बुधवार, 21 अप्रैल 2010

आपकी नीद आपकी पोल खोल देती है.

जब व्यक्ति सो रहा होता है तो वह अपने व्यक्तित्व को उदघाटित कर रहा होता है.देखिये कैसे -

गोल हो कर सोना - डरपोक प्रकृति।

लिहाफ में मुंह ढँक कर सोना - जीवन के तथ्यों से डर कर उनका सामना न कर पाना, असुरक्षा की भावना।

बार- बार बेचैनी से करवट बदलना - मस्तिष्क में विरोधाभासी तत्वों का काम करना या कोई बड़ी समस्या
सामने होना।

पीठ के बल फ़ैल कर सोना - संतुष्ट जीवन, असुरक्षा की भावना का न होना।

पेट के बल सोना - जीवन के तथ्यों से मुंह चुराना।

करवट से सोना - व्यर्थ के पचड़ों में न पड़ना, रिस्क न लेना, सदा सतर्क रहना।

अब आप स्वयं ही अपने सोने की आदत से अपने स्वभाव का आकलन कर लीजिये।

रविवार, 28 मार्च 2010

जागो ग्राहक जागो उर्फ़ निरीह उपभोक्ता

उपभोक्ता के हित हेतु सरकार सजग है। विज्ञापन के जरिये ग्राहक को जगा कर सरकार स्वयं सो जाती है। सरकार का साफ़ साफ़ कहना है कि ग्राहक सरकार की नींद में खलल न डाल कर सीधे उपभोक्ता संरक्षण एजेंसी के पास चला जाए। ग्राहक बेचारा परेशान - किस किस की शिकायत करे। मोबाइल कंपनियों को ही ले लें। अभी कुछ दिन पहले तक तो सरकार ने ही मोबाइल कंपनियों से कह रखा था की ग्राहक की एक सेकण्ड बात के लिए वह एक मिनट का शुल्क (साठ गुना) वसूल सकती है। यदि आप अत्यधिक सजग हैं तो पायेंगे कि कम्पनियां आपके प्रीपेड बेलेंस में से निर्धारित शुल्क से अधिक काट ले रही है। एक उपभोक्ता ने प्रतिष्ठित कंपनी 'आइडिया' का एक प्लान लिया जिसमें १२ घंटे बाद कम दरों में बात होनी थी। जब ३६ घंटों बाद भी दरें कम नहीं हुईं तो ग्राहक ने कंपनी के कॉल सेंटर में शिकायत करी। उसको उत्तर मिला बात करने के पहले स्वयं चेक कर लेना चाहिए कि प्लान लागू हुआ या नहीं। इस बेहूदे उत्तर से कुपित हो ग्राहक ने ई मेल द्वारा कंपनी के ही वरिष्ठ अधिकारी से शिकायत की। लेकिन उसे कोई उत्तर नहीं मिला।लाचार ग्राहक ने दूसरी कंपनी की शरण ले ली।

बाजार में अनेक वस्तुएं उन पर अंकित मूल्य से बहुत कम में बिक रही हैं । अर्थात इन वस्तुओं पर अत्यधिक मार्जिन रखा गया है। ऐसे में कोई दुकानदार अंकित मूल्य पर ही सामग्री बेच देता है तो ग्राहक सारे उपभोक्ता सरंक्षण दावों के बावजूद निरीह ही रहेगा। कुछ दिन पहले घुघूती जी के ब्लॉग पर बाजार में बिक रहे प्रदूषित फलों और सब्जियों के बारे में पढ़ा था। एक अन्य ब्लॉग में रीडर्स डायजेस्ट द्वारा ग्राहकों से की जा रही धोखाधड़ी (जिसका मैं स्वयं भी शिकार हुआ हूँ) के बारे में पढ़ा। नमकीन, बिस्कुटों और अन्य खाद्य पदार्थों, साबुनों आदि की पैकिंग २५० ग्राम से २००,१८५,१८० १७० ग्राम कब हो गयी ग्राहक को यह पता ही नहीं चल पाता। मिलावटी और नकली दूध, मावा और घी ग्राहक खरीदने को मजबूर है।

जागो ग्राहक क्योंकि सरकार हेडली, नक्सली और थरूर को लेकर थक कर सो चुकी है।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

