और अच्छे शिक्षा संस्थान नहीं हैं कि बड़ी तादाद में आने वाले प्रतिभावान छात्रों को आसानी से दाखिला मिल जावे.

वास्तव में स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने से लेकर परीक्षाएं समाप्त कर ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने तक की अनेक बहसें जब तब चलती रहती हैं.गरीब बच्चों के लिए दोपहर भोजन की व्यवस्था शुरू हो ही गयी है. अभी अभी शिक्षा विधेयक लाया गया है जो कानून बनने की तैयारी कर रहा है.लेकिन इन सारे प्रयत्नों के बावजूद शिक्षा संबन्धी सुधार नहीं हो पा रहे हैं. आज के बच्चे का बचपन काफी कुछ आज की शिक्षा ने ही छीना है.होम वर्क और कोचिंग उसे पूरा दिन पढाई में ही व्यस्त रखते हैं. मनोरंजन केवल टी वी के ऊलजलूल कार्यक्रमों और कम्पयूटर गेम्स तक सीमित रह गया है.

आज शिक्षा और स्वास्थ सुविधाओं का पूरी तरह व्यवसायीकरण हो चुका है. गरीब के लिए अच्छे स्कूल में पढ़ना या अच्छे अस्पताल में इलाज करवाना असंभव हो गया है. संभवतः चेतन भगत ठीक कहते हैं. सरकार को उद्योग और होटल चलाने की अपेक्षा शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर और सर्वसुलभ बनाने की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए.यदि पब्लिक सेक्टर के बैंक और उद्योग प्राइवेट सेक्टर से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं तो सरकारी स्कूल और अस्पताल क्यों नहीं ?

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

स्वाइन फ्लू का इलाज - तुलसी

स्वाइन फ्लू के प्रकोप ने आजकल लोगों में आतंक फैला रखा है.अब तक ८०० से अधिक मरीज पाए गए हैं, जिनमें २४ की मौत हो चुकी है. भीड़ भाड़ भरे स्थानों में जाने, मास्क पहनने आदि की सलाह दी जा रही है. सरकारी स्तर पर हर संभव प्रयत्न किये जा रहे हैं. लोग भी जागरूक नजर आ रहे हैं और साधारण फ्लू होने पर भी तुंरत जांच के लिए पंहुच रहे हैं. ऐसे में एक सुखद समाचार मेरी नजर में आया जिसे मैं आप लोगों से साझा करना चाहता हूँ.

तुलसी के २०-२५ पत्तों का रस या पेस्ट प्रतिदिन खाली पेट सेवन करने से स्वाइन फ्लू की संभावना से बचा जा सकता है. तुलसी वाइरल बीमारियों से लड़ने में मदद करती है.यदि व्यक्ति स्वाइन फ्लू से पीड़ित हो चुका हो तो भी इसके सेवन से स्वास्थ्य लाभ करने में मदद मिलती है. मेरी इस जानकारी का स्त्रोत याहू समाचार है.

तुलसी के औषधीय गुणों से भारतीय बहुत पहले से परिचित हैं और साधारण सर्दी जुकाम (जो वाइरस का प्रकोप है) में काढ़े के रूप में इसका सेवन करना हम लोगों के लिए आम बात है. हर हिन्दू के घर में तुलसी का पौधा होना तो आम बात है, हर गैर हिन्दू को भी तुलसी अपने घर में लगानी चाहिए. मेरी यह अपील साम्प्रदायिक न मानी जाए. आज तुलसी के औषधीय गुण विज्ञान सम्मत हैं. कल अगर तुलसी को पर्यावरण शुद्ध करने वाला पौधा पाया गया तो कोई ताज्जुब नहीं.इसलिए मैं उन लोगों को अधिक बुद्धिमान मानता हूँ जो किसी अंधविश्वास या धार्मिक मान्यताओं के अधीन तुलसी को आज भी महत्त्व देते हैं बनिस्बत उनके जो तुलसी को महत्व देने के लिए उसकी महत्ता सिद्ध होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इसी लिए मैं कहता हूँ यदि किसी मान्यता को मान लेने में कोई नुक्सान नहीं तो उसे मान लेना चाहिए.

रविवार, 9 अगस्त 2009

संपत्ति संबन्धी झगड़ों के लिये राजा परीक्षित जिम्मेदार (?)

एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा परीक्षित ने कलियुग को परास्त कर दिया था, लेकिन उस पर दया कर के उसके रहने के लिए चार स्थान उपलब्ध करा दिए थे - द्यूत, मद्यपान, काम-वासना और हिंसा.कलियुग द्वारा और भी स्थान मांगे जाने पर उन्होंने उसे 'धन' में भी रहने की अनुमति दे दी. पौराणिक कथाएँ प्रतीक रूप में अपनी बात कहने के लिए जानी जाती हैं. इस कथा के अनुसार प्रथम चार स्थान तो सहजता से समझ में आ जाते हैं. लेकिन पांचवा स्थान इतनी सहजता से गले से नीचे नहीं उतरता.

धन में कलियुग के वास की धारणा के सम्बन्ध में मेरा व्यक्तिगत अनुभव कुछ विशेष नहीं है. कुछ विशिष्ट चर्चित हस्तियों की ओर नजर दौड़ाता हूँ तो मुझे बिड़ला घराने की याद आती है. जहाँ परिवार से बाहर के एक विश्वस्त कर्मचारी को वसीयत की सम्पति मिल जाने से परिवार में विखंडन की नौबत आयी थी. दूसरा उदाहरण है - ग्वालियर की राजमाता सिंधिया का सरदार आंग्रे पर मेहरबान हो जाना. ताजे उदाहरणों में मुकेश अम्बानी और अनिल अम्बानी पर आ रही अखबारों की सुर्खियाँ और जयपुर की राजमाता गायत्री देवी की २१५० करोड़ की सम्पति की वसीयत खुलने से पहले ही उठ रहे विवाद की सुगबुगाहट है.

तो क्या 'धन' में भी कलियुग का वास है ? क्या सारी जिम्मेदारी राजा परीक्षित की है ?

रविवार, 2 अगस्त 2009

मित्रता दिवस के बहाने

आज जब लोग मित्रता दिवस की बात करते हैं तो मुझे तो इसके पीछे भी बाजारवाद झांकता नजर आता है. जब मेरे मित्र कहते हैं कि इसका प्रारंभ तो अमेरिकी शासन की पहल पर १९३५ में ही हो गया था तो मेरा तर्क होता है कि अमेरिका तो सदा से ही बाजारवादी रहा है.हम हिन्दुस्तानियों को न तो मदर्स डे, फादर्स डे मनाने की जरूरत है और न फ्रेंडशिप डे. हम तो नित्य ही ये रिश्ते निभाते रहते हैं.

हम जानते हैं कि दोस्ती का रिश्ता तो कृष्ण ने निभाया था. यद्यपि सुदामा मानते थे कि कृष्ण से उनकी कोई समानता नहीं –

आपकी दुनिया से मेरी दुनिया की निस्बत नहीं
आप रहते हैं चमन में और मैं वीराने में.


पत्नी को उन्होंने समझाने की कोशिश भी की थी कि कृष्ण के पास जाने का कोई औचित्य नहीं. शायद उस समय उनकी मनःस्थिति नवाब मिर्जा खां 'दाग' के शब्दों में इस तरह की रही होगी-

कहीं दुनिया में नहीं इसका ठिकाना ए 'दाग'
छोड़कर मुझको कहाँ जाय मुसीबत मेरी
.

लेकिन बाल सखा कृष्ण ने सच्ची दोस्ती निभाते हुए उन्हें वह सब दिया जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी.कृष्ण के मन की अभिव्यक्ति 'अमीर' मीनाई के इन शब्दों में मिलती है –

खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है.


दोस्ती और दुश्मनी की हकीकत शायद 'माइल' देहलवी से बेहतर और कोई नहीं जानता –

लड़ते हैं बाहर जाके ये शेख और बिरहमन
पीते हैं मयकदे में सागर बदल बदल के.


वैसे दोस्तों की नसीहत से संभवतः मिर्जा गालिब भी परेशान थे. तभी तो उन्हें कहना पड़ा –

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोइ चारासाज होता, कोई गमगुसार होता.


'अमीर' मीनाई का सच्चा दोस्त दर्द था –

जब कहा उसने शबे गम को गमख्वार न था
दर्द ने उठ के कहा 'क्या ये गुनहगार न था ?'


लेकिन कुछ दोस्त ऐसे उबाऊ भी होते हैं जिनके खिसक लेने से ही राहत मिलती है -

गुजरा जहाँ से मैं तो कहा हँस के यार ने
"किस्सा गया,फिसाद गया, दर्दे- सर गया."

- पंडित दया शंकर 'नसीम' लखनवी

फिलहाल तो मैं भी इस पोस्ट से खिसक लेने में ही खैर समझता हूँ. नमस्कार !

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

भारत में होमियोपैथी हजारों वर्ष पहले प्रचलित थी

यह सर्वज्ञात तथ्य है कि होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति का जन्म जर्मनी में हुआ था. वहाँ के डाक्टर हैनिमेन ने १७९० में इसका प्रवर्तन किया था.इस पद्धति के बारे में अपने सामान्य ज्ञान से मुझे केवल इतना ज्ञात है कि होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति में मरीज में दिख रहे लक्षणों के आधार पर बीमारी का इलाज किया जाता है.यह देखा जाता है कि मरीज के शरीर पर दिख रहे लक्षण किन पदार्थों ( दवाओं) से उपजते हैं.उपचार के लिए वही पदार्थ दवा के रूप में दिए जाते है.संक्षेप में यह पद्धति 'जहर को जहर मारता है' के सिद्धांत पर काम करती है.

