गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

भट्टा बैठाने वाले ये कर्मचारी-अधिकारी !

मुझे याद रहा है जब कुछ वर्ष पूर्व मैं ब्रोडबैंड कनेक्शन की जानकारी लेने के इरादे से बी.एस.एन.एल दफ्तर पहुंचा तो वहाँ बैठे खिचड़ी बालों वाले एक अधेढ़ व्यक्ति ने मुझे एक पर्चा थमा दियाजब मैंने कुछ पूछना चाहा तो उसने बड़ी बेरुखी से जवाब दिया- इस पर्चे में सब लिखा हैमैं मायूस घर लौट आया और ब्रोडबैंड कनेक्शन लेने का मेरा इरादा लंबित रहाकुछ दिनों बाद जिस दिन मुझे अपना डायलअप कनेक्शन रीन्यू कराना था, उसी दिन एयरटेल से ब्रोड बैंड लेने हेतु एक फोन आयामैंने तुरंत ही सम्बंधित कर्मचारी को घर पर बुलवा लियावह कर्मचारी पूरी तैयारी के साथ आया था और उसने मेरे निवास पर ही १५-२० मिनट के भीतर सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद एक या दो दिन में कनेक्शन उपलब्ध कराने का वादा कियायह घटनाक्रम प्रातः ग्यारह बजे का हैउसी दिन शाम को चार बजे के आसपास कनेक्शन लग चुका था

अभी दो दिन पहले एयरटेल द्वारा दिए गए मोडम ने काम करना बंद कर दियामैंने इसकी शिकायत उसके कॉल सेंटर में कीउपस्थित कर्मचारी ने बड़ी विनम्रतापूर्वक यह जानना चाहा कि कम्पनी के सर्विस इंजीनियर की विजिट के लिये कौनसा समय मेरे लिये सुविधाजनक होगामैंने उसको दिन में एक बजे से पहले का समय बतायाजवाब में मुझे बताया गया कि अपनी प्री-बुकिंग के कारण इंजीनियर को थोड़ी देर हो सकती है पर वो अधिकतम दो बजके इकतालीस मिनट उनतालीस सेकण्ड तक पहुँच जायेंगेलेकिन सर्विस इंजीनियर मेरी सुविधानुसार साढ़े बारह से पहले ही पहुँच गए थे

इसके विपरीत बी.एस.एन.एल के लैंड लाइन कनेक्शन को सुधरवाने के लिये मुझे सात आठ दिन की प्रतीक्षा करनी पड़ी और कॉल सेंटर में शिकायत करने के बाद लाइन मेन, सुपरवाईजर, सहायक यंत्री और अधीक्षण यंत्री तक सबसे निवेदन करना पड़ाजब सहायक यंत्री से मैंने जानना चाहा कि कब तक फोन ठीक हो जाएगा तो उनका उत्तर था- जब आपके फोन पर घंटी बजने लगेगी

सरकारी कम्पनियां अपनी ऐसी हरकतों से इन कंपनियों का भट्टा बैठाने और प्रतिद्वंदी निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने का काम करती रहती हैंविजय सुपर स्कूटर का नामोनिशान मिट चुका है, एच.एम.टी घड़ियाँ दुर्लभ हैंबी.एस.एन.एल भी इसी राह पर चले जाए तो कोई ताज्जुब नहीं

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

जागो हिन्दू जागो - कट्टरपंथी बनो

धार्मिक कट्टरपंथ सामान्यतः अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता | लेकिन यदि धर्मग्रंथों की अच्छी बातों का कट्टरता से पालन किया जाय तो इस प्रकार की कट्टरता मानव कल्याण ही करेगी |

हजारों वर्ष पूर्व ही हमारे ऋषि मुनियों ने महसूस कर लिया था कि
समाज में स्त्री शक्ति का सम्मान ही नहीं होना चाहिए अपितु उसे पुरुष की अपेक्षा श्रेष्ठ भी माना जाना चाहिए | सद्यः संपन्न नवरात्र पर्व इसी तथ्य की ओर इंगित करता है | मातृ शक्ति का पूजन और कन्या पूजन की परम्परा संभवतः समाज में नारी को आदर का स्थान देने के लिये ही की गयी थी | इस लिहाज से वे ऋषि मुनि नारी सशक्तीकरण के प्रवर्तक थे |