नास्त्रेदमस, नारायण दत्त श्रीमाली की भविष्यवाणी और संगीतापुरी का तुक्का

इस पोस्ट को लिखने की प्रेरणा मुझे संगीतापुरी जी की भूकंप संबंधी भविष्यवाणी से मिली उनके द्वारा दी गयी समय सीमा के अन्दर हैती में भूकंप आ गया । यद्यपि घटना दुखद थी किन्तु आनेवाली घटना का पूर्व अनुमान लगा लेने के लिए संगीताजी साधुवाद की पात्र हैं। आने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान लगा कर तदनुसार अपनी रणनीति तैयार की जा सकती है।

सोलहवीं सदीके भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियाँ तो प्रसिद्ध हैं ही। यदि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी भविष्यवाणियाँ बार बार सच साबित हो रही हों तो उसे तुक्का या संयोग मान कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता। हमें उस विधा की दाद देनी चाहिए जो सटीक पूर्वानुमान लगाने में सक्षम है।

१९ जून १९६९ के दैनिक हिन्दुस्तान में प्रसिद्ध ज्योतिषी नारायण दत्त श्रीमाली की भविष्यवाणियाँ छपी थीं:
- १९७२ के आम चुनावों में कांग्रेस विजयी होगी.
-१९६९ का उत्तरार्ध और १९७० का पूर्वार्ध अरब राष्ट्रों विशेषकर राष्ट्रपति नासिर के लिए संकटों और संघर्षों का रहेगा।
-श्रीमती जेक्वेलिन( पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी की पूर्व पत्नी) और ओनासिस (उसके नए पति) का तलाक १० जून १९७३ से ८ अगस्त १९७४ के बीच हो जाएगा.
ये भविष्यवाणी सच साबित हुईं . लेकिन १९७५ तक भारत-पाक महासंघ बन जाने की भविष्यवाणी गलत निकली।
अब इसमें कितना तुक्का था और कितनी गणना , यह श्री श्रीमाली ही जानें।

समय समय पर और विशेष रूप से वर्ष के प्रारम्भ में ज्योतिषियों द्वारा अनेक भविष्यवाणीयाँ की जाती हैं जिनमें कुछ सच निकलती हैं और कुछ झूठ। जिनकी अधिकतर भविष्यवाणी सच निकले उनकी भविष्यवाणी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, चाहे वह तुक्का ही क्यों न हो।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

सिंहल और जीरामन



मेरा मानना है -पाक कला या व्यंजनों के बारे में संजीव कपूर जैसे लोग लिखें तो उसकी अहमियत है। लेकिन जब विभिन्न व्यंजनों के बारे में वीर संघवी और पुष्पेश पन्त के लेख राष्ट्रीय पत्रों में पढ़े तो मुझे लगा जो राजनीति, समाज और साहित्य आदि के बारे में लिख सकता है उसे खाने के बारे में लिखने का भी अधिकार हासिल हो जाता है। इसी नाते मैंने जबरदस्ती यह अधिकार हासिल कर आज एक कूर्मांचलीय व्यंजन और जैन समाज में लोक प्रिय एक चूर्ण के बारे में लिखने का संकल्प कर लिया।

चित्र में दिख रहा व्यंजन कूर्मांचलीय व्यंजन सिंहल है,जो चावल के आटे में शुद्ध घी का मोयन दे कर दही में दो तीन घंटे भिगो कर बनाया जाता है। इसमें शक्कर भी मिलाई जाती है। स्वाद के लिए कुछ लोग इलायची, सौंफ भी मिलाते हैं। इस तरह के पेस्ट को हथेली की मुट्ठी में भर कर घी या तेल में जलेबी के आकार का तल लिया जाता है। कूर्मांचल में त्योहारों में पकवान के रूप में इसे बनाया जाता है। वहां बुजर्ग महिलाएं इसे बनाने में माहिर होती हैं। अब कुछ महिलाएं चावल के आटे के स्थान पर सूजी ( रवा) का प्रयोग करती हैं। अनेक कूर्मांचलीयों की तरह मुझे भी यह व्यंजन बहुत पसंद है। मैं खुश किस्मत हूँ कि मेरी पत्नी इसे बना लेती है और प्रायः नाश्ते के रूप में यह व्यंजन मुझे मिल जाता है। कुछ लोग इसे ककड़ी के रायते में भिगो कर खाना पसंद करते हैं। मुझे 'जीरामन' के साथ सिंहल खाना भी रुचिकर लगा। संभवतः यह व्यंजन सम्पूर्ण भारत में केवल कूर्मांचल में ही बनता है। लेकिन वहां भी इसका स्वाद लेने के लिए किसी घर की शरण लेनी पड़ेगी क्योंकि बाजार में कहीं भी इसका व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता।