मैंने कहीं पढा था कि वैदिक ग्रंथों और कुछ यूनानी ग्रंथों में भी इस पद्धति का उल्लेख मिलता है. मैंने इन ग्रंथों का अध्ययन नहीं किया है और निश्चित रूप से इस बारे में कुछ नहीं कह सकता. लेकिन मेरा विश्वास है कि जहर से जहर को मारने के सिद्धांत द्वारा भारत में अतीत में उपचार किये जाते होंगे. मेरा यह विश्वास श्रीमद्भागवत पुराण के प्रथम स्कंध के पाँचवे अध्याय के तैंतीसवें श्लोक से पक्का बना. वह श्लोक इस प्रकार है –

आमयो यश्च भूतानां जायते येन सुव्रत |
तदेव ह्यामयं द्रव्यं न पुनाति चिकित्सितं ||

-प्राणियों को जिस पदार्थ के सेवन से जो रोग हो जाता है वही पदार्थ चिकित्साविधि के अनुसार प्रयोग करने पर क्या उस रोग को दूर नहीं करता ?

(उपरोक्त श्लोक और उसका अर्थ मैंने गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवत पुराण से उद्धृत किया है)

रविवार, 19 जुलाई 2009

प्रिंट मीडिया द्वारा हिन्दी की दुर्दशा

यह ज्ञात तथ्य है कि समाचार पत्र और पत्रकारिता ने अनेक नए शब्द दे कर हिन्दी को समृद्ध किया है. पिछले दिनों अजित वडनेरकर जी के 'शब्दों के सफ़र' में संचार माध्यमों द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली हिन्दी के बारे में एक पोस्ट आयी थी. मैंने प्रिंट मीडिया द्वारा वर्तमान में हिन्दी की दुर्दशा किये जाने के बारे में उस पोस्ट पर टिप्पणि दी थी, जो संभवतः तकनीकी कारणों से प्रकाशित नहीं हुई. वही बात मैं इस पोस्ट द्वारा व्यक्त कर रहा हूँ. टी वी चेनलों द्वारा हिन्दी की दुर्दशा तो होती ही है.लेकिन समाचार पत्र और पत्रिकाएँ भी इस बात में पीछे नहीं हैं. 'इंडिया टुडे' और 'आउटलुक' के उच्चारण से यह नहीं लगता कि ये हिन्दी की पत्रिकाएँ हैं.संभवतः अपने अंगरेजी संस्करणों की लोकप्रियता और पहचान को बरकरार रखने के लिए इन्होंने हिन्दी में भी इसी नाम को अपनाया. लेकिन इस तरह से हिन्दी का नुक्सान तो कर ही दिया.

यहाँ मैं हिन्दी समाचार पत्र 'दैनिक भास्कर', जो उसमें छपने वाली एक पंक्ति के अनुसार 'भारत का सबसे बड़ा समाचार पत्र समूह' है, द्वारा की जाने वाली हिन्दी की दुर्दशा का वर्णन कर रहा हूँ. इस पत्र में छपने वाले कॉलम इस प्रकार हैं - 'मानसून वॉच' और 'न्यूज इनबॉक्स'. अन्य नमूने - सिटी अलर्ट,सिटी इन्फो, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क,मार्केट डिजिट्स,वर्ल्ड स्पोर्ट्स, सिटी स्पोर्ट्स,आदि. गनीमत है की सिटी भास्कर , सिटी प्लस,सिटी हॉट और वूमन भास्कर में वे देवनागरी का प्रयोग कर रहे हैं. 'भास्कर classified' और 'DB स्टार' में तो उन्होंने देवनागरी को भी नहीं बख्शा है.

इस समाचार पत्र के 'एजुकशन भास्कर' पृष्ठ में छपे एक समाचार की हिन्दी पर गौर फरमाइए -
कैरियर के साथ वेलफेयर भी
नए कोर्स और कॉम्बिनेशन तो स्टूडेंट्स को लुभा ही रहे हैं, साथ ही सोशियोलोजी जैसे ट्रेडिशनल सब्जेक्ट भी ढेरों नये जॉब ऑप्शन अवेलेबल करवा रहे हैं.

क्लिष्ट हिन्दी का विरोध किया जाता है. सरल हिन्दी का प्रयोग किया जाना चाहिए. लेकिन यह कैसी हिन्दी है ?

सोमवार, 13 जुलाई 2009

अंधविश्वास पर विश्वास कीजिये

अन्धविश्वासी या रूढिवादी व्यक्ति अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. उदाहरणस्वरूप यदि बिल्ली रास्ता काट जाए और इसे अपशकुन मान कोई व्यक्ति अपना कोई कार्य स्थगित कर दे तो वह पिछड़ा माना जाएगा.लेकिन मैं यहाँ, अंधविश्वास पर विश्वास न करते हुए भी उसके पक्ष में लिखने जा रहा हूँ.हमें ठीक ठीक यह मालूम नहीं है कि बिल्ली का रास्ता काटना अपशकुन(बुरा) क्यों है. लेकिन यदि बिल्ली के रास्ता काटने पर कोई व्यक्ति अपना प्रस्थान स्थगित कर देता है और ऐसा करने से उसकी कोई हानि नहीं होती तो इसमें बुराई क्या है. पिछले दिनों एक ब्लॉग में समाचार पत्रों में छपने वाले दैनिक या साप्ताहिक भविष्य फल की आलोचना की गयी थी. इन भविष्य फलों पर अविश्वास करने के बावजूद मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि आपके भविष्य फल में लिखा है कि नीला रंग शुभ फल दायक है. आपके पास नीली शर्ट है. उसे आप पहन लेते हैं तो हानि क्या है. मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि अन्धविश्वासी बातों पर अंधविश्वास तो मत कीजिये लेकिन यदि उन बातों को मानने से किसी का कोई नुक्सान न होता हो तो उन्हें मानने में हर्ज नहीं. हाँ ये अंधविश्वास उपजे कैसे इसकी तर्क संगत खोज की जानी चाहिए. ऐसा न हो कि गहराई में जाने पर हमें मालूम पड़े कि जिसे हम अंधविश्वास मानते थे वह एक वैज्ञानिक सच्चाई है.

एक सत्य घटना देकर अपनी बात समाप्त करता हूँ.- मेरी बेटी, जो अब एक बच्ची की माँ है,जन्म के कुछ दिन भीतर ही पीलिया से पीड़ित हो गयी और उसके गले के पास एक फोड़ा हो गया,जिसका आपरेशन २०-२५ दिन की आयु के भीतर ही करना पडा था. बच्ची अस्पताल में थी और उस के जीवित रहने की आशा बहुत कम थी.हमारे एक पारिवारिक मित्र ( जिनका अहसान मैं आज भी मानता हूँ ) ने राय दी कि बच्ची की झाड़ फूंक की जावे.इन बातों पर विश्वास न होने के कारण मैंने विशेष रूचि नहीं ली.अधिक आग्रह करने पर मैं यह उपाय भी आजमाने को राजी हो गया. मैं यह नहीं मानता कि मेरी बेटी उस झाड़ फूंक से बच गयी. लेकिन यह मानता हूँ कि यदि झाड़ फूंक न की होती और उसका अनिष्ट हो जाता तो आजीवन मलाल रहता.

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

श्रद्धांजलि

दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि देने हेतु लोगों के अपने अपने तरीके हैं. कुछ लोग समाचार पत्रों में विज्ञापन दे कर दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि देते हैं. एक परिवार द्बारा अपने दिवंगत आत्मीय की
प्रथम पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि देने हेतु दिए गए विज्ञापन में मैंने एक कविता पढी.मैं न तो उस दिवंगत आत्मा को जानता हूँ. न उनके परिवार को. मुझे यह भी मालूम नहीं कि कविता उस परिवार ने कहीं से उद्धृत की है या परिवार के ही किसी सदस्य ने लिखी है. वह कविता मुझे एक उत्कृष्ट रचना लगी. मैं उसे आप लोगों से साझा करना चाहता हूँ -

पत्र में मैंने लिखी
कुछ वेदना की बात थी,
नम आँखों की दवात में,
स्याही भी पर्याप्त थी |
वर्ष भर लिखता रहा
तुम्हारे विछोह में,
किन्तु पत्र भेज न सका
पते की उहापोह में -
पता भी अज्ञात था,
शहर-गली अज्ञात थी -
सिर्फ नाम लिख दिया पत्र डाल दिया डाक में -
दूसरे ही दिन खड़ा था, देख कर अवाक मैं,
पत्र ले कर मेरे सामने खड़ा था डाकिया
मेरे अन्दर ही तो उसने, तुम्हें था जो पा लिया ||

शनिवार, 4 जुलाई 2009

सवा साल की नातिन ने दिया ज्ञान

मेरी सवा साल की नातिन हमेशा खुश रहती है. उसकी खुशी, खिलखिलाहट, चंचलता और शैतानियाँ मुझे भी खुश कर देती हैं. मैं सोचता हूँ - मेरी नातिन की खुशी का राज क्या है ? क्या मेरी नातिन को मेरी तरह कोई तनाव नहीं है ? - है. जब उसको किसी शैतानी करने से रोका जाता है तो वह खीझ जाती है. तब या तो वह उस शैतानी को भूल किसी दूसरी शैतानी मैं व्यस्त हो जाती है या जोर जोर से रो- चिल्ला कर अपना रोष व्यक्त करने लगती है. अर्थात उसने अपने तनाव दूर करने के रास्ते खोज रखे हैं - या तो भूल जाओ कि कोई तनाव पैदा करने वाला कारण भी है या अपना रोष खुल कर प्रकट कर दो.

मैं अपने से तुलना करता हूँ - मैं अपने सारे तनाव अपने पास ही रखता हूँ. किसी एक को भी भूल नहीं पाता और न ही उन तनावों के खिलाफ खुल कर अपना गुस्सा निकाल पाता हूँ. ज्ञानदत्त पाण्डेय जी द्वारा बताया गया नुस्खा मुझे रास नहीं आया. नातिन के खुश रहने का दूसरा कारण छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूंढ लेना है. जब डोर बेल बजती है, वह दरवाजे की ओर इशारा कर के और 'वो' शब्द का उच्चारण कर के बताती है- कोई आया है. दरवाजा खोलने पर जब उसके पापा खड़े मिलते हैं तो उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ जाती है. उनके हाथ से हेलमेट ले कर टेबल तक पहुंचाने और उसके बाद उनकी गोद में जाना भी उसकी खुशी का एक स्रोत है.उसको जब दो नन्हीं चूडियाँ पहनाई जाती हैं. वह खुश हो जाती है और हाथ नचा नचा के.'चूई' 'चूई' बोलती हुई अपनी चूड़ियाँ दिखाती है.