किन्तु व्यवहार में देखा जाता है कि हिन्दू समाज में ऋषि मुनियों द्वारा प्रतिपादित नारी की श्रेष्ठता का सम्मान नहीं किया जा रहा है | यदि हिन्दू समाज नारी-श्रेष्ठता को हिन्दू धर्म का अनिवार्य अंग मान कर कट्टरता से उसका पालन करे तो यह कट्टरता श्रेयस्कर ही होगी |

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

सरकार की ताकत

मेरा शहर ९२ में दंगों की चपेट में आया थामेरा स्कूटर, जो तब सर्विस सेंटर में था, भी दंगाइयों ने जला डाला था | इस बार २४ सितम्बर से ३०सितम्बर तक भी लोगों में आशंका मौजूद थी |पिछले सबक को याद कर के घरों में राशन, सब्जी आदि का भण्डार जमा किया जाने लगा था | शरारती तत्व अपनी तरह की तैयारी में लगे थे | लेकिन किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं हुई कि जरा भी गड़बड़ी कर सके | यही नहीं इन दिनों शहर में होने वाले आम अपराध भी नहीं सुनाई दिए | क्यों ? क्योंकि मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों और पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दे दिए थे कि उनके क्षेत्र में होने वाली किसी भी गड़बड़ी के लिये ये अधिकारी जिम्मेदार होंगे और राजनीतिक दबाव की दलील नहीं मानी जायेगी | अर्थात जवाबदेही तय कर दी गयी थी और अधिकार दे दिए गए थे | फलतः पुलिस ने गड़बड़ी करने, करवाने वालों , जिनमें राजनीतिक दलों से सम्बद्ध दादा भी थे,को जिलाबदर करने की कारवाई दो दिन में ही कर डाली | सामान्य दिनों में कोई पुलिस अधिकारी इन लोगों की ओर आँख उठा कर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता था |


क्या ऐसी व्यवस्था के लिये ३० सितम्बर जैसे हालात होने जरूरी हैं ? क्या ऐसी जवाबदेही सदा तय नहीं की जा सकती ? की जा सकती है और की जानी चाहिए | दृढ इच्छाशक्ति
वर्तमान कानूनों के भीतर ही सुशासन दे सकती है |











सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

ब्लॉगजगत का एक और घटियापन

२३ सितम्बर से ३० सितम्बर के बीच और उसके तुरंत बाद का भारत एक अपरिपक्व देश की छवि प्रस्तुत करता है |उच्च न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले एक फैसले को शांतिपूर्वक सुनने के लिये हमारे प्रधान मंत्री को जनता से अपील करनी पड़ती है , भारी सुरक्षाबल तैनात करने पड़ते हैं , ३० सितम्बर को शाम तीन बजे से अनेक शहरों में कर्फ्यू का सा माहौल बन जाता है | सभी सम्बंधित पक्ष बार बार कहते हैं कि उन्हें अदालत का फैसला मंजूर होगा ,मानो अदालत का फैसला मान कर वे कोई अहसान कर रहे हों | यह सब अपरिपक्वता की ओर ही इंगित करता है |

अदालत के फैसले के बाद असंतुष्टों को ऊपरी अदालत में जाने का पूरा अधिकार है | लेकिन एक विशेष प्रकार के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे लोगों की टिप्पणियाँ अपरिपक्वता को और अधिक उजागर करती हैं | ब्लॉग जगत में तो एक ब्लोगर ने जजों द्वारा दिए फैसले को 'अ-कानूनी' करार दे दिया | मतलब अब उच्च न्यायालय के जजों को क़ानून सीखने के लिये ब्लॉगजगत के दरवाजे खटखटाने पडेंगे ? यह ब्लॉग जगत की अपरिपक्वता (घटियापन)नहीं तो और क्या है ?