'जीरामन' एक प्रकार की सूखी चटनी है जो अनेक मसालों को मिला कर बनायी जाती है और जैन समाज में अत्यंत लोकप्रिय है । इसका व्यावसायिक उत्पादन करने वाले एक व्यापारी ने मुझे बताया कि इसमें ८० प्रकार के मसाले मिलाये जाते हैं। लेकिन मुझे केवल १९ वस्तुओं की ही जानकारी मिल पायी। ये हैं - सादा नमक, मिर्च,अमचूर या आंवला,धनिया, हल्दी, काला नमक, जीरा,सौंफ,सौंठ,दाल चीनी, अजवाइन, लौंग,तेजपत्ता,बड़ी इलायची, सिया जीरा, जायपत्री,जायफल, हींग, हर्र। बहरहाल मसालों की संख्या जो भी हो लेकिन उनका उचित अनुपात ही जीरामन को इतना स्वादिष्ट बना पाता होगा। कूर्मान्चाली सिंहल जैनी जीरामन के साथ कुछ और ही स्वाद देता है।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

हिन्दी को बचाने के लिए हिन्दी ब्लोगर क्या करें

विभिन्न कारणों से लगभग पिछले दो माह से ब्लॉग जगत से दूर रहा. आगे भी कितना नियमित रह पाऊंगा निश्चित नहीं. इस बीच अनेक विचार उपजे, अनेक घटनाएं घटीं जिन्हें ब्लॉग में देने की इच्छा है. इस निमित्त अपना ब्लॉग खोला तो उसमें प्रिंट मीडिया द्वारा की जा रही हिन्दी की दुर्दशा पर मेरे
लेख
पर श्री शैलेश की टिपण्णी मिली, जिसके द्वारा इसी विषय पर श्री प्रभु जोशी द्वारा लिखे गए गंभीर लेख का
लिंक मिला. लेख पढने के लिए थोड़ा समय और थोड़ा धीरज मांगता है.लेख में कुछ गंभीर बातों का जिक्र किया गया है. श्री जोशी के अनुसार मध्य प्रदेश के एक समाचार पत्र के सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों को बाकायदा निर्देश दिए गए थे कि वे समाचारों में शुद्ध हिन्दी की अपेक्षा हिंग्लिश को तरजीह दें. उनके अनुसार इस हिंग्लिश का प्रयोग अनायास ही नहीं हो रहा है अपितु एक षडयंत्र के तहत सायास हो रहा है और धीरे धीरे देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि प्रयोग किये जाने का षडयंत्र रचा जा रहा है. यदि वास्तव में ऐसा है तो यह एक गंभीर बात है. इसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए. श्री जोशी ने इस प्रतिरोध का तरीका भी बताया है, जिसे उन्होंने स्वयं भी अपनाया. उनके अनुसार हिन्दी प्रेमियों को व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से ऐसे समाचार पत्रों को पत्र लिख कर अपना विरोध जताना चाहिए.
हिन्दी ब्लोगर भी अपना विरोध इसी तरह से दर्ज करा सकते हैं. बल्कि वे अपने ब्लॉग में भी इस षडयंत्र के विरुद्ध अवश्य लिखें. आखिर हिन्दी के बचे रहने पर ही हिन्दी ब्लोगिंग बची रहेगी.