क्या मेरे पास नातिन की तरह खुश होने के छोटे छोटे कारण नहीं हैं ?- हैं. मुझे सब कुछ भूल कर खुश होना चाहिए जब मेरी बालकनी में चिड़िया आकर फुदकने लगती है, जब बारिश की बूँदें रिमझिम कर मुझे भिगोने लगती हैं, जब पत्नी के साथ बैठ कर सुकून से चाय की चुस्की ले रहा होता हूँ या परिवार के साथ बैठ कर भोजन कर रहा होता हूँ. लेकिन शायद उस समय भी मेरे मस्तिष्क में मायकल जैक्सन की मौत, रेल बजट या कार्यस्थल के तनावों को लेकर ऊहापोह चल रही होती है.

तो क्या मैं इस लिए खुश नहीं हो सकता क्योंकि मैं बच्चा नहीं बन सकता ? तभी मेरी नातिन अपनी शैतानियों के क्रम में मंदिर से श्रीमद्भग्वद्गीता का गुटका उठा कर ले आती है, मानो कह रही हो - नानाजी आपकी खुशियों का राज इसमें छुपा है.

रविवार, 24 मई 2009

कविता

कितना बेचैन था
मैं
मेरे बेटे
तेरे आने की प्रतीक्षा में.

तू आया
मगर मुर्दा.

मैं पहले रोया
औ़र फिर हँसा.

और तेरी माँ
नौ महीने की व्यर्थ साधना का फल पा कर
तड़फती रही
बिस्तर पर.

लेकिन मेरे बेटे
तेरी माँ
खुशनसीब है शायद
मेरी माँ की अपेक्षा.

क्योंकि मैं जिंदा हूँ
अब तक.

शनिवार, 16 मई 2009

कचड़ा दर्शन

आज सुबह के भ्रमण के दौरान मेरा चिंतन कचड़े के एक ढेर के पास जाग उठा.उस स्थान पर नगर नि़गम वालों ने एक ट्रोली रखी थी, जिसमें कचड़ा डाला जाना चाहिए. लेकिन अधिकांश कचड़ा ट्रोली के आसपास बिखरा था, जो हमारी नागरिक चेतना को उजागर कर रहा था. कचड़ा बीनने वाले दो लड़के उस ढेर से अपने मतलब का कचड़ा बीन रहे थे, जिसे बेच कर वे कुछ धन प्राप्त कर सकें.मेरा चिंतन बोल उठा- कचड़ा भी सापेक्ष होता है. जो एक के लिए कचड़ा है वही दूसरे के लिए मूल्यवान हो जाता है. साहित्यकार पत्रकार श्री राजेन्द्र यादव ब्लॉग लेखन को कचड़ा करार देते हैं, लेकिन हम जैसों को ब्लॉग में एक नहीं अनेकों सार्थक चीजें मिल जाती हैं.

सराफा बाजार में मैंने सफाई कर्मियों को घंटों नाली की सफाई करते देखा है. वे इस मनोयोग से अपनी ड्यूटी नहीं करते , बल्कि उस नाली में कुछ सोने के कण ढूंढ रहे होते हैं. भारतीय मतदाता इतना भाग्यशाली तो नहीं कि उसे कचड़े के ढेर में सोना मिल जाए. लेकिन उसने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया. उसे कचड़े का एक ढेर दिया गया था और कहा गया था कि इसमें जो थोड़ा बहुत काम का कचड़ा दिखे उसे छांट लो. सो उसने कर दिखाया. जय भारत.

रविवार, 10 मई 2009

कवि जो तार सप्तक में नहीं हैं

आज मुझे मेरे छोटे से पुस्तकों के संग्रह के बीच नन्हे कवि कुशाग्र. के नाना श्री भैरव दत्त जोशी, जो इस समय लगभग नब्बे वर्ष के हैं, का एक टंकित कविता संग्रह मिला. खड़ी बाजार, रानीखेत (उत्तराखंड) के निवासी श्री जोशी एक अच्छे चित्रकार भी रहे हैं और उन्हें कुछ पुरस्कार भी मिले हैं, जिनकी पूर्ण जानकारी मेरे पास उपलब्ध नहीं है. बहरहाल यहाँ मैं उनकी कविताओं की बात कर रहा हूँ. यह कविता संग्रह पढ़ कर मुझे लगा कि केवल तार सप्तक और पत्र पत्रिकाओं में छपने वाले, मंच पर कविता पाठ करने वाले और ब्लॉग लिखने वाले ही कवि नहीं होते. कवि और भी हैं जिनमें से एक श्री भैरव दत्त जोशी भी हैं. अफ़सोस यही है कि विभिन्न कारणों से ऐसे कवियों द्वारा रची गयी श्रेष्ठ रचनाओं से अधिकांश पाठक वंचित रह जाते हैं. प्रस्तुत है श्री जोशी की एक कविता जो उन्होंने १९८५ में लिखी थी.


सुबह ने होते ही पहले आकाश को संवारा
और सारा क्षितिज अनुराग से भर दिया.
पर्वतों की चोटियां रक्तिम स्वर्ण हो गयीं
किसी तप्त लालसा से नहीं,
प्यार की पहली लजीली मुस्कराहट से,
जो आशामय दिव्याभा की नवागता किरण थी |

सुबह के होते ही पक्षियों ने स्वागत गीत गाये,
पशुओं ने प्रसन्न नेत्रों से निहारा,
पत्थर सम्मान के लिए जगमगा उठे,
झाड़ियों, वृक्षों तथा अन्यत्र धरती में
हरीतिमा का उल्लास छा गया.
सुगंध बिखराते हुए फूल खिलखिला उठे
अधीर भौंरे तथा तितलियाँ
प्यार के मधुपान को निकल पड़े |

किन्तु इंसान ने, याने प्रबुद्ध मानव जाति ने
सुबह के होने को ललचाई निगाहों से देखा
और निकल पड़े कारोबार के नाम पर
एक दूसरे को ठगने के लिए
अथवा लाठी के बल पर भैंस लाने के लिए
या इस कारोबार शब्द का कोई अन्य अर्थ है
तो मैं नहीं जानता |

मैंने इतना अवश्य देखा
कि सारी लालिमा नष्ट हो गयी.
हरियाली मुरझा गयी.
वातावरण में एक चीखता शोर गूँज उठा
सर्वत्र प्रदूषण की विषाक्त घुटन छा गयी
और शान्ति,सौन्दर्य तथा अनुराग की
वह सुकोमल दिव्याभा,
जो अभी सुशोभित थी
सहसा जाने कहाँ खो गयी |.

बुधवार, 6 मई 2009

सुशासन उर्फ़ अंधेर नगरी चौपट राजा

चुनाव के मौसम में कुछ राजनैतिक दल सुशासन का नारा भी बुलंद करते आए हैं। सुशासन कैसा होता है , दुर्भाग्यवश यह हम आजादी के बाद से अब तक नहीं देख पाये हैं। कामना है कि आने वाली पीढी उसे देख पाये।


सुनते हैं लालूजी के पटना से पलायन के बाद बिहार में सुशासन की थोड़ी बहुत झलक दिखाई देती है। ये सूचना हमें समाचार पात्र और टी वी से मिली। हमने बिहार के सुशासन का अनुमान लगाया है। शायद अब वहाँ मुख्य मंत्री के रिश्तेदारों का दर्जा भगवानके बाद दूसरे से हट कर नीचे आ गया होगा। शायद पटना में अब रात को आठ बजे बाद भी सड़कों में निकलने की हिम्मत की जा सकती होगी।


ऐसे ही सुशासन की कुछ ख़बर हमने समाचार पत्रों में मध्य प्रदेश के बारे में पढी थी। विधान सभा चुनावों के बाद संचार माध्यमों ने हमें बताया था कि वहाँ मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के सुशासन ने भाजपा को दुबारा सत्ता दिलाई है। आजादी के बाद से ही सुशासन की राह ताकने को मजबूर हमने स्वयं सुशासन के दर्शन करने की ठानी और राजधानी भोपाल पंहुच गए। हमारा मानना है कि भोपाल में सर्वोत्तम दर्शनीय स्थल बड़ा तालाब है। इस तालाब को हम पहले देख चुके थे। इसकी विशालता और बरसात में उठती ऊंची ऊंची लहरों ने हमें समुद्र दर्शन का आनंद दिया था। सो सबसे पहले हमने तालाब देखने की ठानी।


तालाब दर्शन हेतु जाते हुए रास्ते में ही हमें वहाँ के सुशासन के दर्शन हो गए। सड़कें खुदी हुई थीं। पता चला कि पाइप लाइन बिछाने के लिए सड़कें खुदी हुई हैं।यह हाल पिछले २०-२५ दिनों से था। उन सड़कों में जो वाहन चला ले वह सर्कस के मौत के कुएं में वाहन चलाने का आनंद ले सकता था। वाहन के शाकाप , पिस्टन आदि की चिंता इंश्योरेंस वालों पर छोड़ते हुए हम एक चौराहे पर पहुँच गए। हमें लगा सुशासन इसी चौराहे पर है। क्योंकि वहाँ लाल हरी बत्तियां न केवल लगी हुई थीं अपितु काम भी कर रही थीं। यही नहीं वहाँ ट्रेफिक का एक सिपाही भी खडा था। उस चौराहे पर हम भोपाल वासियों के वाहन चलाने की योग्यता के कायल हो गए। बत्तियां क्रमानुसार जल बुझ रही थीं,क्योंकि उनका काम जलना बुझना था और यदि काम सुचारू रूप से हो रहा है तो सुशासन है। वाहन चालाक शायद रंगभेदी नीति के घोर विरोधी थे। वे बत्तियों के रंगों की तनिक भी चिंता न करते हुए ,एक दूसरे से होड़ करते हुए , आधा पौन इंच के फासले से कट मारते हुए वाहन दौड़ का अभ्यास करते प्रतीत होते थे.हमें लगा यदि ओलम्पिक में वाहन दौड़ प्रतियोगिता होती हो तो अभिनव बिंद्रा के बाद कोई भोपाल वासी अपने दम पर देश के लिए स्वर्ण पदक ला सकता है। ट्रेफिक का सिपाही आसपास के घटना क्रम से निर्लिप्त रहते हुए राम राज्य और सुशासन दोनों की ही गवाही दे रहा था। राम राज्य में प्रजा सुखी रहती है और सिपाही ट्रेफिक नियमों की धज्जियाँ उडाने वाली प्रजा की अनदेखी करके उन्हें सुखी बना रहा था। साथ ही ड्यूटी टाइम में ड्यूटी पर मौजूद रहते हुए सुशासन के दर्शन करा रहा था।