वैसे इस मामले में मेरी व्यक्तिगत राय उन हिन्दू-मुसलामानों से मेल खाती है, जो मानते हैं कि अदालत के फैसले के बाद उस स्थान पर राम मंदिर बनाने में मुसलमान सहयोग करें और अन्यत्र मस्जिद बनाने के लिये हिन्दू उससे अधिक सहयोग करें |

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

पाखण्ड अच्छा है

"रमजान में आपसे झूठ नहीं बोलूंगा" एक मेकेनिक ने मुझसे कहा | "रमजान में मैं झूठ नहीं बोलूंगी" एक महिला कर्मचारी बोली | हालांकि उसने यह भी जोड़ा - झूठ तो मैं वैसे भी नहीं बोलती | नवरात्र पर उपवास और अनेक नियमों का पालन करने वाले कुछ लोग उन नौ दिनों में बुरे कहे जाने वाले कामों से विरत पाए जाते हैं | एक व्यक्ति ने फोटो पोस्टर की दुकान में कुछ धार्मिक फोटो पसंद किये और दुकान दार से बोला- कृपया इन फोटो को मेरे लिये सुरक्षित रख दें, मैं बाद में आकर खरीदूंगा, इस समय मेरे पास पाप की कमाई (जुए में जीती राशि ) है, इससे ये फोटो नहीं खरीद सकता | रोजे-नमाज़, व्रत-उपवास आदि कर्मकाण्ड अपनाने वालों को हम बोलचाल में धार्मिक कह देते हैं | हालांकि धार्मिक तो वे हैं जो श्रद्धा,मैत्री,दया,शान्ति आदि गुणों से युक्त हों|ऐसे कर्मकांडी धार्मिकों और पाप की कमाई से धार्मिक फोटो न खरीदने वाले लोगों को हमारे कुछ मित्र (जिनमें से कुछ ब्लॉग जगत में भी मौजूद हैं),पाखंडी भी कह देते हैं |


ऐसे कर्मकांडी या पाखंडी यदि अपनी धार्मिक भावना के वशीभूत थोड़े समय के लिए ही अच्छे कामों में लिप्त हो जाते हैं या उनके मन में अच्छे विचार आ जाते हैं तो ऐसा पाखण्ड भी अच्छा है|गलत कह रहा हूँ ?



सोमवार, 6 सितंबर 2010

एक और सार्थक प्रयास

ब्लॉग जगत में सार्थकता  देख कर मुझे प्रसन्नता होती है | सभी को होती होगी | आज एक और सार्थक प्रयत्न नजर आया | श्री   का यह प्रयत्न शायद आपको पसंद आये :- 
www.gaonwasi.blogspot.com/
(लिंक नहीं बन पा रहा है ,इसलिए ब्लॉग का पता दे रहा हूँ) 

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

अग्रे किं किं भविष्यसि

'अग्रे किं किं भविष्यसि' यह वाक्य व्याकरणीय दृष्टि से सही है या नहीं , यह मैं नहीं जानता | किन्तु मेरी माताजी ने मुझे यह कहानी इसी शीर्षक के तहत सुनाई थी, इस लिये इसी वाक्य का प्रयोग कर रहा हूँ | प्रायः हम पतन या बुराई को घटित देखते हैं और सोचते हैं कि आगे न जाने और कितना बुरा होगा | कवि की ये पंक्तियाँ भी इसी ओर इंगित करती हैं-
क्या थे , क्या हो गए और क्या होंगे अभी
किन्तु कभी कभी जीवन में इतना बुरा घटित हो चुका होता है कि हम सोचने लगते हैं- अब इससे बुरा और क्या घटित हो सकता है ? किन्तु यह धारणा भी गलत हो सकती है , यह निष्कर्ष इस कथा से निकलता है, जो मुझे बचपन में मेरी माता जी ने सुनाई थी -

एक विद्वान काशी से विद्या प्राप्त कर अपने गृह नगर लौट रहे थे | रास्ते में उन्हें एक (कंकाल की ) खोपड़ी पड़ी मिली | विद्वान को प्राप्त शिक्षा के अनुसार उस खोपड़ी की लेख कहती थी- 'अग्रे किं किं भविष्यसि' | अर्थात आगे न जाने क्या क्या भुगतना है ? विद्वान को आश्चर्य हुआ | भला इस कंकाल को अब क्या भुगतना पड़ सकता है- उन्होंने सोचा | जिज्ञासावश उन्होंने उस खोपड़ी को उठा लिया और घर पहुँचने पर एक संदूक में संभाल कर रख दिया | उन्होंने अपनी पत्नी को हिदायत दे रखी थी कि इस संदूक में उनकी महत्वपूर्ण सामग्री है, अतः उसे कभी न खोलें | विद्वान समय समय पर उस खोपड़ी को देख लिया करते थे और सदा वही वाक्य लिखा पाते - अग्रे किं किं भविष्यसि |