सोमवार, 28 सितंबर 2009

दुर्गोत्सव से जुड़ी बुराइयाँ

दुर्गोत्सव सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर देश के कुछ भागों में जगह जगह झाँकियाँ लगा कर उत्सव मनाया जाता है।धार्मिक भावना,हर्षोल्लास और उमंग के इस त्यौहार के साथ अनेक बुराइयाँ भी जुड़ गयीं हैं। उनका निराकरण किया जाना चाहिए। निराकरण के उपाय कैसे अपनाए जाएँ , यह मैं स्वयं नहीं जानता। हाँ उन बुराइयों को इंगित अवश्य किए देता हूँ :-

१- अनेक स्थानों पर आयोजन हेतु जबरन चन्दा वसूली।
२- सार्वजनिक स्थानों पर इस प्रकार झाँकी लगा देना कि यातायात अवरुद्ध हो।
३- लाउड स्पीकरों के प्रयोग से आसपास रहने वालों को असुविधा उत्पन्न होना, जिनमें विद्यार्थी और बीमार भी शामिल हैं।
४- झाँकी स्थल पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित होना जो धार्मिक आयोजन के अनुरूप न हों।
५- विशालकाय मूर्तियों का विसर्जन, जो विसर्जन स्थल को प्रदूषित करता है।

- इन बुराइयों के निराकरण हेतु शहर के जिम्मेदार नागारिकों द्वारा स्थानीय स्तर पर त्यौहार समीतियाँ बना कर सभी मुहल्लों की समितियों पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

दुर्गोत्सव का सबसे उजला पक्ष कन्या पूजन है।यदि हम कन्या को पूज रहे हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि अपने दैनिक जीवन में भी हम कन्या को यथोचित सम्मान दें। अन्यथा एक दिन की हमारी यह पूजा कोरा कर्मकांड और दिखावे की धार्मिकता है.

सोमवार, 21 सितंबर 2009

ईद का पर्व मंगलमय हो

'ईद का पर्व मंगलमय हो' - मैंने सतीश सक्सेना के ब्लॉग 'मेरे गीत' में ईद पर लिखे लेख पर यही टिप्पणि दी है। सामान्यतः आशा की जाती है कि लोग ईद की मुबारकबाद दें और नवरात्र तथा विजयादशमी पर शुभकामनाएं भेजें। शुभकामना एक हिन्दी शब्द है और मुबारक उर्दू। इस तरह हम हिन्दी को हिन्दुओं और उर्दू को मुसलामानों के त्योहारों से जोड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं, जो कि सरासर ग़लत है। यह साम्प्रदायिकता का ही एक नमूना है। हम हिन्दीभाषी हैं और अपनी शुभकामनाएं हिन्दी में प्रेषित करें तो कुछ भी ग़लत नहीं करते.यहाँ 'मुबारक'शब्द इस चर्चा का एक बहाना है।यह शब्द तो हिन्दी में घुल मिल गया है।मैं उस मानसिकता का विरोध करना चाहता हूँ जो हिन्दी को हिन्दुओं और उर्दू को मुसलमानों से जोड़ती है.यही बात संस्कृत को ले कर भी है। संस्कृत में कही बात हिन्दुओं से सम्बंधित मान ली जाती है। यहाँ मैं फारसी का जिक्र इस लिए नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि संस्कृत हमारे देश की भाषा है और हमारा सरोकार फारसी के मुकाबले संस्कृत से बहुत अधिक है।

हमें भाषा को भाषा ही रहने देना चाहिए। उसे धर्म से जोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

भारतीय संस्कृति की शान- तर्पण और क्षमा पर्व

भारतीय संस्कृति के दो पर्व - पितृ पक्ष और क्षमा पर्व मुझे प्रभावित करते हैं। आधुनिक समय में विभिन्न प्रकार के 'डे'(वेलेंटाइन डे, फादर्स डे आदि) मनाने वाले माडर्न लोगों को भी पितृ पक्ष से परहेज नहीं होना चाहिए । यह दिवंगतों की याद में मनाया जाने वाला दिवस ही नहीं पूरा पक्ष है। यह हमारी संस्कृति का एक उजला पक्ष है हमने पूरा एक पखवाड़ा दिवंगतों की याद को समर्पित किया है। आलोचक यह भी कह सकते हैं कि मृत व्यक्ति का श्राद्ध करने की अपेक्षा जीवित माता-पिता की सेवा करना अधिक युक्ति संगत है. मेरा मत है कि जिस प्रकार जीवित व्यक्ति के प्रति अपने पूरे दायित्व निभाने चाहिए उसी प्रकार मृत व्यक्ति को भी समुचित तरीके से याद किया जाना चाहिए. पितृ पक्ष दिवंगतों को याद करने का ही पर्व है.