हमारे मेजबान ने हमें एक तालाबनुमा पोखर के सामने ले जाते हुए कहा - यह रहा बड़ा तालाब। हमने उन्हें किसी मनोचिकित्सक से मिलने की सलाह देते हुए कहा- भाई इन छोटे तालाबों को देखने की हमें कोई चाह नहीं है, हमें बड़ा तालाब ले चलो। जवाब में उन्होंने हमें नेत्र चिकित्सक से मिलने की सलाह देते हुए आश्वस्त किया कि यही भोपाल की शान बड़ा तालाब है। तालाब की दुर्दशा देख हमें ऐसा धक्का लगा कि हम मेजबान से ह्रदय रोग चिकित्सक का पता पूछने लगे। हमें लगा शायद सुशासन इसी तालाब में समा गया है।


मध्य प्रदेश में स्थानीय शासन द्वारा पानी सप्लाय की भी दयनीय स्थिति है। राजधानी भोपाल में एक दिन छोड़ पानी आता है। अन्य स्थानो,जिनमें क्षिप्रा नदी के किनारे बसा उज्जैन भी शामिल है, में और भी बुरी हालत है। कहीं पुलिस के पहरे में पानी का वितरण होता है तो कहीं पानी के टैंकर को लूटने की घटना सामने आती है। हमने जगह जगह सरे आम मोटर द्वारा सप्लाय लाइन से पानी की चोरी होते हुए देखा, लेकिन सुशासन इसे शायद इस लिए नहीं देख पाता क्योंकि पानी की सप्लाय सुबह होती है और काम के बोझ का मारा सुशासन तब तक जग नहीं पाता होगा।


हमें लगा कि सुशासन को लाने में मतदाता सहयोग नहीं दे रहे हैं। मतदाता यदि अटलजी को भारत को कुछ दिन और चमकाने देते तो अटल जी भारत की नदियों को जोड़ करे सुशासन ले आते और मध्य प्रदेशवासियों को पानी मिल जाया करता। हम समझ गए कि मतदाता ही सुशासन की राह के रोडे हैं।


मध्य प्रदेश ऊर्जा की बचत के मामले में भी सुशासित लगा। वहाँ घंटों बिजली गुल रहती है और इस प्रकार ऊर्जा बचत हेतु अन्य प्रदेशों के लिए एक प्रेरणाश्रोत बन गया है। वहाँ की बिजली बोर्ड ने बिजली चोरी रोकने का एक अनूठा सिद्धांत निकाला है, जिसे सुन बोर्ड के अधिकारियों की प्रतिभा और सुशासन लाने के उनके प्रयासों ने हमें चौंका दिया। शायद सुन के आप भी कम हैरान नहीं होंगे। वे लोग उन लोगों के प्रति कोई कार्रवाई नहीं करते जो बिजली चोरी करते हैं। वे उन क्षेत्रों की बिजली में कटौती करते हैं जिन क्षेत्रों में बिजली चोरी होती है। खुले आम में लाइन में तार डाल बिजली चोरी करने वालों को रोकना वे झंझट का काम समझते हैं, क्योंकि ऐसे लोगों की दादागिरी से पंगा लेने की अपेक्षा ईमानदारी से बिजली का बिल भरने वालों की बिजली काट देना आसान होता है।


सड़क, बिजली,पानी के सुशासन को देख हम उबरे ही थे कि समाचार पत्र पर नजर पडी - चार माह में ७२ लूट! यह आंकडा भोपाल शहर काम था। पता चला अधिकाँश शिकार लाडली लक्ष्मियाँ ( महिलाएं ) थीं। हमने कहा- आख़िर महिलाएं चेन पहन, हेंड बैग लटका, मोबाईल हाथ में ले दूर दूर जाती क्यों हैं ? क्या जब तालिबान आयेंगे तभी इन पर लगाम लगेगी ? अफ़सोस ! हमें बताया गया- बहुत सारी घटनाएं दूध लेने जाते हुए या कुत्ते को घुमाते हुए घर के आसपास ही हुई थीं और घटनाओं को अंजाम देने वाले अन्य शहरों से आए हुए इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले छात्र हैं। हम तुंरत माजरा समझ गये। लोग अपनी औकात जाने बिना लड़कों को इंजीनियरिंग की पढाई के लिए भेज देते है। उनकी फीस, किताबें, रहना,खाना और थोडा बहुत जेब खर्च की व्यवस्था तो वे जैसे जैसे जैसे जैसे तैसे करते हैं लेकिन मंहगे मोबाईल ,bike का फालतू पेट्रोल, शराब - सिगरेट का खर्च भेजने में उनकी नानी याद आ जाती है। युवा भावी इंजिनियर भी अपने माँ बाप की आर्थिक स्थिति का आकलन कर उन पर बोझ न बनते हुए विदेशों की तर्ज पर स्वावलंबी बनने का प्रयास करते दिखाई देते है।


हम निराश हो गए। हम जिस सुशासन के दर्शन करने आए थे वह हमें यहाँ भी नहीं मिला। तभी किसी ने कहा- chintaa मत करो , १६ मई को sushaasan आने वाला है। क्या वाकई ?































































रविवार, 26 अप्रैल 2009

इस सादगी को नमन

डॉ.श्रीमती अजित गुप्ता के ब्लॉग . पर मैं एक लघुकथा ' आदत ' पढ़ रहा था जिसमें उनका घरेलू नौकर,जो जनजातीय समाज का है, आग्रह करने पर भी उनके घर में दिन में खाना नहीं खाता और उत्तर देता है - हम लोग दो समय ही खाना खाते हैं, एक सुबह और एक शाम। सुबह मैं खाना खाकर आता हूँ और शाम को जाकर खाऊँगा। यदि दिन में आपके यहाँ खाना खाने लगा तो मेरी आदत बिगड़ जाएगी।

आज की इस जोड़ तोड़ और छल फरेब वाली दुनिया में भोले और निश्छल लोग भी हैं- यह तथ्य मन को सकून देता है. डॉ. श्रीमती गुप्ता ने इसे लघुकथा के अंतर्गत दिया है, अतः यह एक काल्पनिक कथा भी हो सकती है. मैं यहाँ एक सत्य घटना दे रहा हूँ जो जनजातीय समाज के भोलेपन का नमूना प्रर्दशित करती है और निश्छलता और ईमानदारी के प्रति आस्था जगाती है . घटना इस प्रकार है -

घटना सन ९२ - ९३ की है। मेरे भांजे की शादी कोंडागांव (बस्तर - छत्तीसगढ़) में संपन्न हुई। रिसेप्शन में कुछ आदिवासी मजदूरों को भोजन व्यवस्था में मदद हेतु काम पर बुलाया गया था. यह तय हुआ था कि लगभग रात साढ़े दस बजे आयोजन समाप्त हो जायेगा. तय कार्यक्रम के अनुसार साढ़े दस बजे तक आयोजन समाप्त न होने पर वे लोग शिकायत करने लगे. हमारे समझाने पर उन्होंने अपने डेरे तक रात में पंहुचने की दिक्कत बताई. हमने उन्हें जीप से पहुंचाने का वादा किया. समस्या के इस समाधान से वे संतुष्ट हो गए. लेकिन दूसरी जो समस्या उन्होंने बताई उससे हम आश्चर्यचकित हो गए. उन्होंने बोला कि घर जाकर उन्हें अपने लिए खाना भी बनाना है.हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे दावत के इस आयोजन में बिना खाना खाए चले जायेंगे, जबकि वे मान कर चल रहे थे कि उन्होंने खाना तो घर जाकर ही खाना है. यह उनके सीधेपन का नमूना था. खैर उन्हें समझाया गया कि वे सब यहीं खाना खायेंगे और यदि कोई घर में अन्य भी हो तो उसके लिए ले के जायेंगे। इस प्रस्ताव पर वे बड़े संकोच से राजी हुए।



आगे इससे भी बड़े आश्चर्य की बारी थी। जब काम समाप्त होने पर उन्हें भुगतान किया गया तो सोचा गया कि इन्हें पहले से तय राशि से पाँच पाँच रूपये ज्यादा दे दिए जाएँ। यह प्रस्ताव उन्हें बहुत नागवार गुजरा और वे मानने लगे कि उनके साथ बेईमानी हो रही है। जब वे किसी तरह नहीं माने तो उन्हें पहले तय राशि के हिसाब से भुगतान किया। उसके बाद पाँच पाँच रूपये अलग से दे कर समझाया गया कि अच्छे काम के लिए उन्हें ईनाम दिया जा रहा है। इसे भी उन्होंने ससंकोच ग्रहण किया अब इसे आप उनकी बेवकूफी कह लीजिये या भोलापन, मैं तो उनकी सादगी और सच्चाई से प्रभावित हुए बिना न रह सका वह घटना मुझे डॉ.अजित गुप्ता की लघुकथा पढ़ते हुए अचानक याद आ गयी और आपके सामने प्रस्तुत कर दी

रविवार, 19 अप्रैल 2009

ब्लोगर अपना अधिकतम परिचय उजागर करें ( ? )

अपनी पिछली पोस्ट में मैंने ब्लोगर को पात्र बना कर एक लघुकथा दे दी थी. उस पर दो आदरणीय, वरिष्ठ ब्लोगर्स की परस्पर विपरीत टिप्पणियाँ आई हैं, जिससे मेरे मन में भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी है.इस पोस्ट के माध्यम से मैं चाहूंगा कि उचित अनुचित के निर्णय हेतु आप सब का मार्ग दर्शन मिले.
उस लघुकथा के माध्यम से मैं केवल यह दर्शाना चाहता था कि दो ब्लोगर जो ब्लॉग के माध्यम से एक दूसरे से भली भांति परिचित हों, वास्तविक जीवन में सहसा आमना सामना होने पर एक दूसरे को पहचानने से वंचित भी रह सकते हैं.
उस पोस्ट पर 'मानसिक हलचल' के वरिष्ठ ब्लोगर आदरणीय श्री ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की यह टिप्पणि आई –
मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं। आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है। पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।


आदरणीय ज्ञान दत्त पाण्डेय जी वरिष्ठ ब्लोगर हैं और समय समय पर अपनी सारगर्भित टिप्पणियों से मेरा उत्साह वर्धन करते रहते हैं.मैं उनकी टिपण्णी में कही गयी बात को नज़रंदाज़ नहीं कर सकता.


