शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

भारत में होमियोपैथी हजारों वर्ष पहले प्रचलित थी

यह सर्वज्ञात तथ्य है कि होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति का जन्म जर्मनी में हुआ था. वहाँ के डाक्टर हैनिमेन ने १७९० में इसका प्रवर्तन किया था.इस पद्धति के बारे में अपने सामान्य ज्ञान से मुझे केवल इतना ज्ञात है कि होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति में मरीज में दिख रहे लक्षणों के आधार पर बीमारी का इलाज किया जाता है.यह देखा जाता है कि मरीज के शरीर पर दिख रहे लक्षण किन पदार्थों ( दवाओं) से उपजते हैं.उपचार के लिए वही पदार्थ दवा के रूप में दिए जाते है.संक्षेप में यह पद्धति 'जहर को जहर मारता है' के सिद्धांत पर काम करती है.

मैंने कहीं पढा था कि वैदिक ग्रंथों और कुछ यूनानी ग्रंथों में भी इस पद्धति का उल्लेख मिलता है. मैंने इन ग्रंथों का अध्ययन नहीं किया है और निश्चित रूप से इस बारे में कुछ नहीं कह सकता. लेकिन मेरा विश्वास है कि जहर से जहर को मारने के सिद्धांत द्वारा भारत में अतीत में उपचार किये जाते होंगे. मेरा यह विश्वास श्रीमद्भागवत पुराण के प्रथम स्कंध के पाँचवे अध्याय के तैंतीसवें श्लोक से पक्का बना. वह श्लोक इस प्रकार है –

आमयो यश्च भूतानां जायते येन सुव्रत |
तदेव ह्यामयं द्रव्यं न पुनाति चिकित्सितं ||

-प्राणियों को जिस पदार्थ के सेवन से जो रोग हो जाता है वही पदार्थ चिकित्साविधि के अनुसार प्रयोग करने पर क्या उस रोग को दूर नहीं करता ?

(उपरोक्त श्लोक और उसका अर्थ मैंने गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवत पुराण से उद्धृत किया है)

19 टिप्‍पणियां:

  1. daaju pranam,

    yaan le ek rog laag go, dil ki , laagoon tumar sidhanat k anusaar doohar baar pyar karoon padol !!
    ha ha ha
    ...lekh bhla chi ati vyastatak karan comment ni kar panaiye.

    kileki offic main le blogger ni chaloon ...tumar lekh 'google reader' main padh linoo par comment ni kar sakoon !!

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  2. यह श्लोक एक अनुभव को प्रकट करता है। जिस में होमियोपैथी से साम्य है। होमियोपैथी एक संपूर्ण दवापद्यति है। ऐसी दवापद्यति कभी भारत में थी, इस का प्रमाण नहीं मिलता।

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  3. हमारे घर के सामने एक्‍यूपंक्‍चर के एक डाक्‍टर रहते हैं .. उनका मानना है कि एक्‍यूपंक्‍चर को चीनी पद्धति माना जाता है .. पर यह पहले भारत में ही थी !!

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  4. गर्व करने लायक बात है ये तो ...!पर दुनिया मान रही है और हम भूल रहे है....

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  5. पहले तो बधाई ,
    आप सफल रहे , कह कर गया था शायद जल्दी न आपाऊं व्यस्तता है , ऐसी चुटकी काटी कि तुंरत होमेओपैथिक चिकित्सा के लिए शरण में आना ही पड़ा ; भाई मजा आ गया | लगता है झोली के साथ सिक्युरटी ले कर आये थे ---- हा,हा हा

    चिंता न करें मुझे आप के " वक्त " का पूरा ख्याल रहेगा |

    ऐसे आलेख समय बहुत लेते ही हैं |
    भाई कहाँ से ढूढ के ले आये ?
    क्या भूल गए '' विषम् विषस्य औषधम् " |
    वैसे होम्योपैथिक के मूल सूत्र '' सिमिलिया सिम्लिबुस क्युरेंटर ::समः समं शमयति " के बीज हैनिमन से लगभग २५०० वर्षों पूर्व के एक महान यूनानी या रोमन दार्शनिक चिकित्सक के कथन से ही प्रस्फुटित हैं |
    वैसे आपके उधृत श्लोक के भावों का समर्थन करते हुए भी गंभीरता पूर्वक कुछ कहने से बचाना चाहूँगा क्योंकि मैं पाठकों की अदालत में जो कुछ भी कहूँगा साक्ष्यों सहित कहूँगा ?

    [[ देख नहीं रहे हैं कि ब्लोगिस्थान के इतने बड़े एडोवोकेट श्री द्विवेदी जी आप के कथन पर आपत्ति प्रकट करते हुए अपना वकालत - नामा पहले ही लगा चुके हैं ]]

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  6. लेखक ने तो यही लिखा है कि ग्रंथों में इस पद्धति का उल्लेख मिलता है _आशय होमियोपेथी से नहीं बल्कि जहर से जहर मारने वाली पध्द्यती से था खैर |होमिओपेथी के सिद्धांत का समर्थन श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोक से करना सराहनीय है + विष विष की औषधि है यह तो अन्योनास्ती में लिख ही दिया गया है |कहा भी जाता है "कांटा कांटे से निकलेगा ,विष होगा विष से निर्मूल | यह तो सब ठीक है किन्तु नई बात या अविष्कार को पुराने ग्रंथों में खोजना ,कठिन अवश्य है किन्तु है तो सराहनीय ही |

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  7. सही हैं - काटे से कांटा निकालना पुरानी कहावत है।
    बबूल के कांटे से हमने यह किया भी है!

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  8. बहुत कम लोग मानते हैं फिर भी....

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  9. ज्ञानवर्धक ,रोचक लेख हेम जी !!

    आभार

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  10. bahut hi achchhi jaankari ..man prasann ho gaya..thanks for post...

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  11. Bahut hi gyanvardhak rachna, bilkul sahi baat kahi aapne aur yah tathya sach bhi prateet hota hai:
    * Lohe ko loha ktata hai.....
    * kaante se kaanta nikalta hai.....
    * zahar ko zahar katata hai ......
    ye sabhi matr kahawaat to nahi ho sakte hain, inka kuch na kuch to awashya hi matlab hoga jeewan mein
    vaise bhi jitne vaccine hain kya hain, usi rog ke kitaanu hain jo usi rog ke needan ke liye upyog kiye jaate hain...
    acche rachna hai aapki..
    badhai..

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  12. पढ़ा तो मैने भी नही है । लेकिन आप कह रहे है तो मानना ही पड़ेगा । यह सही है कि जिस तथ्य की खोज हमने की थी उसे हम ही भुलते जा रहे है औऱ लोग उसे अपना रहे है । रोचक जानकारी आपने दी है । धन्यवाद

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  13. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! आपके पोस्ट के दौरान अच्छी जानकारी प्राप्त हुई उसके लिए धन्यवाद!

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  14. बहुत ही बढ़िया जानकारी आभार !

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  15. SAHI KAHA PANDEY JI, MAIN BHI SHRI MADBHAGWAD PADHTE HUE IS SHLOK PAR ATKA THA, YAHI BAAT MIND MEIN AAI THI, MAGAR US SAMAY BLOG NAHIN THA, ZAROORI NAHIN HOTA TO BHI LIKH PAATA, AAPNE BILKUL THEEK KAHA HAI.

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