इस पर्व का सबसे उजला पक्ष 'तर्पण' है, जिसे अनेक लोग केवल पितृ पक्ष में ही नहीं वरन पूरे वर्ष अपने नित्य कर्म में शामिल रखते हैं. तर्पण में श्रद्धांजलि स्वरूप दिया जाने वाला जल मृतात्मा को मिलता है या नहीं यह तर्क और विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन उसमें निहित भावनाएं अवश्य अनुकरणीय हैं –

( मेरे द्वारा दिए गए जल से) नदियाँ. पर्वत, सागर, वनस्पति, औषधि, मनुष्य, राक्षस, पिशाच और पूरे ब्रहमांड में मेरे द्वारा दिया जल ग्रहण करने योग्य सभी जन तृप्त हों.

यह मृतकों को दी जाने वाली अत्यंत विनम्र श्रद्धांजलि है.


इसी प्रकार की विनम्रता प्रर्दशित करने वाला एक अन्य पर्व जैन समाज द्वारा मनाया जाने वाला क्षमा पर्व है -
मेरे द्वारा जाने या अनजाने में किये गए किसी कृत्य से आपको दुःख पहुंचा हो तो उसके लिए मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ.

इन दोनों ही पर्वों की भावनाओं को सभी को आत्मसात करने की जरूरत है. इन पर्वों को अन्य धर्मावलम्बी भारतीय भी अपने तरीके से मना लें तो कोई बुराई नहीं.

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

शासन ने दी है मोबाइल कंपनियों को लूटने की खुली छूट

भ्रष्टाचार हम लोगों के लिए कोई नया मुद्दा नहीं है और न ही हमें इससे विशेष परहेज ही है.दूसरे शब्दों में भ्रष्टाचार हमारे समाज में घुलमिल गया है, रच-बस गया है. टी टी को रिश्वत दे कर ट्रेन में जगह पा लेना या गैस वाले से ब्लेक में बिना नंबर के गैस खरीद लेना, सिनेमा के टिकट ब्लेक में खरीदना आदि कृत्य आम बात हैं. भ्रष्टाचार का एक और रूप है - बख्शीश.पोस्टमैन या सफाई वाले को आपने त्योहारों पर बख्शीश नहीं दी तो आपकी डाक समय पर और सकुशल पहुँचने तथा आपके घर के पास की सड़क की सफाई की संभावना काफी कम हो जाती है, यद्यपि इन लोगों को इस काम के लिए सम्बंधित विभाग से वेतन मिलता है. अनेक लोग तो बख्शीश को भ्रष्टाचार की श्रेणी में रखने पर ऐतराज भी कर सकते हैं.

मैं आज एक अन्य श्रेणी के भ्रष्टाचार की चर्चा करने जा रहा हूँ. इस भष्टाचार की इजाजत शासन ने स्वयं दे रखी है. इस तरह के भ्रष्टाचार का एक उदाहरण पेट्रोल पम्प हैं. पेट्रोल और डीजल के दाम इस तरह निर्धारित होते हैं कि आप चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते और आप को हर बार अपने वाहन में पेट्रोल, डीजल भराने पर पेट्रोल पम्प वाले को कुछ पैसे अधिक देने ही होते हैं. आप पेट्रोल की मात्रा कुछ पॉइंट घटा बढ़ा कर इस घाटे को कम कर सकते हैं,इससे ज्यादा कुछ नहीं. .यही हाल मोबाईल कंपनियों का है. नए लांच हुए टाटा डोकोमो को छोड़ कर सभी मोबाइल कंपनियाँ प्रति मिनट पल्स के हिसाब से पैसा वसूलती हैं. सामान्यतः बात कुछ मिनट और कुछ सेकंड होती है. इस प्रकार प्रत्येक वार्ता में आपको उन सेकंड का भी भुगतान करना होता है, जिनका आपने उपयोग ही नहीं किया.