उधर घुघूती बासूती जी भी एक वरिष्ठ और आदरणीया ब्लोगर हैं.मूलतः मेरे क्षेत्र (कूर्मांचल) की होने के कारण मैं उनसे एक अलग तरह की आत्मीयता महसूस करता हूँ,जिसे इस पोस्ट को पढने वाले कूर्मांचली समझ सकते हैं. मैं ब्लॉग जगत में प्रवेश करने के पहले भी उनकी पोस्ट पढता रहा हूँ. मुझे उनकी बात को नकारने का भी साहस नहीं हो रहा है. आदरणीया घुघूती बासूती जी की टिप्पणि इस प्रकार थी-

सब के अपने अपने विचार हैं। छद्मनाम से मैं भी लिखती हूँ, अब जैसा बन पड़ता है लिखती हूँ। मुझे नहीं लगता कि यदि मैं अपना नाम पता देने लगूँ तो अचानक मेरा लेखन सुधर जाएगा।


ब्लोगर बन्धु भाई रजनीश परिहार ने भी छद्म नाम से लेखन को उचित नहीं ठहराया है.

इन तीनों टिप्पणियों से यह दुविधा उजागर हुई है कि ब्लोगर को अपने बारे में अधिक से अधिक तथ्य अपने परिचय में उजागर करने चाहिए या यह जरूरी नहीं है. यह भी विचारणीय है कि अधिकतम या न्यूनतम की सीमा क्या होनी चाहिए.

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

लघु कथा

ब्लोगर की व्यथा

धूप कुमार जी एक ब्लोगर हैं. उनकी पोस्टों पर प्राप्त टिप्पणियों में नजर डालिए तो टिप्पणिकारों में साया जी का नाम अवश्य मिलेगा और टिप्पणियाँ भी प्रायः लम्बी चौड़ी होती हैं. साया जी धूप कुमार जी के समर्थकों की सूची में भी हैं. यह भी कहा जा सकता है कि साया जी धूपकुमार जी के फैन हैं.
एक बार धूपकुमार जी रेल से यात्रा कर रहे थे. वहां उनका एक सहयात्री से विवाद हो गया और विवाद ने तूल पकड़ लिया, यहाँ तक कि सहयात्री हाथा पाई पर उतरने की तैयारी करने लगा. किसी तरह मामला शांत हो गया लेकिन धूप कुमार जी बहुत व्यथित थे. यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने अपने इस कडुवे अनुभव को अपने ब्लॉग में ,सहयात्री की तगड़ी खिंचाई करते हुए , लिख डाला. पहली टिप्पणि साया जी की आयी -
दुनियाँ में ऐसे लोग भी होते हैं. इनकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है.

साया जी तो सारा माजरा धूप कुमार जी की पोस्ट पढ़ कर समझ चुके थे.लेकिन धूप कुमार जी कभी नहीं जान पाए कि वह सहयात्री साया जी ही थे.

रविवार, 12 अप्रैल 2009

कृति ( बेटी )

श्रीमती अनिता तिवारी सरस्वती विद्यामंदिर भोपाल में शिक्षिका हैं। उनके प्रथम काव्य संग्रह ''अनुभूति'' में प्रकाशित यह रचना किसी भी रचनाकार की कृति हो सकती है, आपकी भी –

जैसे
अप्सरा आसमाँ से उतरती हुई
अविरल
भागीरथी बहती हुई
जैसे
निशा में
कौमुदी दमकती हुई
ठीक वैसी ही दिखती
हमारी कृति

मन को छूती
भावशून्यता को हरती
चेतना को झकझोरती
सद्विचारों को बोती
हमारी कृति

शब्दों में ढली
भावों में पली
जीवन की यह संलग्ना सी
भानु की प्रस्फुटित रश्मियों की तरह
तिमिर को हरती
हमारी कृति

मेरी कल्पना
मेरा प्यार
मेरे शब्द
मेरे उद्गार
चमकती निहारिका सी
मेरे जीवन से बंधी
हमारी कृति

मेरी संकल्पना की
यह प्रति
सागर में उमड़ती
लहरों सी
मेरे जीवन की यह साधना
मन-मानस में बसती
हमारी कृति

मंदिर में सजी
मूर्तियों की तरह
दिखती है
कई प्रतियों की तरह
ज्योतित होती
ज्योतियों की तरह
मन को हरषाती
हमारी कृति

जाने मुझको
इससे है कितनी आस
यह
मेरी परछाई
मेरा विश्वास
मेरी आकृति दिखलाती
एक कलाकृति सी लगती
हमारी कृति

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

आपको मालूम नहीं ? आपके ब्लॉग की चर्चा समाचार पत्र में हुई है.

१७ मार्च की सुबह मेरे पास हल्द्वानी ( उत्तराखंड) से फ़ोन आया आपकी पोस्ट
भिटौली .
आज के अमर उजाला में प्रकाशित हुई है. फिर दिन में देहरादून से भी इसी आशय का फ़ोन आया. मेरी बेटी ने, निकट भविष्य में मुरादाबाद से लौटने वाले एक परिचित को, उस पोस्ट की कटिंग लाने हेतु फ़ोन किया. कुछ ही दिनों में वह कटिंग मेरे पास आ गयी.
वह 'ब्लॉग कोना' स्तम्भ की कटिंग थी. उस स्तम्भ में दो अलग अलग ब्लोगों से एक एक पोस्ट ली गयी थी. एक पोस्ट साइंस ब्लॉग से 'तकनीक ने बदली महिलाओं की जिन्दगी' थी. दूसरी पोस्ट
मेरी थी.


इससे पहले मैंने विनीता यशस्वी जी की एक
पोस्ट पढी थी,जिसमें उन्होंने बताया था की दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिन्दुस्तान में उनके ब्लॉग की चर्चा हुई है, जिसकी जानकारी उन्हें एक फोन से मिली. संगीता पुरी जी को भी उनकी
पोस्ट . के भोपाल से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में प्रकाशन की जानकारी किसी के फ़ोन से मिली.

इस प्रकार अनेक ब्लोगरों को उनके ब्लॉग या पोस्ट की समाचार पत्रों में हुई चर्चा का पता उनके मित्रों द्वारा लगता है. यह भी सम्भव है कि किसी ब्लॉग की चर्चा किसी पत्र में हो और उस ब्लोगर को इसका भान भी न हो.

एक ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि जहां एक ओर कुछ साहित्यकार और पत्रकार ब्लॉग विधा की आलोचना करते हैं वहीं समाचार पत्र और पत्रिकाएँ इनका नोटिस भी ले रही हैं. एक पत्रिका के सम्पादक ने कहा कि ब्लॉग लेखन का एक फायदा जरूर है कि अब लेखक अपनी कचड़ा रचनाएँ हमारे पास भेज कर हमारा समय बर्बाद न करते हुए स्वयं अपने ब्लॉग पर डाल लेते हैं. वहीं किसी ने ब्लॉग लेखन को
सम्पादक के नाम पत्र बताया है.
बहरहाल ब्लॉग लेखक को तन्मयता से अपना काम करते रहना चाहिए.यदि उसके लेखन में कुछ भी सार्थक होगा तो स्वतः ही सामने आयेगा.

रविवार, 15 मार्च 2009

'भिटौली'- घुघूती की टेर

कूर्मांचल में चैत्र का महीना विवाहिता और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष महत्त्व का है. चैत्र माह की संक्रांति को 'फूल देई' का त्यौहार मनाया जाता है. (कूर्मांचल में सौर माह प्रचलित है , जो हर माह की संक्रांति से प्रारंभ होता है.)इस दिन कन्याएं फूल,चावल और गुड़ ले कर मोहल्ले या गाँव के प्रत्येक घर जा कर उनकी देहरी( प्रवेश द्वार) पूजती हैं. और बदले में पैसे और उपहार प्राप्त करती हैं.कन्याओं द्वारा देहरी पूजा जाना शुभ माना जाता है. अनेक लोग अपनी विवाहिता बेटियों से सदैव मायके से विदा होते समय देहरी पुजवाते हैं.