एक बार उन विद्वान की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी ने उस संदूक के रहस्य को समझने की ठान ली | संदूक खोलने पर उस खोपड़ी को देख कर वह स्तब्द्ध रह गयी | उसने अनुमान लगाया कि यह खोपड़ी अवश्य उसकी सौत की है | उसके पति सौत की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी उसे भुला नहीं पाए हैं और उसकी खोपड़ी को सहेज कर रखा है | पत्नी ने उस खोपड़ी को ओखल में कूट कर चूरा बना दिया और उसे खेत में बिखेर दिया | विद्वान को जब यह बात मालूम पड़ी तो उन्हें संतोष हुआ कि उनके द्वारा प्राप्त विद्या सही है | उन्होंने उस खोपड़ी की लेख को सही पढ़ा था |

तो बन्धु पतन की जिस सीमा को आप पराकाष्ठा समझते हैं, हो सकता है पतनोन्मुखी उससे भी आगे पंहुच जाए | कभी कभी ब्लॉगजगत में भी घटियापन देख कर लगता है, न जाने आगे क्या क्या घटियापन देखना पडेगा !

सोमवार, 30 अगस्त 2010

पुस्तक - एक शानदार उपहार

बड़ी  बेटी  का फोन आया |अभिवादन और आशीष के बीच उसे शायद मोबाइल में कुछ बाहरी आवाजें सुनाई दीं | कहाँ हैं ? क्या कर रहे हैं ?- वह बोली |
स्टोर  में हूँ और छोटी ( बेटी ) के लिये बर्थ डे गिफ्ट  खरीद रहा हूँ -  मैंने उत्तर दिया |
क्या खरीद रहे हैं ? - उसने पूछा |
तुम बताओ - मैंने कहा |
आप बुक स्टोर  में हैं और छोटी के लिये किताब खरीद रहे हैं - बड़ी बेटी का सही अनुमान था |

मुझे ध्यान आता है कि मैंने अपने बच्चों  के जन्म दिन पर अधिकतर  पुस्तकें ही भेंट की हैं |.अपने कुछ मित्रों को भी जन्मदिन पर पुस्तक भेंट करना ही मुझे उपयुक्त लगा | मैं तो शादी ब्याह के निमंत्रणों  पर भी पुस्तकें भेंट करना चाहता हूँ , लेकिन पत्नी के विरोध के कारण ऐसा नहीं करता |  मेरा विचार है भेंट स्वरूप पुस्तकें देना एक अच्छा विकल्प है | आज शायद पुस्तकों के प्रति हमारा मोह कम होता जा रहा है | एक कारण पुस्तकों का मूल्य अधिक होना भी है | लेकिन मूल्य ही एकमात्र कारण नहीं है | हम आउटिंग  में, मनोरंजन में, डेकोरेशन में दिल खोल कर खर्च कर सकते हैं, तो पुस्तकों पर क्यों नहीं ? मुझे साठ का वह दशक याद आ रहा है, जब हिन्दी में अनेक स्तरीय  पत्रिकाएँ  थीं | हिंद पाकेट बुक्स ने घरेलू लायब्रेरी योजना शुरू की थी , जिसमें दस  रुपये     प्रति माह में बिना डाक खर्च के स्तरीय पुस्तकें प्राप्त कर आप घर पर ही  एक छोटी मोटी लायब्रेरी बना सकते थे| मधुशाला, उमर खैयाम की  रुबाइयां, शरतचंद्र और प्रेम चन्द्र के उपन्यास, कृशन  चंदर की एक गधे की आत्म कथा, एक वायलन समंदर के किनारे आदि अनेक स्तरीय कृतियाँ  हमने इसी घरेलू लायब्रेरी योजना के तहत पढी थीं |  आज संभवतः कोई प्रकाशक इस प्रकार की योजना नहीं चलाता है | संभवतः प्रकाशकों का ध्यान सीधे पाठकों की ओर न हो कर सरकारी खरीद  की ओर अधिक है, जिसके कारण पुस्तकों  का मूल्य उन्हें अधिक रखना पड़ता है ताकि दिए जाने वाले कमीशन की भरपाई हो जाए | जहां कमीशन न देना पड़े वहाँ डिस्काउंट  दे सकते हैं |

 घरेलू लायब्रेरी योजना जैसी योजना चलाना या पुस्तकों का मूल्य कम करना तो हमारे नियंत्रण में नहीं | लेकिन एक दूसरे को पुस्तकें उपहार स्वरूप देकर हम पुस्तकों के प्रचार प्रसार में सहयोगी बन सकते हैं |