टाटा ने अपनी जी एस एम मोबाइल सर्विस डोकोमो नाम से शुरू की है. इसमें वे एक पैसा प्रति सेकंड की दर से देश में कहीं भी बात करवा रहे हैं.इस तरह टाटा डोकोमो के उपभोक्ता अब उन सेकंड के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं, जिनका उन्होंने उपयोग ही नहीं किया है. अब तक प्रति मिनट की पल्स की अनुमति देकर शासन ने मोबाइल सेवा कंपनियों को लूटने की खुली छूट दे रखी है. ट्राई को चाहिए कि वह सभी मोबाइल सेवा कंपनियों को प्रति सेकंड पल्स के लिए बाध्य कर के उपभोक्ताओं को राहत दे. हम तो केवल कामना ही कर सकते हैं कि ईश्वर ट्राई को सद्बुधि दे या मोबाइल कंपनियाँ प्रतिस्पर्धा के कारण ग्राहकों को यह सुविधा स्वेच्छा से दे दें.

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

चेतन भगत ठीक कहते हैं

चेतन भगत युवाओं के लिए एक जाना पहचाना नाम है, अंग्रेजी में लिखे उनके तीनों उपन्यास भारतीय युवाओं ने काफी पसंद किये. आज कल वे अखबारों में लेख लिख कर भी कृषि और रक्षा सहित देश की अनेक समस्याओं पर अपनी राय देने लगे हैं. वे स्वयं आई आई टी और आई आई एम के पढ़े हैं इसलिए मैं शिक्षा के सम्बन्ध में दिए गए उनके विचारों के सम्बन्ध में बात करूंगा.

अपने उपन्यास 'फाइव पॉइंट समवन' में उन्होंने देश के सबसे अधिक प्रतिष्ठित इनजीनिअरींग संस्थान आई आई टी में पढ़ रहे कम अंक (जिसे आई आई टी में पॉइंटर कहा जाता है) पाने वाले छात्रों को ले कर उनकी मनःस्थिति का वर्णन किया है.उनके अनुसार आई आई टी जैसे संस्थान भी केवल बंधे बंधाए ढर्रे से चल रहे हैं. वहाँ भी छात्रों में कुछ मौलिक करने, मौलिक सोचने का माद्दा पैदा नहीं हो पाता. कुछ दिनों पहले 'हिनुस्तान टाइम्स' में छपी उनकी पहली कहानी का पात्र हायर सेकंडरी में ९२ % अंक प्राप्त करने के बाद भी दिल्ली के टॉप कहे जाने वाले कालेज में दाखिला नहीं ले पाता क्योंकि वहाँ कट ऑफ ९५ % पहुँच जाता है.इससे व्यथित हो वह आत्महत्या करने का विचार करने लगता है. इससे पहले उन्होंने एक लेख में इंगित किया था कि सरकार स्टील और कोयला जैसी जिंसों के व्यापार में लिप्त न रह कर शिक्षा की तरफ ध्यान दे. उनके अनुसार आज भी इतने अधिक और अच्छे शिक्षा संस्थान नहीं हैं कि बड़ी तादाद में आने वाले प्रतिभावान छात्रों को आसानी से दाखिला मिल जावे.

वास्तव में स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने से लेकर परीक्षाएं समाप्त कर ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने तक की अनेक बहसें जब तब चलती रहती हैं.गरीब बच्चों के लिए दोपहर भोजन की व्यवस्था शुरू हो ही गयी है. अभी अभी शिक्षा विधेयक लाया गया है जो कानून बनने की तैयारी कर रहा है.लेकिन इन सारे प्रयत्नों के बावजूद शिक्षा संबन्धी सुधार नहीं हो पा रहे हैं. आज के बच्चे का बचपन काफी कुछ आज की शिक्षा ने ही छीना है.होम वर्क और कोचिंग उसे पूरा दिन पढाई में ही व्यस्त रखते हैं. मनोरंजन केवल टी वी के ऊलजलूल कार्यक्रमों और कम्पयूटर गेम्स तक सीमित रह गया है.

आज शिक्षा और स्वास्थ सुविधाओं का पूरी तरह व्यवसायीकरण हो चुका है. गरीब के लिए अच्छे स्कूल में पढ़ना या अच्छे अस्पताल में इलाज करवाना असंभव हो गया है. संभवतः चेतन भगत ठीक कहते हैं. सरकार को उद्योग और होटल चलाने की अपेक्षा शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर और सर्वसुलभ बनाने की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए.यदि पब्लिक सेक्टर के बैंक और उद्योग प्राइवेट सेक्टर से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं तो सरकारी स्कूल और अस्पताल क्यों नहीं ?