मैं यहाँ चैत्र में विवाहिताओं को दी जाने वाली 'भिटौली' का वर्णन करना चाहता हूँ.'भिटौली' एक ऐसा पर्व है जिसका कूर्मांचल की हर विवाहिता को बेसब्री से इन्तजार रहता है. यह माह अपने मायके वालों से मिलने का माह है. परम्परानुसार भाई अपनी बहन के लिए वस्त्र,पकवान और अन्य उपहार ,जिसे भिटौली कहते हैं, लेकर उसके गाँव जाता है. पुराने समय में जब आवागमन के साधनों का अभाव था(पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी आवागमन उतना सुविधाजनक नहीं है ) चैत्र माह विवाहिता के लिए भाई से मिलने की गारेंटी होता था. आज के समय में मिलने जुलने के अन्य मौके उपलब्ध हो गए हैं और भाई बहन केवल पहाड़ी क्षेत्रों में ही नहीं देश-विदेश में निवास कर रहे हैं इस लिए सांकेतिक रूप से भाई बहनों को धन भेज दिया करते हैं.इस माह में घुघूती नाम की एक चिड़िया कूर्मांचल में देखी जाती है, जिसके चहकने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उससे ऐसा लगता है मानो कह रही हो-
भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती
(भाई भूखा रहा, मैं सोती रही।)
इस सम्बन्ध में एक दंत कथा (लोक कथा) प्रचलित है :एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे | उनमें बहुत प्यार था | १५ वर्ष की उम्र में देबुली की शादी हुई ( जो उस समय के अनुसार बहुत बड़ी उम्र थी ) |शादी के बाद भी दोनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा | दोनों ही भिटौली के त्यौहार की प्रतीक्षा करने लगे | अंततः समय आने पर नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर खुशी - खुशी बहन से मिलने चला | बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी | पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया | देबुली तब गहरी नींद में सोई थी | थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया | सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी | देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी | अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा | शनिवार को देबुली के घर जाने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था | नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस अपने गाँव चला गया |देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी | नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं |वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी | लेकिन भाई नहीं मिला | वह पूरी बात समझ गयी |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये | कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' बन गयी और चैत के महीने में आज भी गाती है :

भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

साहित्यकारों के उपनाम

साहित्यकारों और पत्रकारों द्वारा छद्म नाम या उपनाम से लेखन करना आम बात है. ब्लॉग जगत में भी बहुत से बन्धु छद्म नाम या उपनाम से लेखन कर रहे हैं .बालीवुड के अनेक सितारे भी अपने छद्म नाम से जाने जाते हैं.
विगत दिनों मैं महेश प्रकाश पुरोहित के ब्लॉग पर कन्हैया लाल नंदन की एक कविता पढ़ रहा था तो मुझे ध्यान आया कि उनका वास्तविक नाम कन्हैया लाल तिवारी है. इसी सन्दर्भ से यह भी लगा कि कुछ प्रमुख साहित्यकारों के उपनाम या छद्मनाम,जो मुझे ज्ञात हैं, ब्लोगर बंधुओं के बीच साझा किये जाएँ. इसी हेतु ,इस आशा के साथ कि इस सम्बन्ध में अन्य बन्धु भी ज्ञान वर्धन करवायेंगे यह प्रयास है -

वास्तविक नाम/ उपनाम

जय शंकर साहू/ प्रसाद

सूर्य कान्त त्रिपाठी/ निराला

गुसाईं दत्त पन्त/ सुमित्रानंदन पन्त

धनपत राय/ प्रेमचंद

रामधारी सिंह/ दिनकर

मुन्नन द्विवेदी/ शांतिप्रिय द्विवेदी

हरिप्रसाद द्विदेदी/ वियोगी हरि

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन/ अज्ञेय

वैद्यनाथ मिश्र/ नागार्जुन

हरिवंश राय/ बच्चन

रघुपति सहाय/ फिराक गोरखपुरी

धर्मवीर सक्सेना/ भारती

शिवमंगल सिंह/ सुमन

मदन मोहन गुगलानी/ मोहन राकेश

उपेन्द्रनाथ शर्मा/ अश्क

फणीश्वरनाथ/ रेणु

कैलाश सक्सेना/ कमलेश्वर

महेंद्र कुमारी/ मन्नू भंडारी

सरोजिनी मलिक/ सरोजिनी प्रीतम

गोपाल दास सक्सेना/ नीरज

रामरिख बंसल/ मनहर

श्रीराम वर्मा/ अमरकांत

गौरा पन्त/ शिवानी

रमेश चन्द्र मटियानी/ शैलेश मटियानी

सुदामा पांडे/ धूमिल

काशीनाथ उपाध्याय/ बेधड़क बनारसी

कृष्ण देव प्रसाद गौड़/ बेढब बनारसी

चन्द्र भूषण त्रिवेदी/ रमई काका

प्रभु लाल गर्ग/ काका हाथरसी

बालस्वरूप भटनागर/ राही

गंगा प्रसाद उनियाल/ विमल

रामेश्वर शुक्ल/ अंचल

उषा सक्सेना/ प्रियंवदा

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

खड़ी बोली कविता के जनक भारतेंदु नहीं, लोकरत्न पन्त 'गुमानी' थे

इस पोस्ट के माध्यम से मैं हिन्दी साहित्य के इतिहास में रुचि रखने वालों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँयह सर्वमान्य तथ्य माना जाता है कि खड़ी बोली में साहित्य रचना सर्व प्रथम भारतेंदु हरिश्चंद्र ने की थी भारतेंदु का जन्म १८५० में और मृत्यु ३५ वर्ष की अल्पायु में १८८५ में हुई थी। १८६८ में उन्होंने' कवि वचन सुधा' का प्रकाशन प्रारंभ किया। १८७३ में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' प्रारंभ हुई। १८७३ में ही' वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति प्रकाशित हुई। सम्भवतः' कृष्ण चरित्र' (१८८३) उनका अन्तिम ग्रन्थ थाइस प्रकार खड़ी बोली में सतत लेखन कर उन्होंने हन्दी साहित्य के अंकुर को प्रस्फुटित होने का अवसर दिया और भविष्य के लिए मार्ग दर्शन किया । हिन्दी साहित्य में उनका योगदान अमूल्य है


अत्यन्त विनम्रता से मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि भरतेंदु को खड़ी बोली में साहित्य रचना का प्रवर्तक नहीं कहा जाना चाहिए। क्योंकि उनसे पहले कूर्मांचल के कवि ' गुमानी' खड़ी बोली में रचनाएँ कर चुके थे।



कवि 'गुमानी' का नाम पंडित लोकरत्न पन्त था। उनका जन्म १७९० में उत्तराखंड के उपराड़ा गाँव

में हुआ था और मृत्यु ५६ वर्ष की अवस्था में १८४६ में हुई। भारतेंदु के जन्म से चार वर्ष पूर्व ही वे निर्वाण को प्राप्त हो चुके थे.उन्होंने हिन्दी, कुमाऊनी, नेपाली और संस्कृत में रचनाएँ की थीं। उनकी कुछ चतुष्पदियों में पहला पद हिन्दी में, दूसरा कुमाऊनी, तीसरा नेपाली और चौथा संस्कृत में होता था। चूंकि यह लेख हिन्दी से सम्बंधित है, मैं यहाँ उनकी कुछ हिन्दी रचनाएं प्रस्तुत कर रहा हूँ -


दूर विलायत जल का रास्ता करा जहाज सवारी है


सारे हिन्दुस्तान भरे की धरती वश कर डारी है


और बड़े शाहों में सबमें धाक बड़ी कुछ भारी है


कहे गुमानी धन्य फिरंगी तेरी किस्मत न्यारी है


****************************************


हटो फिरंगी हटो यहाँ से छोडो भारत की ममता


संभव क्या यह हो सकता है होगी हम तुममें समता?


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विद्या की जो बढती होती, फूट ना होती राजन में।


हिन्दुस्तान असंभव होता, वश करना लख वर्षन में।


कहे गुमानी अंग्रेजन से, कर लो चाहे जो मन में।


धरती में नहिं वीर-वीरता तुम्हें दिखाता रण में।

गुमानी जी उत्तराखंड के अल्मोड़ा शहर में रहे थे। उस शहर का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है -

खासे कपड़े सोने के तो बने बनाये तोड़े लो

पश्मीने गजगाह चंवर वो भोट देश के घोडे लो

बड़े पान के बीड़े खासे बढ़के शाल दुशाले लो

कहै गुमानी नगदी है तो सभी चीज अल्मोड़े लो

उत्तराखंड के ही काशीपुर शहर में भी उन्होंने कुछ समय बिताया था. वे मजाकिया लहजे में काशीपुर और काशी की तुलना इस प्रकार करते हैं -

यहाँ ढेला नद्दी, उत बहत गंगा निकट में

यहाँ भोला मोटेश्वर,रहत विश्वेश्वर वहाँ

यहाँ सन्डे डंडे कर धर फिरें, सांड उत हैं

फर्क क्या है काशीपुर नगर काशी नगर में

इस तरह हम देखते हैं कि भारतेंदु के जन्म से चार वर्ष पूर्व स्वर्गवासी गुमानी जी ने खड़ी बोली में जम कर कविताई की. इस लिए गुमानी जी को ही खड़ी बोली कविता का जनक माना जाना चाहिए.















शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

दिल की बात

हिन्दी गद्य लेखन के शुरूआती दौर के लेखकों में एक महत्वपूर्ण नाम बाल कृष्ण भट्ट का है. भट्ट जी ने प्रेम की व्याख्या इन शब्दों में की है. -
"भक्ति,आदर,ममता,आनंद,वैराग्य,करुणा आदि जो भाव प्रतिक्षण मनुष्य के चित्त में उठा करते हैं,उन सबों के मूल तत्व को एक में मिला कर उसका इत्र निकाला जाय, तो उसे हम 'प्रेम' इस पवित्र नाम से पुकार सकेंगे"

प्रेम ही वेलेंटाइन डे का प्रमुख तत्व है. और प्रेम दिल से किया जाता है. इस लिए इस मौसम में 'दिल' की बात करना गैरमुनासिब न होगा.
वेलेंटाइन डे मनाने वाले दिल तो पहले ही ले दे चुके होते हैं.आज तो वे केवल याद दिलाते हैं कि हमारा दिल तुम्हारे पास और तुम्हारा दिल हमारे पास है.लेकिन वे जानते भी हैं या नहीं कि दिल होता क्या है. यदि नहीं तो जानिए-
बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक कतरा -ऐ- खूँ निकला

यदि हम वेलेंटाइन डे के माहौल में इन प्रेम करने वालों को कुछ नसीहत देना चाहें तो डर है कि लोग हमें बजरंगी न समझने लगें. फ़िर भी इनके भले के लिए शायर 'जौक' के शब्दों में इन्हें बता दें -
दिल को रफीक इश्क में अपना न समझ 'जौक'
टल जायेगा ये अपनी बला तुझ पै टाल के.

नसीहतों पर प्रेम के दीवानों ने कभी ध्यान नहीं दिया, लेकिन नसीहत देने वाले भी पीछे नहीं रहते. जफ़र साहेब की नसीहत की बानगी -
बाजारे मुहब्बत में न दिल बेच तू अपना
बिक जाता है साथ उसके जफ़र बेचने वाला.