बुधवार, 25 अगस्त 2010

बदलते रिश्ते

दूसरे शहर में रहने  वाली अपनी विवाहिता बेटी से फोन पर बात हुई | वह उस समय शौपिंग कर रही थी | उसके ससुर  उसे राखी के त्यौहार पर कपड़े दिलाने लाये थे | उसके ससुराल में उसकी जन्म तिथि पर हिन्दू पद्धति से और जन्म दिन  पर केक काट कर   उत्सव  मनाया जाता है | जब फोन पर मैं अपने समधी जी से बात कर रहा होता हूँ और अपनी  बेटी के लिये  'आपकी बहू ' शब्द  प्रयोग  कर  देता  हूँ तो वे नाराज हो जाते हैं | उनका मानना है कि वह उनकी बेटी है | उन सास बहू या ससुर बहू को जब बिलकुल अनौपचारिक तरीके से हंसी मजाक करते  देखता हूँ तो अचंभित होता हूँ  और बेटी के सास ससुर  की अनुपस्थिति में बेटी को समझाने का यत्न करता हूँ - आखिर वे तुम्हारे सास ससुर हैं, उनसे एक सम्मानजनक दूरी से बात करनी चाहिए | वे खुद ही यह दूरी नहीं बनाने  देते -बेटी का उत्तर होता है | मैं निरुत्तर हो जाता हूँ |

 उसकी शादी के ठीक पहले हम दोनों माता  पिता ने उसे सीख देनी शुरू कर दी थी- 'अब ससुराल जाने वाली हो , यह  अल्हड़पन छोड़ो | सास ससुर के सामने उठने बैठने  और बातें करने का कायदा सीखो | सास ससुर माता पिता जैसे नहीं होते |' कुछ महीने ससुराल में रहने के बाद जब वह पहली बार हमारे पास आयी तो बोली- 'ससुराल में मुझे कुछ अटपटा नहीं लगता | मेरी ननद  मेरी बहुत अच्छी मित्र बन गयी है | सास ससुर का व्यवहार भी आप जैसा ही है | वे भी कभी कभी मुझे आप ही की तरह डाँट देते हैं और मैं आप की ही डाँट समझ कर चुप हो जाती हूँ | 

मैं सोचता हूँ - यह जो वास्तविक जीवन में देख रहा हूँ उसे सच मानूं या टी वी में आ रहे सास बहू  सीरियलों को?

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

क्रूरता या जनरेशन गैप ?

हमारी पीढ़ी के लोग पहले पढ़ाई पूरी करते थे उसके बाद नौकरी की तलाश करते थे | आज कुछ संस्थानों में पढने वाले बच्चों के लिये कुछ कम्पनियां स्वयं नौकरी लेकर आती हैं |ऐसे संस्थानों में इंजिनीयरिंग संस्थान,प्रबंधन संस्थान और क़ानून की शिक्षा देने वाले राष्ट्रीय संस्थान शामिल हैं| इस प्रकार पाई गयी नौकरी कैम्पस सलेक्शन कहलाती है |

एक इन्जीनीअरिंग संस्थान  के कैम्पस के अन्दर संस्थान के  कुछ लड़कों को संस्थान के ही  कुछ दूसरे लड़के  पीट रहे थे | न तो वे रैगिंग ले रहे थे न ही लड़ रहे थे | वे तो सेलिब्रेट कर रहे थे|हुआ यह था कि पिटने वाले लड़कों का कैम्पस सेलेक्शन हो गया था, इस लिये अन्य लड़के उन्हें पीट रहे थे |यह उनके खुशी मनाने का तरीका था | कुछ ऐसा ही तरीका ये लोग बर्थ डे मनाने के लिये भी अपनाते हैं | जिसका जन्मदिन हो उसे उठा उठा कर पटकना  और लातें मारना इनके सेलिब्रेट करने का तरीका है |

जो तरीके इन बच्चों के लिये खुशी मनाने के साधन हैं वे हमें क्रूर लगते हैं| क्या यही जनरेशन गैप है ? क्या इस जनरेशन गैप को मिटाने के लिये हम भी अपने बच्चों को नौकरी मिलने पर बेल्ट से पीटें और उनके जन्म दिन पर उन्हें लातों से मारें ?