बेचारे प्रेम दीवाने इन नसीहतों पर अमल नहीं कर पाते तो उनका दोष भी नहीं. वे बेचारे तो दिल से मजबूर हैं-
दिल की मजबूरी भी क्या शै है, कि दर से अपने
उसने सौ बार उठाया , तो मैं सौ बार आया.

उनका इस तरह सौ बार आने जाने के पीछे भी एक राज है. वे मानते हैं कि -
नज़र की राह से दिल में उतर के चल देना
ये रास्ता बहुत अच्छा है आने जाने का
.

अब इनको कौन समझाए कि बार बार बे आबरू हो कर भी , हो सकता है वे सामने वाले के दिल की थाह न ले पाये हों. लेकिन इन खूबसूरत चेहरों की हकीकत जफ़र साहेब ने तो जान ली –
गुल से नाजुक बदन उसका है लेकिन दोस्तो
ये गजब क्या है कि दिल पहलू में पत्थर सा बना

जफ़र साहेब भले ही अपने तजुर्बे से बरखुदारों को आगाह करते रहें , लेकिन इश्क के मारों का हाल तो आसी साहेब जानते हैं -
हमने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं
तुमने देखा एक नज़र और दिल तुम्हारा हो गया .

दिल तो मियाँ गालिब ने भी किसी को दिया. लेकिन वे कहना नहीं भूले -
दिल आपका, कि दिल में जो कुछ है आपका
दिल लीजिये, मगर मेरे अरमाँ निकाल के

ऐ मजनुओ ! इतने सारे ताजुर्बेकारों की बात न मानते हुए भी तुम इश्क के फेर में पड़े हो.लेकिन याद रखना और मानसिक रूप से तैयार रहना क्योंकि ऐसाभी होता है-
जो दिल में खुशी बन कर आए, वह दर्द बसा कर चले गए
जो शमा जलाने आए थे, वह शमा बुझा कर चले गए.

पक्के मजनू तो ऐसे शमा बुझा के जाने वालों से भी नाराज नहीं होते और दिल पर लगी चोट को सहते हुए अमजद हैदराबादी के शब्दों में कह उठते हैं -
दिल शाद नहीं तो नाशाद सही
लब पर नग्मा नहीं तो फरियाद सही
हमसे दामन छुड़ा कर जाने वाले
जा, जा, गर तू नहीं, तेरी याद सही.

यूँ यादों के सहारे जीने वाले शायद बड़ी तादाद में हैं.लेकिन इन यादों के सहारे जीने में भी.कितनी तकलीफ है,जफ़र साहेब बता रहे हैं -
इक हूक सी दिल में उठती है, इक दर्द सा दिल में होता है
हम रात को उठ कर रोते हैं जब सारा आलम सोता है.

यादों के सहारे जीना इतना आसान नहीं है. जब दिल उदास हो तो फ़िर कुछ भी अच्छा नहीं लगता -
दुनिया की महफिलों से घबडा गया हूँ यारब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का, जब दिल ही बुझ गया हो.

ऐसे ही असफल प्रेम के मारे कुछ दीवाने सोचने लगते हैं -
चहक है, महक है, रौनक है, नजारे सब कुछ
दिल में है दर्द तो बहारों से हमें क्या करना

इन्हीं गमों से घबरा कर मियां ग़ालिब गम सहने के लिए कई दिलों की तमन्ना कर उठे -
मेरी किस्मत में गम गर इतने थे
दिल भी यारब कई दिए होते.
ठीक ऐसी ही बात आबिद साहेब ने भी कही है -
गम दिए थे अगर मुहब्बत के
मुझको इक और दिल दिया होता.

गम सहने के लिए दिल चाहे जितने भी दिए हों,रातों की नींद तो हराम हो ही जाती है -
दिन भी गुजारना है, तड़प कर इसी तरह
सो जा दिले हजीं, कि बहुत रात हो गयी.

बहादुर शाह 'जफ़र' के दिल पर लगी चोट का मुलाहिजा फरमाइए -
मेरी आँख झपकी थी एक पल, कहा जी ने मुझसे कि उठ के चल
दिल-ऐ-बेकरार ने आन कर, मुझे चुटकी दे के जगा दिया.
न तो ताब है दिले जार में, न करार है गमे यार में
मुझे सोजे - इश्क ने आखिरश , यूँ ही मिस्ले शामअ घुला दिया
* * * * * * * * * * * * * * * * * * *
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलमे- नापाएदार में

दिल पर लगी यह चोट कभी कभी इतनी गहरी होती है कि आदमी जिन्दगी से ही बेजार हो जाता है -
अभी जिंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ यह दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने
-साहिर लुधियानवी

इनसे एक कदम बढ़ कर -
है जनाजा इस लिए भारी मेरा
हसरतें दिल की लिए जाते हैं हम
-गोया

लेकिन दिल केवल देने - लेने या इश्क करने के लिए ही नहीं वरन दूसरों के दुःख - दर्द महसूस करने के लिए भी होता है -
गैर के गम पै भी इस दिल पर असर होता है
कोई रोता है तो दामाँ मेरा तर होता है
- जिगर मुरादाबादी

अंत में वेलेंटाइन डे के दीवाने नौजवानों से, वेलन्टाइन डे से कतई अनभिज्ञ उन नौजवानों के दिल की तमन्ना का जिक्र कर दूँ जिन्हें आज भी देश सलाम करता है -
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैदेखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है.

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

आगामी चुनाव हेतु मेरी भविष्यवाणी

लोक सभा चुनाव सन्निकट हैं. मई माह में नयी लोकसभा का गठन हो जायेगा.कौन जीतेगा कौन हारेगा इस की भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता. हाँ एक भविष्यवाणी मैं अवश्य कर सकता हूँ, वह है चुनाव विश्लेषक और स्तम्भ लेखकों के सम्बन्ध में. वे लोग हमेशा की तरह अवश्य अलापेंगे कि मतदाता परिपक्व हो चुका है. अब मतदाता को बरगलाया नहीं जा सकता. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की वाहवाही की जायेगी.

हमारे बुद्धिजीवियों के इस आलाप पर मुझे ऐतराज है. आज भी मतदाता व्यक्ति की योग्यता के बजाय जाति, सम्प्रदाय, व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर,नोट के बदले या डर कर वोट देता है. यदि ऐसा न होता तो राजनीतिक दल इन्हीं आधारों पर टिकट न बांटते. यदि ऐसा न होता तो मन मोहन सिंह चुनाव न हारते. यदि ऐसा न होता तो चुनाव के लिए ऐसे मुद्दों को न तलाशा जाता जो मतदाताओं को लुभा सकें. और यदि मतदाता लुभावे में आ जाता है तो वह परिपक्व कैसा ?

ठीक इसी तरह मुझे इस बात पर भी ऐतराज है कि दुनिया के सबसे बड़े इस लोकतंत्र को भी परिपक्व बताया जाता है. मैं समझता हूँ कि परिपक्व लोकतंत्र की यह निशानी नहीं है कि किसी विमान उड़ाते पायलट को नीचे उतार कर सीधे प्रधान मंत्री की गद्दी पर बिठा दिया जाय. किसी गृहणी को चूल्हे से उठा कर मुख्यमंत्री बना दिया जाए.हमारी लोक सभा के अनेकों सांसद अपने आचरण से यह प्रकट नहीं होने देते कि वे परिपक्व लोकतंत्र की लोक सभा के सांसद हैं. मैं समझता हूँ कि हमारा तंत्र लोक की चिंता ठीक प्रकार से नहीं कर रहा है इसलिए परिपक्व लोकतंत्र कहलाने का हकदार नहीं है. मैं कामना करता हूँ कि विश्व का सबसे बड़ा यह लोक तंत्र परिपक्व बने.

सोमवार, 26 जनवरी 2009

भविष्य के सम्मान

गण तंत्र दिवस पर विशिष्ट कार्यों के लिए पुरस्कार देने की परम्परा है. अर्थात कोई अच्छा काम करने के लिए देश आपको शाबाशी स्वरूप सम्मानित करता है. अब प्रश्न यह है कि शाबाशी के लायक काम क्या हो सकते हैं ? मैं समझता हूँ शाबाशी के लायक काम समय सापेक्ष हैं.मैं विचार कर रहा हूँ कि आने वाले समय में कैसे लोगों को सम्मानित किया जा सकता है.

मुझे अलमारी की सफाई करते हुए एक बहुत पुराने समाचार पत्र का पन्ना मिला.उसमें छपे समाचारों को पढ़ते हुए मेरी नजर एक समाचार पर पड़ी. समाचार था एक ऑटो रिक्शा चालाक के सम्मान का. उसने सम्मान लायक काम यह किया था कि,३२००० रुपये जो उसके ऑटो रिक्शा में किसी मुसाफिर के रह गए थे,अधिकारी व्यक्ति को लौटा दिए.

मैं इस सम्मान पर गहराई से विचार करने लगा.मुझे समझ में आ गया कि वास्तव में ऑटो रिक्शा चालक से अपेक्षा थी कि वह राशि,जो उसकी नहीं थी , उसने अपने पास रख लेना चाहिए थी. चूंकि उसने ऐसा न कर वह राशि उसके वास्तविक अधिकारी तक पहुंचा दी, इस लिए उसका सम्मान किया गया.

तभी मैं समझ पाया कि आने वाले समय में सम्मान योग्य कार्य क्या हो सकते हैं. बानगी देखिये -
-किसी शासकीय अधिकारी द्वारा, शासकीय कार्य हेतु किसी व्यापारी से ख़रीदी गयी सामग्री का यथा समय बिना कमीशन लिए भुगतान कर देना.
- किसी शासकीय पद पर अपने / श्रीमानों के भाई भतीजे या भेंट अर्पित करने वाले उम्मीदवार का चयन न कर प्रतियोगिता के आधार पर सबसे योग्य व्यक्ति का चयन कर लेना.
-थाने में आई किसी महिला की रिपोर्ट बिना बलात्कार किए लिख लेना.
-शासकीय वाहन का उपयोग घर की सब्जी लेने,सिनेमा जाने या सैर सपाटे के लिए न करना.
-बिना अपराधिक रिकार्ड के किसी राजनीतिक दल से चुनाव टिकट प्राप्त कर लेना.

सूची बहुत लम्बी हो सकती है.लगता है भविष्य में सम्मान प्राप्त कर लेना आज की अपेक्षा आसान हो जायेगा.

रविवार, 18 जनवरी 2009

पत्रकारों की नस्ल

वैसे तो पत्रकारों की अनेक श्रेणियां,वर्ग,उपवर्ग, जातियाँ और प्रजातियाँ इस संसार में पाई जाती हैं, जिस पर एक विषद ग्रन्थ तैयार किया जा सकता है., किंतु इनमें से कुछ का वर्णन मैं यहाँ कर रहा हूँ.

एक श्रेणी में वे पत्रकार आते हैं,जिनके पास न पत्र होता है और न कार,फ़िर भी वे किसी न किसी तरह किसी न किसी पत्र से सम्बद्ध कहलाये जाते हैं और यदा कदा या बहुधा कार का उपयोग करते पाये जाते हैं.इस श्रेणी का एक वर्ग अपने को श्रमजीवी कहता किंतु बुद्धिजीवी मानता है.जिसमें जितना अधिक बुद्धितत्व होता है वह अपने से कनिष्ठ के श्रम पर उतना ही अधिक जीता है.कुछ इस लिए भी श्रमजीवी कहलाने के हकदार होते हैं क्योंकि वे तबादले करवाने,रुकवाने, कोटा परमिट दिलवाने आदि में काफी श्रम करते हैं और इन्हीं तिकड़मों के लिए वे पत्र से सम्बद्ध रहते हैं और सेठ साहूकारों,नेता मंत्रियों और अफसरों की कार का उपयोग कर लेते हैं.

एक अन्य श्रेणी में वे पत्रकार आते हैं जिनके पास पत्र होता है लेकिन कार नहीं.इस श्रेणी में एक वर्ग ऐसा है जो वास्तव में श्रमजीवी है.श्रम करना इनकी नियति है.ये बुद्धिजीवी इस लिए नहीं कहे जा सकते क्योंकि तिकड़मी बुद्धि का इनमें नितांत अभाव होता है. ये यदि दैनिक समाचार पत्र में हों तो कभी इस पेज और कभी उस पेज का दायित्व संभालते संभालते इनकी उम्र निकल जाती है. अखबार में होने वाली सारी गलतियों का ठीकरा इन्हीं के सर फूटता है. ये सदैव अपने श्रम के प्रतिफल से वंचित रहते हैं. इन्हीं में से कुछ लोग कुछ रुपट्टी के लिए गुमनाम रह जाते हैं और इनकी जगह उनका नाम छपता है जो केवल दस्तखत करना जानते हैं, लिखना नहीं.

पत्रकारों का एक वर्ग वह है जो छपने या न छपने वाले साप्ताहिकों से सम्बद्ध रहता है और ऊपरी कमाई वाले सरकारी दफ्तरों में घूमता पाया जाता है. इनका मानना है कि ऊपरी कमाई करने वाले दफ्तरों की ऊपरी कमाई में एक हिस्सा इनका भी होता है. कुछ अधिकारी इनसे इतने त्रस्त रहते हैं कि दफ्तर के बजाय घर में बैठ कर सरकारी काम निबटाना अधिक उपयुक्त समझते है.

कुछ पत्रकार 'पत्रकार' नाम को पूर्ण सार्थक करते हैं. अर्थात इनके पास पत्र भी होता है और कार भी. निश्चित ही ये सफल पत्रकार हैं.लेकिन इस सफलता के पीछे एक लंबे संघर्ष की कहानी होती है जिसे बिरले ही जान पाते हैं. इनमें से कई कम्पोजीटर,प्रूफरीडर की सीढ़ी चढ़ कर नेताओं - मंत्रियों , अफसरों की दवा-दारू-दारा का इंतजाम करते हुए यहाँ तक पहुंचे होते हैं.ये वास्तव में बुद्धिजीवी और श्रमजीवी हैं क्योंकि इनमें जोड़-तोड़ की विशिष्ट बुद्धि के साथ उसके लिए दौड़ भाग का श्रम करने की अद्भुत क्षमता होती है. इनमें से कुछ वे लोग भी होते हैं जो लिख भी सकते हैं. ऐसे लोग अपनी लेखनी के दम पर नेताओं मंत्रियों के (भाषण, संदेश आदि लिखने हेतु) चहेते बन जाते हैं.

पत्रकारों की एक विरल प्रजाति उंगली में गिने जा सकने वाले लोगों की पायी जाती है, जिनमें चिंतन-मनन की क्षमता होती है. इनकी लेखनी में इतना दम होता है कि वे सरकारों को हिला दें, जन मानस को झकझोर दें. लेकिन इन्हें भी पत्र से निकाल बाहर करने और कार छीने जाने का खतरा रहता है.

सोमवार, 12 जनवरी 2009

कुशाग्र की कविता

कुशाग्र ११ साल का एक बच्चा है. वह छठी कक्षा में पढ़ता है. उसकी दादी का देहावसान ८८-८९ साल की पूरी आयु में हुआ. उसकी दादी की मृत्यु के तीसरे दिन,जब घर में सम्वेदना जताने वाले लोगों और मेहमानों का तांता लगा था और पढाई का कतई माहौल नहीं था, मैंने उसे एक कापी में कुछ लिखते हुए पाया. जिज्ञासावश मैंने उसके पास जा कर देखा कि आख़िर वह ऐसी विषम स्थिति में कौन सा विषय पढ़ रहा है. वास्तव में वह अपने मन के उद्गार कविता द्वारा प्रकट कर रहा था. मुझे उसकी सम्वेदना, काव्य प्रतिभा और शब्द रचना ने प्रभावित किया. प्रस्तुत है ११ वर्षीय कुशाग्र की रचना :

तोहफे सी मिली थी,
कमल जैसी खिली थी
वह मेरे अपने लिए,
हर चीज़ से बड़ी थी


पाला उसने मुझको ,
जैसे उसका दुलारा
लोरी सुना सुलाती,
कहती तू है प्यारा


मैं उससे बतियाता
वह मुझसे खुश होती
मैं यदि दुःख बतलाता
तो वह ख़ुद से रोती.

भले तुझे हो कष्ट
मुझको सदा बचाया
हर पल तूने बढ़कर
कर्तव्य को निभाया.



मुझे नहीं ये ज्ञान था
होगा अब कुछ ऐसा
हे भगवन यह तूने
कर डाला है कैसा

पंख लगाए तूने
चिड़िया सम उड़ चली
करूंगा पूरे सपने
जो तू देखकर उड़ पड़ी .

सोमवार, 5 जनवरी 2009

नव वर्ष पर ब्लोगों की काव्यात्मक प्रस्तुति

नव वर्ष पर अनेक ब्लोगर बंधुओं ने अपनी प्रस्तुतियां दी थीं. उनमें से जिन काव्य प्रस्तुतियों को मैं पढ़ पाया और मुझे अच्छी लगीं, उन्हें मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशा है जो बन्धु इन प्रस्तुतियों को नहीं पढ़ पाये थे, वे लाभान्वित होंगे.

सबसे पहले मैं उल्लेख कर रहा हूँ गौतम राजरिशी जी का. उन्होंने नव वर्ष पर एक बहुत सुंदर गजल दी है. कुछ शेर प्रस्तुत हैं :

दूर क्षितिज पर सूरज चमका, सुबह खड़ी है आने को
धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को.

प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गूंजेगी
देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव पे बाण चढाने को.

साहिल पर यूँ सहमे सहमे वक्त गंवाना क्यों यारो
लहरों से टकराना होगा पार समंदर जाने को.
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
साल गुजरता सिखलाता है, भूल पुरानी बातों को
साज नया हो, गीत नया हो, छेड़ नए अफ़साने को

कवि योगेन्द्र मौदगिल की प्रस्तुति में उन्होंने नए साल के स्वागत में होने वाली अनेकों कुरूपताओं का वर्णन करते हुए अंत में बहुत मोहक बात कही है :

संभव है तो रखो बचा कर, थोड़ी शर्म उजाले की
अंधेरे आ कर समझाएं नए साल के स्वागत में.

परमजीत बाली ने अपने ब्लॉग 'दिशाएं' में पुराने साल की विदाई और नए साल का स्वागत अपनी प्रभावी प्रस्तुति से इस प्रकार किया :
मेरे सपनों को
साथ लेकर,
मेरे अपनों की
यादें देकर,
देखो !
वह जा रहा है...............
नया साल आ रहा है.

देव की प्रस्तुति 'नव वर्ष है नव प्रभात है' नाम से आई, जिसमें कुछ संकल्प लिए गए हैं, जिन्होंने मुझे प्रभावित किया :

पथ में कुछ मुश्किल तो होगी
कुछ बाधाएं सरल न होंगी
अंधियारों में चलना होगा
गम भी हमको सहना होगा
गीत नए फ़िर भी गढ़ना है
स्वपन सुनहरे सच करना है.

अभिव्यक्ति ने नए साल से पूछा है कि पिछले साल के इतने घावों के बीच भला उसका स्वागत कैसे किया जा सकता है. उन्होंने कामना की है :
दे देना
सवालों के जवाब
मुरझाये चेहरों को
संभावनाओं का आकाश
बुझी आंखों में
आशा है और विश्वास
सपनों को देना पंख
जो भर सके ऊंची उड़ान
दे दो ऐसा स्वर्णिम विहान.

पंडित डी. के. शर्मा "वत्स" ने अपने ब्लॉग में सुश्री संध्या की अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित रचना प्रस्तुत की. उस रचना के कुछ अंशों से ही रचना की मादकता का अंदाजा लग जाता है :

फिर से उम्मीद के नए रंग
भर लाएँ मन में नित उमंग

खुशियाँ ही खुशियाँ बेमिसाल
हो बहुत मुबारक नया साल

उपहार पुष्प मादक गुलाब
मीठी सुगंध उत्सव शबाब

शुभ गीत नृत्य और मधुर ताल
हो बहुत मुबारक नया साल


मुझे खुशी है कि ब्लॉग जगत में प्रभावी रचनाएं पढने को मिल रही हैं. भविष्य में भी कोशिश करूंगा कि जो अच्छा लगे उसे यहाँ प्रस्तुत करुँ.